‘वाराणसी दालमंडी चौड़ीकरण: 6 मस्जिदों के शिफ्टिंग की खबरें निकलीं फर्जी; मुतवल्लियों ने बातचीत से किया इनकार, सामने आया वक्फ बोर्ड द्वारा जारी नियमो का हवाला देते हुवे बड़ा पत्र!’, जाने क्या है नियम
वाराणसी: दालमंडी चौड़ीकरण की ज़द में आने वाली 6 मस्जिदों के स्थानांतरण की खबरें फर्जी। मस्जिद करीमुल्लाह सहित अन्य मस्जिदों के मुतवल्लियों ने प्रशासन से किसी भी बातचीत से किया इनकार। यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पीडब्ल्यूडी (PWD) के पत्र का जवाब देकर नियमों की स्थिति स्पष्ट की। PNN24 की विशेष खोजी रिपोर्ट।
तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): वाराणसी के ऐतिहासिक व्यापारिक क्षेत्र दालमंडी के चौड़ीकरण की ज़द में आने वाली 6 प्रमुख मस्जिदों के भविष्य को लेकर पिछले कुछ दिनों से असमंजस और उहापोह की स्थिति बनी हुई है। सोशल मीडिया पोस्ट और कतिपय खबरों में यह दावा किया जा रहा था कि जिला प्रशासन इन मस्जिदों के मुतवल्लियों (प्रबंधकों) से इनके स्थानांतरण (शिफ्टिंग) के संबंध में वार्ता कर रहा है। लेकिन PNN24 News की जमीनी पड़ताल और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के एक आधिकारिक पत्र से यह साफ हो गया है कि स्थानांतरण को लेकर चल रही ये तमाम खबरें पूरी तरह निराधार और फर्जी हैं।

1. मुतवल्लियों ने दावों को किया खारिज, ‘मुजावर’ वाले बयान की खुली पोल
सोशल मीडिया पर चल रही खबरों में उस समय भारी विरोधाभास देखने को मिला, जब मस्जिद करीमुल्लाह के संबंध में किसी विभागीय बाबू का बयान कोट करते हुए ‘मुजावर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।
- तथ्य: इस्लामिक और कानूनी व्यवस्था के अनुसार ‘मुजावर’ दरगाह यानी मज़ार के होते हैं, मस्जिद के नहीं।
- मस्जिद करीमुल्लाह के वास्तविक मुतवल्ली मिर्ज़ा सैफ बेग और डॉ. रुबीना बेग हैं। चूंकि डॉ. रुबीना बेग कोई सार्वजनिक बयान नहीं देती हैं और सारा कामकाज मिर्ज़ा सैफ बेग देखते हैं, इसलिए उन्होंने प्रशासन के साथ ऐसी किसी भी बातचीत या स्थानांतरण के प्रस्ताव से साफ इनकार किया है।
इसके अलावा चौड़ीकरण की ज़द में आने वाली अन्य सभी मस्जिदों के जिम्मेदारों ने भी वार्ता की खबरों को पूरी तरह नकारा है:
- मस्जिद अली रज़ा के सिराज अहमद ने बातचीत से इनकार किया।
- मस्जिद रंगीले शाह के बिलाल और मस्जिद निसार खान के शकील ने भी ऐसी किसी चर्चा को खारिज किया।
- मस्जिद काजीपुरा (लंगड़े हाफ़िज़) के मुतवल्ली मुफ़्ती मौलाना बातिन नोमानी ने भी स्पष्ट किया कि प्रशासन से स्थानांतरण को लेकर कोई वार्ता नहीं हुई है।
- मस्जिद संगमरमर की स्थिति: सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस मस्जिद की मैनेजमेंट कमेटी के सभी सदस्यों का इंतकाल (निधन) हो चुका है और वर्तमान में कोई नया सदस्य नियुक्त नहीं है। इसकी देखरेख वक्फ बोर्ड के दिशा-निर्देशन में सीधे आम आवाम (स्थानीय जनता) द्वारा की जा रही है।
2. सामने आया PWD के पत्र पर यूपी वक्फ बोर्ड का जवाब
इस पूरे विवाद के बीच उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) मासूम अली सरवर का एक पत्र सामने आया है। यह पत्र वाराणसी PWD (लोक निर्माण विभाग) के पत्रांक संख्या 279 (दिनांक 17 अप्रैल 2026) के जवाब में जारी किया गया है। PWD ने प्रभावित भूमि-भवन के संरक्षण और प्रतिकार (मुआवजा/दान) को लेकर दिशा-निर्देश मांगे थे।
वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने अपने पत्र में निम्नलिखित बातें स्पष्ट की हैं:
- बोर्ड ने प्रभावित हो रही सभी मस्जिदों के मुतवल्लियों की प्रामाणिक डिटेल के साथ उनके ‘तौलियत प्रमाण पत्र’ (नियुक्ति/प्रबंधन दस्तावेज) जारी कर दिए हैं।
- पत्र में स्पष्ट रूप से अवगत कराया गया है कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड गठित नहीं है।
- ऐसे में एकीकृत वक्फ प्रबंधन सशक्तिकरण दक्षता एवं विकास अधिनियम 1995 (यथा संशोधित 2025) की धारा 51 एवं 91 के अंतर्गत ही प्रावधिक नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
3. क्या कहता है कानून? वक्फ अधिनियम की धारा 51 के कड़े नियम
वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 51 वक्फ संपत्तियों के किसी भी प्रकार के अनधिकृत हस्तांतरण, बिक्री, उपहार या गिरवी रखने को प्रारंभ से ही पूरी तरह अमान्य (Void) घोषित करती है। धार्मिक और धर्मार्थ संपत्तियों की सुरक्षा के लिए बोर्ड की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
हालांकि, यह धारा सरकार को किसी ‘सार्वजनिक प्रयोजन’ (Public Purpose) के लिए वक्फ संपत्ति का अधिग्रहण करने से नहीं रोकती, बशर्ते वह अधिग्रहण बोर्ड के परामर्श से हो और निम्नलिखित शर्तों को पूरा करता हो:
- यह अधिग्रहण सार्वजनिक पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act, 1991) का किसी भी प्रकार से उल्लंघन न करता हो।
- अधिग्रहण का उद्देश्य स्पष्ट रूप से सार्वजनिक विकास से जुड़ा हो और उसके लिए कोई अन्य उपयुक्त वैकल्पिक भूमि उपलब्ध न हो।
- वक्फ को उस संपत्ति के बदले प्रचलित बाजार मूल्य के बराबर उचित मुआवजा या उसके स्थान पर उतनी ही उपयुक्त वैकल्पिक भूमि प्रदान की जाए।
📝 विशेष कॉलम: मोरबतियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

काका का नज़रिया: “बबुआ, सोशल मीडिया के इस दौर में अफ़वाहों के पैर बड़े लंबे होते हैं; मस्जिद के लिए ‘मुजावर’ का बयान छपवा देने वाले बाबुओं को न दीन की समझ है और न कानून की मर्यादा। अच्छा हुआ जो वक्फ बोर्ड की चिट्ठी ने सच का आईना दिखा दिया!”
आज शाम दालमंडी चौड़ीकरण और 6 मस्जिदों के स्थानांतरण के दावों पर चर्चा छिड़ी तो काका ने अपने चिरपरिचित अंदाज में गहरी बात कही।
काका बोले: “बबुआ, बनारस की दालमंडी की गलियां जितनी संकरी हैं, वहां कुछ लोगों के दिमाग भी उतने ही संकरे हो जाते हैं। पिछले कुछ दिनों से हवा उड़ाई जा रही थी कि मुतवल्लियों ने मस्जिदों को शिफ्ट करने की हामी भर दी है। हद तो तब हो गई जब मस्जिद के लिए ‘मुजावर’ का फर्जी बयान तक कोट कर दिया गया! अरे साहब, मस्जिद खुदा का घर है, वहां मुतवल्ली (प्रबंधक) होते हैं, मुजावर तो मजारों और दरगाहों पर बैठते हैं। मिर्ज़ा सैफ बेग, सिराज अहमद और मुफ़्ती बातिन नोमानी जैसे जिम्मेदार लोगों ने साफ कह दिया कि कोई बात ही नहीं हुई, तो फिर ये अफवाहों का बाजार गर्म क्यों किया जा रहा था?”
मैंने पूछा— “काका, पीडब्ल्यूडी को भेजे वक्फ बोर्ड के इस पत्र और धारा 51 के कानूनी दांव-पेंच का क्या असर होगा?”
काका का जवाब: “असर साफ है बबुआ, कानून से ऊपर कोई नहीं है। मासूम अली सरवर साहब ने साफ लिख दिया है कि वर्तमान में बोर्ड गठित नहीं है और जो भी होगा वो संशोधित वक्फ अधिनियम 2025 की धारा 51 और 91 के कड़े दायरे में ही होगा। सरकार को हक है कि वो विकास के लिए जमीन ले, लेकिन उसके लिए 1991 का ‘वर्शिप एक्ट’ आड़े आएगा और बाजार भाव से मुआवजा या वैसी ही वैकल्पिक जमीन देनी होगी। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, बनारस में गंगा-जमुनी तहजीब की जड़ें बहुत गहरी हैं; किसी भी चौड़ीकरण के पहिये को चलाने से पहले, कानून के कायदों और आवाम के विश्वास को साथ लेकर चलना ही असली समझदारी है’।”
📊 दालमंडी की प्रभावित मस्जिदें और वर्तमान स्थिति (Fact Box)
| मस्जिद का नाम | वर्तमान प्रबंधन / मुतवल्ली | स्थानांतरण वार्ता पर स्थिति |
| मस्जिद करीमुल्लाह | मिर्ज़ा सैफ बेग और डॉ. रुबीना बेग | पूरी तरह इनकार (शिफ्टिंग की खबरें फर्जी) |
| मस्जिद अली रज़ा | सिराज अहमद | वार्ता के दावों को सिरे से खारिज किया |
| मस्जिद रंगीले शाह | बिलाल | प्रशासन से ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई |
| मस्जिद निसार खान | शकील | स्थानांतरण के दावों का खंडन किया |
| मस्जिद काजीपुरा (लंगड़े हाफ़िज़) | मुफ़्ती मौलाना बातिन नोमानी | किसी भी प्रकार की सहमति या वार्ता से इनकार |
| मस्जिद संगमरमर | पूर्व कमेटी का इंतकाल, वक्फ बोर्ड/आवाम के अधीन | कोई वार्ता नहीं, देखरेख स्थानीय जनता के हाथ में |
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