‘नोएडा में न्याय व्यवस्था का “क्रूर” चेहरा: 8 साल की सजा के लिए 16 साल जेल में सड़ा युवक; थक-हारकर कबूला जुर्म, तब जाकर नसीब हुई आजादी!’
नोएडा विधिक रिपोर्ट: न्याय व्यवस्था पर बड़े सवाल! 2010 के डकैती मामले में आरोपी रिहान ने जेल से छूटने के लिए 16 साल बाद कबूला अपना जुर्म। एडिशनल सेशंस जज सोमप्रभा मिश्रा की कोर्ट ने सुनाई 8 साल की सजा, लेकिन तय अवधि से ज्यादा वक्त जेल में काटने के कारण तत्काल रिहाई के आदेश। 11 सालों में 12 अदालतों में ट्रांसफर हुआ केस, हुईं 157 सुनवाइयां। पढ़ें PNN24 की विशेष खोजी कानूनी रिपोर्ट।

महविश कुरैशी
नोएडा/गौतम बुद्ध नगर (PNN24 News): “जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड” यानी देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है। यह कहावत नोएडा के रहने वाले रिहान नामक युवक की जिंदगी पर अक्षरशः सच और कड़वी साबित हुई है। साल 2010 में महज ₹43,000 की डकैती के आरोप में जेल गए एक गरीब युवक को भारतीय न्यायिक प्रक्रिया के फेर में अपनी जवानी के स्वर्णिम 16 साल सलाखों के पीछे काटने पड़े। अंत में जब उसे लगा कि जीते जी ट्रायल पूरा नहीं होगा, तो उसने जेल से बाहर आने की मजबूरी में अपना गुनाह कबूल कर लिया, जिसके बाद अदालत ने उसकी रिहाई का रास्ता साफ किया।
⛓️ क्या था 2010 का नोएडा सेक्टर-41 डकैती मामला?
यह कानूनी मामला करीब डेढ़ दशक पुराना है, जिसने एक कथित आरोपी की पूरी जिंदगी लील ली:
- वारदात की तारीख: 27 जुलाई 2010 को रिहान ने कथित तौर पर अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर नोएडा के सेक्टर-41 स्थित एक रिहायशी मकान में डकैती की वारदात को अंजाम दिया था।
- लूट की सामग्री: इस डकैती में शिकायतकर्ता नजबुल हसन के घर से कुल 21 हजार रुपये के सोने-चांदी के जेवरात, 22 हजार रुपये कैश, मोबाइल और ड्राइविंग लाइसेंस सहित कुछ अन्य विधिक दस्तावेज लूटे गए थे।
- दर्ज हुई FIR: पीड़ित की शिकायत पर नोएडा के सेक्टर-39 पुलिस स्टेशन में रिहान के खिलाफ तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 395 (डकैती) के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया गया था।
⚖️ 11 साल, 12 अदालतें और 157 सुनवाइयां— न्यायिक सुस्ती का महा-ट्रैक रिकॉर्ड
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की विस्तृत कानूनी रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने मामले की जांच पूरी कर चार्जशीट तो दाखिल कर दी, लेकिन उसके बाद रिहान फाइल और तारीखों के चक्रव्यूह में ऐसा फंसा कि बाहर नहीं निकल सका:
- अदालतों के चक्कर: साल 2015 में इस केस को पहली बार सेशंस कोर्ट में कमिट (भेजा) किया गया था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि पिछले 11 सालों के भीतर इस एक अकेले केस को 12 अलग-अलग अदालतों में ट्रांसफर किया गया।
- सुनवाइयों की झड़ी: अपनी अंतिम और निर्णायक सुनवाई तक पहुंचने से पहले इस मामले में अदालत के भीतर 157 बार सुनवाई (Hearings) हुई, लेकिन गरीब होने के कारण रिहान को न तो विधिक सहायता (लीगल एड) मिल सकी और न ही उसकी जमानत हो सकी।
📽️ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर कबूला जुर्म; जज सोमप्रभा मिश्रा का फैसला
शुरुआती सालों में रिहान ने खुद को बेकसूर बताते हुए ट्रायल का सामना करने का फैसला किया था। लेकिन जब साल 2024 में पहली बार मुख्य शिकायतकर्ता नजबुल हसन ने अभियोजन पक्ष (Prosecution) की ओर से कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराया, तो रिहान जेल की कालकोठरी से पूरी तरह टूट चुका था। उसने भांप लिया कि यदि ट्रायल ऐसे ही चला तो उसकी पूरी उम्र जेल में कट जाएगी।
मंगलवार, 9 जून 2026 को इस मामले की अंतिम सुनवाई एडिशनल सेशंस जज सोमप्रभा मिश्रा की पीठ के समक्ष हुई:
- आरोपी की गुहार: जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए पेश हुए रिहान ने जज के सामने अपना जुर्म कबूल कर लिया। उसने कोर्ट से हाथ जोड़कर कहा, “हुजूर, मैं बेहद गरीब इंसान हूँ, मेरा पक्ष मजबूती से रखने वाला बाहर कोई नहीं है। मुझे कम से कम सजा दी जाए, क्योंकि मैंने अपने कथित अपराध की तय विधिक सीमा से दोगुना समय पहले ही जेल में काट लिया है।”
- कोर्ट का विधिक आदेश: सेशंस जज सोमप्रभा मिश्रा ने शिकायतकर्ता की गवाही और आरोपी के खुद के कबूलनामे (Confession) को रिकॉर्ड पर लेते हुए उसे दोषी करार दिया और 8 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही कोर्ट ने रिहान पर ₹10,000 का आर्थिक जुर्माना भी लगाया।
🔓 सजा 8 साल की, काट चुका 16 साल: अब सीधे होगा रिहा
न्यायाधीश सोमप्रभा मिश्रा ने कानूनी बारीकियों का हवाला देते हुए अपने ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट किया कि चूंकि दोषी रिहान डकैती के इस मामले में साल 2010 से लगातार यानी करीब 16 साल जेल की सजा काट चुका है, जो कि कोर्ट द्वारा आज सुनाई गई 8 साल की सजा से दोगुनी है।
अदालत ने कहा कि ₹10,000 का जुर्माना न भरने की सूरत में जो एक महीने की अतिरिक्त जेल का नियम है, उसे भी रिहान द्वारा जेल में बिताए गए ‘अतिरिक्त समय’ (Excess Detention Period) में पूरी तरह ‘एडजस्ट’ (Set-off) कर दिया जाए। अदालत के इस आदेश के बाद अब 16 साल बाद रिहान को जेल के बंद कपाटों से आजादी मिलना तय हो गया है। इस फैसले ने देश में विचाराधीन कैदियों (Undertrials) के मानवाधिकारों और स्पीडी ट्रायल (Speedy Trial) के संवैधानिक अधिकार पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।











