‘न्यूज़क्लिक (NewsClick) केस में दिल्ली HC का ऐतिहासिक फैसला: प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ पुलिस FIR और ED की जांच रद्द; कोर्ट बोला— “यह स्वतंत्र पत्रकारिता पर शक्तियों का मनमाना हमला!”‘

नई दिल्ली: न्यूज़क्लिक (NewsClick) और प्रबीर पुरकायस्थ को दिल्ली हाईकोर्ट से ऐतिहासिक राहत। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने दिल्ली पुलिस की एफआईआर और ईडी की मनी लॉन्ड्रिंग जांच को किया पूरी तरह रद्द। हाई कोर्ट ने कहा— 'यह स्वतंत्र पत्रकारिता के खिलाफ शक्तियों के दुरुपयोग का दुर्भावनापूर्ण मामला है।' वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने रखी दलीलें। शेयरों के अधिक मूल्यांकन और नियमों के उल्लंघन के आरोप खारिज। पढ़ें PNN24 की विशेष विधिक रिपोर्ट।

आफताब फारुकी

नई दिल्ली (PNN24 News): कानूनी वेबसाइट्स ‘लाइव लॉ’ और ‘बार एंड बेंच’ के हवाले से आ रही आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, दिल्ली हाईकोर्ट ने समाचार पोर्टल न्यूज़क्लिक और उसके एडिटर-इन-चीफ प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ सालों से चल रही आपराधिक कार्यवाहियों पर पूर्णविराम लगा दिया है। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने अपने ऐतिहासिक फैसले में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा वर्ष 2020 में दर्ज की गई मूल एफआईआर और इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत की गई पूरी कार्रवाई को अवैध पाते हुए रद्द कर दिया है। यह फैसला मूल रूप से 29 मई 2026 को सुरक्षित किया गया था, जो बीते बुधवार (10 जून 2026) को आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड हुआ।

⚖️ “स्वतंत्र प्रेस के खिलाफ शक्तियों का घोर दुरुपयोग”— माननीय हाईकोर्ट

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने अपने आदेश में जांच एजेंसियों की मंशा और कानूनी प्रक्रिया के तौर-तरीकों पर बेहद सख्त और गंभीर टिप्पणियां की हैं:

“याचिकाकर्ताओं (न्यूज़क्लिक और प्रबीर) के खिलाफ मौजूदा कार्यवाही न केवल पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण है, बल्कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का गला घोंटने के लिए शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल और दुरुपयोग का एक स्पष्ट उदाहरण है। इस बेबुनियाद एफआईआर को जारी रखना कानून की पवित्र प्रक्रिया का गंभीर मज़ाक उड़ाना है।”

🔎 कोर्ट ने परखी ED की थ्योरी; डेढ़ साल की जांच में मिला ‘सन्नाटा’

अदालत ने ईडी की मनी लॉन्ड्रिंग और धोखाधड़ी की दलीलों को एक-एक कर कानून के तराजू पर तौला और उन्हें खारिज कर दिया:

  • अपराध का कोई आधार नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मूल एफआईआर और चार्जशीट में लगाए गए आरोपों के समर्थन में किसी भी आपराधिक कृत्य के आवश्यक तत्व (Essential Elements of Offence) मौजूद ही नहीं हैं।

  • ED की डेढ़ साल की जांच बेनतीजा: कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रवर्तन निदेशालय ने लगभग डेढ़ साल तक इस मामले की बेहद व्यापक और आक्रामक जांच की, लेकिन इसके बावजूद अदालत के सामने एक भी ऐसा आपत्तिजनक या पुख्ता तथ्य पेश नहीं किया जा सका, जो PMLA की धारा 4 के तहत मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध होने का दूर-दूर तक संकेत भी देता हो।

  • धोखाधड़ी का कोई शिकार नहीं: धोखाधड़ी (Cheating) के आरोपों पर कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि ऐसे मामलों में किसी पीड़ित व्यक्ति या संस्था का होना अनिवार्य है जिसे संपत्ति से वंचित कर धोखा दिया गया हो, लेकिन इस पूरे मामले में ऐसा कोई भी पक्ष सामने नहीं आया।

  • केवल ‘समझौता’ होना आपराधिक साजिश नहीं: ईडी के इस तर्क पर कि प्रबीर पुरकायस्थ और डब्ल्यूडब्ल्यूएमएच (WWMH) के प्रबंधक जेसन फेचर के बीच एक विदेशी फंड को लेकर ‘आपराधिक साजिश’ (IPC 120B) रची गई थी, कोर्ट ने कहा कि व्यापारिक या रणनीतिक समझौता होना अपने आप में अपराध नहीं है जब तक कि यह साबित न हो कि उसका उद्देश्य गैरकानूनी था या उसे पाने के लिए गलत तरीके अपनाए गए थे।

📊 26% डिजिटल मीडिया निवेश सीमा और शेयर मूल्यांकन पर स्थिति साफ

जांच एजेंसियों ने न्यूज़क्लिक पर विदेशी निवेश (FDI) के नियमों के उल्लंघन और शेयरों के अत्यधिक मूल्यांकन (Overvaluation of Shares) का तकनीकी आरोप लगाया था, जिसे माननीय न्यायाधीश ने पूरी तरह निराधार बताया:

  • 2018 का नियम: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के दस्तावेजों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यूज़क्लिक को यह विदेशी निवेश साल 2018 में प्राप्त हुआ था, और उस समय डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 26 प्रतिशत निवेश की कोई भी ऊपरी सीमा लागू नहीं थी।

  • यह एक आर्थिक फैसला है: शेयरों के मूल्यांकन पर कोर्ट ने साफ कहा कि किसी कंपनी के शेयरों की कीमत तय करना एक पूर्णतः ‘व्यापारिक और आर्थिक फैसला’ (Economic Decision) होता है, इससे किसी भी प्रकार के आपराधिक या आतंकवादी अपराध का संकेत नहीं मिलता।

💼 कपिल सिब्बल की जोरदार दलीलें और प्रबीर का लंबा संघर्ष

इस हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई में न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ की ओर से देश के दिग्गज और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और डी. कृष्णन ने पैरवी की। वहीं जांच एजेंसियों (EOW और ED) की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने पक्ष रखा था।

गौरतलब है कि प्रबीर पुरकायस्थ को चीन के समर्थन में प्रोपेगैंडा चलाने और अवैध फंडिंग लेने के आरोपों के तहत अक्टूबर 2023 में सख्त कानून ‘यूएपीए’ (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद मई 2024 में देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध घोषित करते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था। अब दिल्ली हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले ने उनके ऊपर लगे वित्तीय अपराधों के दावों को भी कानूनी रूप से नेस्तनाबूद कर दिया है।

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