‘वाराणसी की गंज शहीदा मस्जिद पर पाकिस्तान को भारत का करारा जवाब: विदेश मंत्रालय ने जरदारी के बयान को बताया “बेतुका”; मस्जिद कमेटी बोली— “हमारे मामलों में दखल न दें, हम खुद देख लेंगे”‘
वाराणसी की गंज शहीदा मस्जिद पर रेलवे के नोटिस को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच राजनयिक तकरार। पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बयान पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल का करारा जवाब— "गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता पाकिस्तान के बयान बेतुके"। मस्जिद कमेटी ने भी कहा— "पाकिस्तान अपने मसले देखे, हमारे मामलों में दखल न दे"। पढ़ें PNN24 की पूरी रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): वाराणसी के काशी रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास और विस्तार परियोजना के तहत स्टेशन परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार के पास स्थित गंज शहीदा मस्जिद को खाली करने का नोटिस जारी होने के बाद इस पर अंतरराष्ट्रीय सियासत शुरू हो गई है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा इस मामले में दिए गए बयान पर भारत के विदेश मंत्रालय और स्वयं मस्जिद की प्रबंधन कमेटी ‘अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद कमेटी’ ने सख्त आपत्ति जताते हुए पाकिस्तान को अपनी हद में रहने की नसीहत दी है।
🇵🇰 पाकिस्तानी राष्ट्रपति जरदारी ने क्या दिया था बयान?
पाकिस्तानी राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान के मुताबिक, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भारत में ऐतिहासिक मुस्लिम धार्मिक स्थलों की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। जरदारी ने विशेष रूप से वाराणसी की करीब एक हजार साल पुरानी गंज शहीदा मस्जिद का जिक्र करते हुए दावा किया था कि भारत में मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि भारत सरकार ऐसी कार्रवाइयों को तुरंत रोके, अन्यथा इससे भारत में आंतरिक टूट और स्थायी तौर पर अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है।
🇮🇳 भारतीय विदेश मंत्रालय का करारा पलटवार— “यह केवल एक राजनीतिक हमला”
पाकिस्तानी राष्ट्रपति के इस बयान पर भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने नई दिल्ली में मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा:
“पाकिस्तानी राष्ट्रपति की टिप्पणियां पूरी तरह से बेतुकी और निराधार हैं। मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मामले में पाकिस्तान का अपना रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है, जिस पर दुनिया भर में लगातार चर्चा होती है। अलग-अलग धर्मों के अल्पसंख्यकों को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाने और उनका उत्पीड़न करने का पाकिस्तान का एक लंबा इतिहास रहा है। इस कड़वी सच्चाई को देखते हुए पाकिस्तानी राष्ट्रपति की टिप्पणियों को केवल एक जानबूझकर किया गया राजनीतिक हमला ही माना जा सकता है, जो पाकिस्तान की कट्टरता और नफ़रत की राष्ट्रीय नीतियों से प्रेरित है।”
🚫 “पाकिस्तान अपने मसले देखे, हमारे नहीं” — अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद कमेटी
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया मस्जिद का प्रबंधन देखने वाली ‘अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद कमेटी’ की तरफ से आई है। कमेटी के संयुक्त सचिव (Joint Secretary) एस.एम. यासीन ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति के बयान की कड़े शब्दों में आलोचना की। उन्होंने दो टूक कहा:
“पाकिस्तान के राष्ट्रपति अपने यहां के मसले देखें, हमारे मामलों में दख़ल न दें। हम (भारतीय मुसलमान) अपने मसले ख़ुद देख लेंगे। वह इस तरह के बयान देकर मामले को और जटिल ही कर रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा
‘पकिस्तान हमारी फिक्र न करे, हम देख लेंगे। अपनी मस्जिदों को देखे जहाँ आये दिन बम ब्लास्ट होते रहते है।’
🧱 क्या है मस्जिद का कानूनी और ऐतिहासिक विवाद?
काशी रेलवे स्टेशन के सुपरिटेंडेंट अर्पित गुप्ता के मुताबिक, स्टेशन के आधुनिकीकरण और प्रस्तावित निर्माण कार्यों के लिए आसपास की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराना कानूनी रूप से जरूरी है। इसी प्रक्रिया के तहत रेलवे ने गंज शहीदा मस्जिद की दीवार पर एक नोटिस चस्पा कर 20 जून तक परिसर खाली करने का निर्देश दिया था।
रेलवे के इस नोटिस को गैर-कानूनी बताते हुए एस.एम. यासीन ने इसके खिलाफ अदालत (Court) जाने की बात कही है। उन्होंने मस्जिद के इतिहास और दावों पर बात करते हुए कहा:
- 1034 में हुआ निर्माण: यह मस्जिद करीब एक हजार साल पुरानी है, जिसका निर्माण सन् 1034 में हुआ था। इसका नाम ‘गंज शहीदा’ इसलिए है क्योंकि यहां कई ऐसे लोगों की कब्रें हैं जो देश की आजादी की लड़ाई में शामिल रहे थे।
- रेलवे से पुरानी मस्जिद: रेलवे इस क्षेत्र में सन् 1887 में आया, जबकि मस्जिद उससे सदियों पहले की है। सन् 1883-84 के बंदोबस्त नक्शे और उससे पहले के दस्तावेजों में भी इस मस्जिद का स्पष्ट जिक्र है।
- भ्रामक नोटिस का आरोप: कमेटी का कहना है कि रेलवे के नोटिस में जिस अदालती मुकदमे के खारिज होने का हवाला दिया गया है, वह असल में मस्जिद के बाहर पूर्व दिशा की जमीन से संबंधित था, मस्जिद से उसका कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए यह नोटिस तकनीकी रूप से भ्रामक है।
मस्जिद कमेटी ने यह भी साफ किया कि इस संबंध में तीन दिन पहले वाराणसी के जिला अधिकारी (DM) से उनकी मुलाकात हुई थी, जहां प्रशासन की ओर से आश्वासन मिला है कि मस्जिद को जबरन नहीं तोड़ा जाएगा। कमेटी कानूनी तौर पर रेलवे के इस नोटिस का जवाब तैयार कर रही है।












