‘काशी में ऐतिहासिक न्याय: 29 साल पुराने कस्टोडियल डेथ केस में दो रिटायर्ड दरोगा और नामचीन डॉक्टर को जेल; ₹100 की कथित चोरी के आरोप में गई थी एक बेगुनाह की जान!’

वाराणसी: 29 साल पुराने लंका कस्टोडियल डेथ मामले में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला। विशेष न्यायाधीश अमित कुमार तिवारी ने दो रिटायर्ड दरोगा और कबीरचौरा अस्पताल के पूर्व बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके जैन को दोषी करार दिया। मुख्य आरोपी दरोगा नरेंद्र प्रताप को 10 साल और डॉ. जैन को 5 साल की जेल। ₹100 की कथित चोरी के आरोप में गई थी राजेंद्र सिंह की जान। पढ़ें PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी

वाराणसी (PNN24 News): उत्तर प्रदेश के न्यायिक इतिहास में वाराणसी की एक अदालत ने सोमवार को एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसने पूरे पुलिस और प्रशासनिक महकमे को हिलाकर रख दिया है। वाराणसी के लंका थाना क्षेत्र में आज से ठीक 29 वर्ष पूर्व पुलिस हिरासत में हुई राजेंद्र प्रसाद सिंह की संदिग्ध मौत के मामले में विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) अमित कुमार तिवारी की अदालत ने दो सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) दरोगा और काशी के एक बेहद प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त डॉक्टर को दोषी करार देते हुए जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया है।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, वाराणसी के न्यायिक इतिहास में पिछले 40 वर्षों में यह पहली बार हुआ है जब पुलिस अभिरक्षा में मौत (Custodial Death) के किसी मामले में पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ पोस्टमार्टम करने वाले सरकारी डॉक्टर को भी साजिश रचने और साक्ष्य छिपाने का दोषी पाते हुए इतनी कड़ी सजा सुनाई गई है।

⚖️ किसे मिली कितनी सजा और जुर्माना?

अदालत ने गवाहों के बयान और उपलब्ध पुख्ता परिस्थितियों के आधार पर तीनों आरोपियों को दोषी पाया और निम्नलिखित सजा मुकर्रर की:

  1. रिटायर्ड दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह (मुख्य आरोपी): सुंदरपुर चौकी के तत्कालीन प्रभारी नरेंद्र प्रताप सिंह (निवासी: हंडिया, प्रयागराज) को अदालत ने 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही उन पर 31 हजार रुपये का अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया गया है।
  2. रिटायर्ड डॉक्टर के.के. जैन (वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ): कबीरचौरा मंडलीय अस्पताल के पूर्व चिकित्सक और आईएमए (IMA) के वरिष्ठ सदस्य डॉ. केके जैन को इस पूरी खूनी साजिश को छुपाने के लिए फर्जी रिपोर्ट तैयार करने का दोषी पाया गया। अदालत ने उन्हें 5 साल की जेल और 40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
  3. रिटायर्ड दरोगा राधेश्याम सिंह (तत्कालीन विवेचक): मामले की झूठी जांच करने वाले दरोगा राधेश्याम सिंह (निवासी: हरपुर बुदहट, गोरखपुर) को छह महीने की सजा सुनाई गई है।

🚌 ₹100 की कथित चोरी का आरोप और वो ‘खूनी’ वारदात

यह पूरा मामला वर्ष 1997 का है, जो किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कंपा दे:

  • सीट के लिए हुआ था विवाद: जंसा थाना क्षेत्र के बखरिया गांव के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद सिंह वर्ष 1997 में अपने बीमार बेटे की दवा लेने वाराणसी शहर आए थे। वह महानगर बस से सुंदरपुर जा रहे थे, तभी बस में सीट को लेकर उनका दयाराम नाम के एक अन्य यात्री से मामूली विवाद हो गया।
  • चौकी में प्रताड़ना से मौत: सुंदरपुर पुलिस चौकी पर तैनात तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह ने राजेंद्र को हिरासत में ले लिया और दूसरे यात्री की जेब से मात्र 100 रुपये चोरी करने का झूठा आरोप मढ़ दिया। आरोप है कि पुलिस चौकी के भीतर राजेंद्र को इस कदर बर्बरता से प्रताड़ित किया गया कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

🏥 खाकी और एप्रन का वो ‘अपवित्र’ गठजोड़: शव का जबरन दाह संस्कार

राजेंद्र सिंह की लॉकअप में मौत होने के बाद पुलिस ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए एक खौफनाक साजिश रची:

  • दरोगा राधेश्याम की झूठी थ्योरी: मामले की विवेचना कर रहे दरोगा राधेश्याम सिंह ने अपनी जांच में राजेंद्र की मौत को ‘आत्महत्या’ करार दे दिया। पुलिस ने दावा किया कि राजेंद्र ने अपने ही शॉल के सहारे लॉकअप के पंखे से लटककर जान दी थी।
  • डॉक्टर जैन की फर्जी PM रिपोर्ट: मौत के अगले दिन बीएचयू (BHU) में पोस्टमार्टम हुआ, जिसे मंडलीय अस्पताल के डॉक्टर केके जैन ने किया। डॉ. जैन ने पुलिस से सांठगांठ कर अपनी रिपोर्ट में मौत का कारण ‘दम घुटने से लटकना’ (Asphyxia due to hanging) दर्शाया, ताकि पुलिस पर से मर्डर का चार्ज हट सके।
  • चुपचाप अंतिम संस्कार: पुलिस ने राजेंद्र के परिजनों को उनकी मौत की भनक तक नहीं लगने दी और लावारिस दिखाकर वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।

🕵️‍♂️ मानवाधिकार आयोग और CBCID की जांच ने खोला ‘पाप का घड़ा’

पति के अचानक लापता होने और बाद में इस साजिश की भनक लगने पर राजेंद्र की साहसी पत्नी ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सामने उठाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश शासन ने इसकी जांच सीबीसीआईडी (CBCID) को सौंप दी।

जांच अधिकारी सीबीसीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत पांडेय ने जब मामले की परतें खोलीं, तो यह पूरी तरह एक सुनियोजित साजिश और कस्टोडियल मर्डर साबित हुआ। उन्होंने तत्कालीन लंका थानाध्यक्ष हसन अब्बास समेत 8 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। लंबे समय तक चले इस मुकदमे के दौरान अवध मणि त्रिपाठी और कविंद्र नारायण सिंह को आरोपों से मुक्त कर दिया गया, जबकि कांस्टेबल श्रीनिवास शुक्ला और अनिरुद्ध यादव को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया। आखिरकार, 29 वर्षों के लंबे और थका देने वाले इंतजार के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिला और अदालत ने तीनों मुख्य गुनहगारों को जेल भेजकर समाज में एक कड़ा संदेश दिया है।

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