‘ट्रंप-ईरान शांति समझौते पर भड़के नेतन्याहू: क्या अमेरिका से टकराएगा इजरायल? समझिए वो 5 कारण जिन्होंने वॉशिंगटन से तेल-अवीव तक बढ़ाई तल्खी’

पश्चिम एशिया में बड़ा उलटफेर: डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच हुई पीस डील अमेरिकी राष्ट्रपति और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के बीच टकराव की वजह बन गई है। क्या 'मातोश्री' जैसी सियासी दुविधा में घिरे नेतन्याहू ट्रंप से भिड़ेंगे? जानिए वे 5 बड़े कारण जो इजरायल के लिए गले की फांस बन चुके हैं, केवल PNN24 News पर।

ईदुल अमीन

PNN24 News: पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी भीषण संघर्ष के बीच एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच हुए हालिया शांति समझौते (Peace Deal) और युद्धविराम ने भले ही वैश्विक तेल बाजार और दुनिया को थोड़ी राहत दी हो, लेकिन इसने अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगी इजरायल के भीतर एक बड़ा राजनीतिक और सैन्य तूफान खड़ा कर दिया है।

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस पीस डील से बेहद नाराज हैं। अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद इस कदर बढ़ गए हैं कि अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या नेतन्याहू अपने सबसे बड़े मददगार डोनाल्ड ट्रंप से सीधे टकराने की तैयारी कर रहे हैं? इस पूरे विवाद और नेतन्याहू की नाराजगी के पीछे छिपे 5 सबसे बड़े कारणों को हम आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं:

1. सीजफायर बनाम इजरायल का मिलिट्री एक्शन (लेबनान फ्रंट)

डोनाल्ड ट्रंप की नीति इस समय पश्चिम एशिया में किसी भी तरह हिंसा को कम करने और अमेरिकी भागीदारी को समेटने की है। लेकिन इस समझौते की सबसे बड़ी व्यावहारिक अड़चन लेबनान है। ईरान और मध्यस्थ देशों (जैसे पाकिस्तान) का दावा है कि इस व्यापक शांति समझौते की पहली शर्त ही यह है कि लेबनान में ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह के खिलाफ चल रही सभी सैन्य कार्रवाइयां तुरंत और स्थायी रूप से रोकी जाएं।

टकराव की वजह: इजरायल इस बात के सख्त खिलाफ है। इजरायली सेना ने लेबनान में अपने हमले जारी रखे हैं, जिससे न केवल हिज्बुल्लाह बल्कि दक्षिण लेबनान के आम नागरिक भी प्रभावित हो रहे हैं। फ्रांस जैसे यूरोपीय देश पहले ही इस मानवीय संकट पर इजरायल से नाराजगी जता चुके हैं। नेतन्याहू का मानना है कि ईरान के साथ डील के चक्कर में हिज्बुल्लाह को दोबारा खड़े होने का मौका मिल जाएगा, जो इजरायल कभी स्वीकार नहीं कर सकता।

2. नेतन्याहू का ‘ऐतिहासिक जीत’ का दावा और बढ़त

नाराजगी का दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि इजरायल इस समय खुद को युद्ध में बेहद मजबूत और ‘विजेता’ की स्थिति में देख रहा है। यरुशलम में एक हालिया प्रेस ब्रीफिंग के दौरान नेतन्याहू ने खुले तौर पर दावा किया कि ईरान के खिलाफ चलाया गया ऑपरेशन इजरायल के इतिहास का सबसे सफल सैन्य अभियान था।

  • नेतन्याहू की दलील: उन्होंने दावा किया, “हमने ईरान के न्यूक्लियर साइंटिस्ट्स को खत्म कर दिया, उनके शीर्ष नेताओं को मार गिराया, उनके परमाणु ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया और उनकी मिसाइल फैक्ट्रियों को तबाह कर दिया है।” नेतन्याहू के मुताबिक, इजरायल ने खुद को पूरी तरह मिटने से बचा लिया है। ऐसे में जब इजरायल को लग रहा है कि उसने ईरान को घुटनों पर ला दिया है, तो वह किसी भी ऐसे समझौते का हिस्सा बनकर अपनी इस सैन्य बढ़त (Military Edge) को गंवाना नहीं चाहता।

3. इजरायल की आंतरिक राजनीति और अक्टूबर 2026 के चुनाव

अंतर्राष्ट्रीय दबाव से अलग, नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनका अपना घरेलू राजनीतिक अस्तित्व है। इजरायल में अक्टूबर 2026 में आम चुनाव (General Elections) होने निर्धारित हैं।

  • संकट का चक्रव्यूह: राजनीतिक विश्लेषकों की रिपोर्ट के अनुसार, नेतन्याहू के पास विकल्प बहुत सीमित हैं। घरेलू स्तर पर वे पहले से ही भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों (Corruption Cases) का सामना कर रहे हैं। इजरायल का इतिहास गवाह है कि युद्ध या सुरक्षा नीतियों में जरा सी भी नरमी किसी भी प्रधानमंत्री के राजनीतिक करियर को खत्म कर सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर नेतन्याहू ने ट्रंप के दबाव में आकर इस समय कदम पीछे खींचे, तो चुनाव में जनता उन्हें ‘कमजोर’ मानकर खारिज कर सकती है।

4. विपक्ष का चौतरफा और तीखा दबाव

नेतन्याहू को संसद (नेसेट) के भीतर विपक्ष के जबरदस्त घेराव का सामना करना पड़ रहा है। इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री और वर्तमान विपक्षी नेता यायर लापिद ने नेसेट में नेतन्याहू पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री के सामने अब केवल दो ही रास्ते बचे हैं:

  1. या तो वे अमेरिका जैसे इजरायल के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक सहयोगी के साथ सीधा और आत्मघाती टकराव मोल ले लें।
  2. या फिर अपनी राजनीतिक जिद छोड़कर इजरायल के दीर्घकालिक राष्ट्रीय और सुरक्षा हितों के सामने झुक जाएं। विपक्ष के इस आक्रामक रुख ने नेतन्याहू की घेराबंदी को और मजबूत कर दिया है, जिससे वे बैकफुट पर आने को तैयार नहीं हैं।

5. गठबंधन सरकार में दरार: “हम पर यह समझौता लागू नहीं होता”

नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द विपक्ष से ज्यादा उनकी खुद की सरकार के भीतर बैठे राइट विंग (दक्षिणपंथी) गठबंधन सहयोगी हैं। नेतन्याहू की अपनी पार्टी ‘लिकुड’ और सरकार में शामिल अति-दक्षिणपंथी नेताओं ने इस अमेरिकी सीजफायर की शर्तों पर सीधे बगावती तेवर अख्तियार कर लिए हैं।

  • इतामार बेन-गवीर का कड़ा रुख: इजरायल के बेहद प्रभावशाली राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री (National Security Minister) इतामार बेन-गवीर ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट शब्दों में ट्रंप की नीति को खारिज करते हुए लिखा:

    “ट्रंप का समझौता हम पर लागू नहीं होता। हम इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं और यह समझौता किसी भी तरह से हमारी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।”

  • अगर नेतन्याहू इस समझौते को मान लेते हैं, तो उनकी गठबंधन सरकार किसी भी वक्त गिर सकती है, जिससे उनका प्रधानमंत्री पद तुरंत खतरे में पड़ जाएगा।

अमेरिका और ईरान के बीच इस समझौते की कोशिशों ने वॉशिंगटन और तेल-अवीव के बीच के गहरे ‘सोच’ के अंतर को उजागर कर दिया है। एक तरफ ट्रंप जहां अपनी वैश्विक छवि एक ‘शांतिदूत’ के रूप में स्थापित करने के लिए जल्द से जल्द युद्ध खत्म करना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू के लिए यह उनके देश की सुरक्षा और स्वयं के राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है। आने वाले दिन तय करेंगे कि क्या इजरायल अपने सबसे बड़े हथियारों के सप्लायर (अमेरिका) की बात मानेगा या फिर इतिहास में पहली बार दोनों के बीच एक अभूतपूर्व कूटनीतिक दरार देखने को मिलेगी।

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