‘दालमंडी चौड़ीकरण: क्या मस्जिद कमेटियों पर बनाया जा रहा है अवैध दबाव? DM को सौंपे अंजुमन के पत्र से खुला बड़ा राज; वक्फ निरीक्षक की भूमिका पर उठे सवाल!’
वाराणसी: दालमंडी चौड़ीकरण विवाद में नया मोड़। अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के लेटर पैड पर जिलाधिकारी को सौंपा गया पत्र। मुफ्ती मौलाना बातिन नोमानी और एस.एम. यासीन के नेतृत्व में मिले प्रतिनिधिमंडल ने लगाया आरोप— "मस्जिदों को ढहाने के लिए मुतवल्लियों पर बनाया जा रहा है अवैध दबाव।" PNN24 की विशेष खोजी रिपोर्ट।

तारिक़ आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): वाराणसी के दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य की ज़द में आने वाली 6 मस्जिदों (मस्जिद लंगड़े हाफ़िज़ सहित) का मामला अब पूरी तरह गरमा गया है। सोशल मीडिया और मीडिया के एक धड़े में जहां मस्जिदों की शिफ्टिंग को लेकर मुतवल्लियों से बातचीत के दावे किए जा रहे थे, वहीं PNN24 News के पास मौजूद एक विशेष दस्तावेज (पत्रक की प्रति) ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

1. इस बड़े प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन था शामिल?
जिलाधिकारी से मिलने पहुंचे इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व शहर मुफ्ती मौलाना बातिन नोमानी और अंजुमन के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन कर रहे थे। इस डेलिगेशन में चौड़ीकरण से प्रभावित होने वाली सभी मस्जिदों के कर्ताधर्ता शामिल थे, जिनमें प्रमुख नाम इस प्रकार हैं:
- मौलाना मुफ्ती बातिन नोमानी
- एस.एम. यासीन
- मौलाना हारून रशीद नक्शबंदी
- मौलाना अबुल हाशिम
- मौलाना अब्दुल्लाह सऊद
- मौलाना अब्दुल्लाह नासिर
- डॉ. मोहम्मद अकबर
- मौलाना सैयद जफरुल हुसैन
2. पत्र में PWD और वक्फ बोर्ड की चिट्ठियों का पूरा हवाला
अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के लेटर पैड पर लिखे गए इस पत्र में दो महत्वपूर्ण सरकारी पत्रों का क्रमवार ब्यौरा दिया गया है:
- पहला पत्र (PWD का): लोक निर्माण विभाग (PWD) वाराणसी ने पत्रांक 279 (दिनांक 17 अप्रैल 2026) के माध्यम से उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ को पत्र लिखकर 6 मस्जिदों का उल्लेख किया था और पूछा था कि इनके वर्तमान मुतवल्ली कौन हैं तथा प्रभावित भूमि/भवन के संबंध में आगे की कार्रवाई कैसे की जाए।
- दूसरा पत्र (वक्फ बोर्ड का जवाब): इसके जवाब में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने पत्रांक संख्या 236/2026 (दिनांक 23 अप्रैल 2026) जारी कर मुतवल्लियों का विवरण तो दिया, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि वर्तमान में बोर्ड गठित नहीं है। बोर्ड ने साफ निर्देश दिया कि वक्फ अधिनियम की धारा 51 एवं 91 के अंतर्गत ही विधिक प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है और इस पर कोई भी निर्णय नियमानुसार केवल बोर्ड ही ले सकता है।
3. “मस्जिदों को ध्वस्त करने के लिए मांगा जा रहा है स्वैच्छिक सहमति पत्र”
जिलाधिकारी को सौंपे गए पत्र में सबसे गंभीर आरोप वक्फ निरीक्षक (Waqf Inspector) और संबंधित अधिकारियों पर लगाया गया है। पत्र के मुख्य अंश निम्नलिखित हैं:
“दोनों सरकारी पत्रों से यह पूर्णतः स्पष्ट है कि पूरा विषय वक्फ बोर्ड में विचाराधीन एवं विधाई प्रक्रिया के अधीन है। इसके बावजूद, वर्तमान में वक्फ निरीक्षक एवं अन्य संबंधित व्यक्तियों द्वारा हम मुतवल्लियों पर अनावश्यक दबाव बनाया जा रहा है कि संबंधित मस्जिदों के ऐसे दस्तावेज और स्वैच्छिक सहमति (Consent Letter) प्रस्तुत की जाए, जिससे मस्जिदों को प्रभावित अथवा ध्वस्त किए जाने की प्रक्रिया को तत्काल आगे बढ़ाया जा सके। यह दबाव पूर्णतः अनुचित, गैर-कानूनी और विधि-विरुद्ध है।”
मुस्लिम समाज की प्रशासन से प्रमुख मांगें:
प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी से कानून के दायरे में काम करने की मांग करते हुए कहा:
- जब तक उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा इस संबंध में कोई विधिवत अंतिम निर्णय या निर्देश जारी नहीं किया जाता, तब तक मुतवल्लियों पर किसी भी प्रकार का दबाव न बनाया जाए।
- समस्त कार्रवाई केवल वक्फ अधिनियम के प्रावधानों और नियमों के अनुसार ही पारदर्शी तरीके से की जाए।
- जिलाधिकारी तत्काल इस प्रकरण में हस्तक्षेप कर वक्फ निरीक्षक द्वारा बनाए जा रहे इस अनावश्यक और मानसिक दबाव को रुकवाएं।
जिलाधिकारी का आश्वासन और PNN24 का बड़ा सवाल
इस ज्ञापन को लेने के बाद जिलाधिकारी वाराणसी ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया था कि चौड़ीकरण के संबंध में जो भी अग्रिम कार्रवाई होगी, वह पूरी तरह वक्फ बोर्ड से संपर्क और विधिक प्रक्रिया के आधार पर ही की जाएगी।
हालांकि, इस पत्र के सामने आने के बाद PNN24 News प्रशासन से एक बड़ा सवाल पूछता है कि जब सरकारी दस्तावेज खुद नियमों के पालन की बात कह रहे हैं, तो फिर दालमंडी जैसी संवेदनशील जगह पर जमीनी स्तर पर मुतवल्लियों को डराकर या दबाव के तहत ‘सहमति पत्र’ लेने की जल्दबाजी आखिर क्यों की जा रही है?
📝 विशेष कॉलम: मोरबतियाँ (लेखक: तारीख आज़मी)

काका का नज़रिया: “बबुआ, नियम-कानून तो किताबों की शोभा बढ़ाने के लिए लिखे जाते हैं, असली खेल तो पीछे से घूम रही ‘प्रशासनिक लाठी’ और ‘अवैध दबाव’ का होता है; दालमंडी में अगर नियमानुसार काम हो रहा है, तो मुतवल्लियों को दस्तखत के लिए डराने की नौबत क्यों आई?”
आज अंजुमन इंतजामिया के इस लेटर पैड और जिलाधिकारी को सौंपे गए शिकायती पत्र पर गरमागरम बहस छिड़ गई। काका ने अपनी मोरबतियाँ सुलझाते हुए बेहद गंभीर अंदाज में तंज कसा।
काका बोले: “बबुआ, बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब को अगर बचाना है, तो पारदर्शिता सबसे बड़ी चाबी है। एक तरफ तो अखबारों में छपता है कि ‘मस्जिद कमेटियों से बातचीत चल रही है’, और दूसरी तरफ मुफ्ती बातिन नोमानी साहब और एस.एम. यासीन साहब को पूरी पलटन के साथ डीएम दफ्तर जाकर कहना पड़ता है कि हुजूर, आपके वक्फ इंस्पेक्टर साहब हम पर अवैध दबाव बना रहे हैं ताकि हम खुद अपनी मस्जिदों को ढहाने का कागज़ लिख कर दे दें! अरे साहब, जब लखनऊ से सुन्नी वक्फ बोर्ड ने साफ लिख दिया कि अभी बोर्ड गठित नहीं है और जो भी होगा वो धारा 51 और 91 के तहत ही होगा, तो बनारस के इन बाबुओं को किस बात की हड़बड़ी है?”
मैंने पूछा— “काका, जिलाधिकारी ने तो आश्वासन दिया है कि वक्फ बोर्ड के नियमों के तहत ही आगे की कार्रवाई होगी?”
काका का जवाब: “डीएम साहब का आश्वासन तो ठीक है बबुआ, लेकिन नीचे काम करने वाले जो ‘कारिंदे’ हैं, वो पर्दे के पीछे जो खेल कर रहे हैं, वो डराने वाला है। अगर कानून का सम्मान प्रशासन भी करता है और मुतवल्ली भी करते हैं, तो सब कुछ शीशे की तरह साफ होना चाहिए। दबाव बनाकर ली गई सहमति कभी टिकाऊ नहीं होती। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, बनारस की गलियां भले ही चौड़ी करिए, लेकिन प्रशासनिक नियत को संकरा मत होने दीजिए; कानून के रास्ते से चलेंगे तो अमन भी रहेगा और विकास का पहिया भी बिना किसी विवाद के घूमेगा’।”
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