‘बिहार में फिर “जलसमाधि”: बेतिया में धनौती नदी का 35 साल पुराना पुल ध्वस्त; दोनों चंपारण का संपर्क टूटा, १० गांवों में हाहाकार!’
बिहार में एक और पुल ध्वस्त: बेतिया के मझौलिया में धनौती नदी पर बना 35 साल पुराना गोडा पुल अचानक ढहा, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण का सीधा संपर्क टूटा। बखरिया चौक NH-27 मार्ग पूरी तरह बाधित, 10 गांवों और आधा दर्जन पंचायतों की आबादी प्रभावित। ग्रामीणों का आरोप— महीनों से जर्जर पुल की प्रशासन ने नहीं की मॉनिटरिंग। पढ़ें PNN24 की ग्राउंड रिपोर्ट।

ईदुल अमीन
बेतिया/मझौलिया (PNN24 News): बिहार में विकास के दावों और प्रशासनिक मुस्तैदी की पोल खोलती हुई एक और बड़ी तस्वीर सामने आई है। राज्य में पुल गिरने का अंतहीन सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में भागलपुर के विक्रमशिला पुल के क्षतिग्रस्त होने (जिसका दो महीने युद्ध स्तर पर काम कर दोबारा परिचालन शुरू किया गया) के बाद, अब ताजा प्रशासनिक लापरवाही का शिकार पश्चिम चंपारण (बेतिया) जिला हुआ है। यहाँ मझौलिया प्रखंड के अंतर्गत धनौती नदी पर बना करीब 35 साल पुराना ‘गोडा पुल’ सोमवार (8 जून 2026) को अचानक भरभराकर ध्वस्त हो गया, जिससे सीमावर्ती इलाकों में हड़कंप मच गया है।
📉 बीच नदी में समाया १० फीट का हिस्सा; चंपारण की कनेक्टिविटी ठप
प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार को अचानक एक तेज आवाज के साथ पुल का बीच का लगभग 10 फीट का बड़ा हिस्सा टूटकर सीधे नीचे उफनती धनौती नदी में समा गया।
- मुख्य मार्ग हुआ बाधित: इस हादसे के बाद बखरिया चौक NH-27 से लालसरैया होते हुए करमवा और पूर्वी चंपारण को जोड़ने वाला मुख्य लाइफलाइन मार्ग पूरी तरह से ठप हो गया है।
- सैकड़ों लोग प्रभावित: पुल के बीच से टूटने के कारण बखरिया, करमवा, लालसरैया, राजभार समेत करीब दस प्रमुख गांवों और आधा दर्जन से अधिक पंचायतों का जिला मुख्यालय और पड़ोसी जिले से संपर्क पूरी तरह कट गया है।
🚨 “प्रशासन सोता रहा, हम चेताते रहे”— ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
हादसे के बाद मौके पर पहुंचे PNN24 News के प्रतिनिधि से बात करते हुए स्थानीय ग्रामीणों ने विभागीय अधिकारियों के खिलाफ भारी आक्रोश व्यक्त किया:
- महीनों से था जर्जर: ग्रामीणों का आरोप है कि यह पुल पिछले कई महीनों से अत्यंत जर्जर और खतरनाक हालत में था। पुल के ठीक बीचो-बीच एक जानलेवा बड़ा गड्ढा बन चुका था और सुरक्षा के लिए लगी साइड रेलिंग भी बहुत पहले टूटकर गिर चुकी थी।
- शिकायतों को किया नजरअंदाज: लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार लिखित और मौखिक रूप से संबंधित इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों को पुल की खराब स्थिति के बारे में सचेत किया था। लेकिन जर्जर पुलों की मॉनिटरिंग और सुरक्षा आकलन (Structural Audit) को लेकर विभाग की सुस्ती के कारण समय रहते कोई मरम्मत या वैकल्पिक डायवर्जन नहीं बनाया गया, जिससे आखिरकार यह बड़ा हादसा हो गया।
🌾 किसान, छात्र और मरीज बेहाल; जान जोखिम में डाल रहे लोग
पुल टूटने का सबसे सीधा और बुरा असर पश्चिमी चंपारण से पूर्वी चंपारण की ओर रोज आने-जाने वाले दैनिक यात्रियों पर पड़ा है। अब लोगों को कई किलोमीटर लंबा और घुमावदार वैकल्पिक रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहे हैं।
- सबसे अधिक परेशानी उन किसानों को हो रही है जो अपनी फसलें और सब्जियां बेतहाशा गर्मी के बीच मुख्य मंडियों तक नहीं ले जा पा रहे हैं। इसके अलावा स्कूली छात्रों, आपातकालीन मरीजों और स्थानीय छोटे दुकानदारों की जिंदगी पूरी तरह बेपटरी हो गई है।
- प्रशासनिक मुस्तैदी और किसी मुकम्मल नाव या वैकल्पिक व्यवस्था के अभाव में, कई बेबस लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पुल के टूटे हिस्से के किनारे और नदी के उथले पानी से होकर पैदल ही रास्ता पार करने को मजबूर हैं, जो किसी भी वक्त बड़े हादसे को न्योता दे सकता है।
बिहार में लगातार हो रहे इन हादसों ने यह साफ कर दिया है कि जब तक पुरानी और जर्जर हो चुकी कंक्रीट संरचनाओं की समय पर जांच और प्रशासनिक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक करोड़ों की लागत से बनने वाले ये पुल इसी तरह असमय काल के गाल में समाते रहेंगे।











