‘वाराणसी में नया “मस्जिद विवाद”: काशी स्टेशन के सामने गंज शहीदा मस्जिद पर रेलवे का बुलडोज़र एक्शन नोटिस? बिना दस्तखत-मोहर की नोटिस पर भड़की अंजुमन कमेटी; हाई कोर्ट में याचिका दायर!’, एस.एम. यासीन की मुकम्मल दलीलें “1034 ईस्वी की है मस्जिद, रेलवे 1887 में आया”

वाराणसी ब्रेकिंग: काशी स्टेशन के सामने स्थित ऐतिहासिक मस्जिद गंज शहीदा को रेलवे ने दिया ध्वस्तीकरण का नोटिस। बिना दस्तखत और मोहर की नोटिस से मुस्लिम समाज में सनसनी। ज्ञानवापी की देखरेख करने वाली अंजुमन कमेटी के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन पहुंचे हाई कोर्ट; सोमवार को होगी 'तत्काल' सुनवाई। यासीन का दावा— 1034 ईस्वी की है मस्जिद, रेलवे 1887 में आया।

तारिक आज़मी 

वाराणसी (PNN24 News): काशी की धरती पर अज्गैब शहीद के बाद अब एक और ऐतिहासिक और सदियों पुरानी मस्जिद को लेकर कानूनी और प्रशासनिक जंग छिड़ गई है। वाराणसी के राजघाट क्षेत्र के अंतर्गत काशी रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित मस्जिद गंज शहीदा पर रेलवे प्रशासन द्वारा अचानक एक विवादित नोटिस चस्पा किए जाने के बाद बनारस सहित पूरे सूबे के मुस्लिम समाज में गहरी सनसनी और बेचैनी फैल गई है। यह मामला इसलिए भी बेहद संवेदनशील हो गया है क्योंकि इस मस्जिद का प्रबंधन भी वही अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी करती है, जो ज्ञानवापी मस्जिद की देख रेख करती है।

📜 क्या लिखा है रेलवे की विवादित नोटिस में?

शनिवार (13 जून 2026) की शाम को काशी रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास कार्य के बीच अचानक मस्जिद की दीवार पर एक नोटिस चिपका दी गई। नोटिस के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • अवैध निर्माण का आरोप: नोटिस में दावा किया गया है कि रेलवे की अधिग्रहित संपत्ति पर मस्जिद का अवैध रूप से निर्माण हुआ है, जो वर्तमान में काशी रेलवे स्टेशन पर चल रहे आधुनिक विकास कार्यों में बड़ी बाधा बन रहा है।
  • पुराना मुकदमा खारिज: रेलवे ने दलील दी है कि इस विवाद से संबंधित मूल वाद संख्या 1174/1991 (न्यायालय सिविल जज – जूनियर डिवीजन) बीते वर्ष 28 अगस्त 2024 को अदालत द्वारा खारिज किया जा चुका है।
  • 20 जून की आखिरी डेडलाइन: रेलवे प्रशासन ने अल्टीमेटम दिया है कि 20 जून 2026 तक मस्जिद को स्वेच्छा से खाली कर हटा लिया जाए। यदि तय तिथि तक ऐसा नहीं किया गया, तो 20 तारीख के बाद रेलवे प्रशासन किसी भी दिन भारी सुरक्षा बल के साथ मस्जिद के ध्वस्तीकरण (Demolition) की विधिक कार्रवाई शुरू कर देगा।

❓ बिना दस्तखत, मोहर और तारीख की नोटिस: अवाम में फैला भ्रम

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा प्रशासनिक झोल तब सामने आया, जब स्थानीय लोगों ने नोटिस की बारीकियों को देखा। इस सरकारी नोटिस पर किसी भी जिम्मेदार रेलवे अधिकारी का न तो नाम दर्ज है, न पद, न हस्ताक्षर (Sign) हैं और न ही विभाग की कोई आधिकारिक मोहर (Stamp) लगी है। यहां तक कि नोटिस जारी करने की तारीख भी गायब है।

जैसे ही इस बिना दस्तखत वाली नोटिस की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, बनारस और बैरून-ए-बनारस (बनारस के बाहरी इलाकों) के मुस्लिम समाज में तरह-तरह की अफवाहें और चर्चाएं शुरू हो गईं। कुछ कतिपय तत्वों द्वारा सीधे अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी की कार्यप्रणाली को ही कटघरे में खड़ा किया जाने लगा।

🏃‍♂️ अहल-ए-सुबह प्रयागराज दौड़े एस.एम. यासीन; सोमवार को हाई कोर्ट में ‘तत्काल’ सुनवाई की मांग

नोटिस चस्पा होने की भनक लगते ही अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी तुरंत एक्शन मोड में आ गई। PNN24 News से विशेष बातचीत में अंजुमन के संयुक्त सचिव एस0एम0 यासीन ने बताया कि रविवार की ‘अहल-ए-सुबह’ (तड़के सुबह) ही वे कानूनी विशेषज्ञों की टीम के साथ प्रयागराज (इलाहाबाद) पहुंच गए।

अंजुमन कमेटी ने रेलवे के इस एकतरफा आदेश और अनाम नोटिस के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) में एक रिट याचिका दाखिल कर दी है। उच्च पदस्थ न्यायिक सूत्रों के अनुसार, मामले की गंभीरता को देखते हुए इस याचिका को ‘तत्काल’ (Urgent Listing) श्रेणी की मांग करते हुवे सोमवार (15 जून 2026) को माननीय न्यायाधीश के पटल पर प्रस्तुत किया जाएगा।

🕌 एस.एम. यासीन की मुकम्मल दलीलें “1034 ईस्वी की है मस्जिद, रेलवे 1887 में आया”— 

मस्जिद गंज शहीदा की ऐतिहासिक नवैय्यत (प्रकृति) और कानूनी स्थिति पर बात करते हुए संयुक्त सचिव एस0एम0 यासीन ने रेलवे के दावों को सिरे से खारिज कर दिया:

  1. मुकदमा खारिज होने का असली कारण: एस0 एम0 यासीन ने स्पष्ट किया, “मुकदमे का फैसला मैरिट (गुण-दोष) पर नहीं हुआ है। वह ‘अदम पैरवी’ (वकील की अनुपस्थिति) के कारण तकनीकी रूप से खारिज हुआ था। हमारे मुख्य विधिक वकील रईस अंसारी साहब की बेगम कैंसर से पीड़ित थीं, जिनका बाद में इंतकाल भी हो गया। उस दौर में ज्ञानवापी मस्जिद के मुकदमे भी अपने चरम पर थे, जिसके चलते कोर्ट में समय पर हाजिरी नहीं हो सकी। हम इसे री-स्टोर (पुनर्जीवित) कराने की प्रक्रिया में हैं।”
  2. मस्जिद नहीं, बाहर की जमीन का था केस: उन्होंने साफ किया कि 1991 में जो मुकदमा दायर किया गया था, वह मूल मस्जिद भवन के लिए नहीं था, बल्कि गंज शहीदा मस्जिद के बाहर स्थित वक्फ की खाली जमीनों को रेलवे के कब्जे से बचाने के लिए था।
  3. ऐतिहासिक नक्शों का हवाला: एसएम यासीन ने ऐतिहासिक दस्तावेज पेश करते हुए कहा कि मस्जिद गंज शहीदा का निर्माण 1034 ईस्वी में हुआ था। यह साल 1880 के ‘किलाकोहना’ के आधिकारिक नक्शे में भी दर्ज है और साल 1883-84 के ब्रिटिश बंदोबस्त नक्शे में भी बकायदा मौजूद है। जबकि इसके विपरीत, काशी रेलवे स्टेशन की स्थापना ही बहुत बाद में यानी साल 1887 में हुई थी। ऐसे में 850 साल पहले बनी मस्जिद रेलवे की जमीन पर अवैध कैसे हो सकती है?
  4. रेलवे खुद मान चुका है सच: यासीन ने दावा किया कि खुद रेल प्रशासन ने पूर्व में अदालत में दाखिल अपने विधिक शपथ-पत्र (Affidavit) में इस मस्जिद को निर्विवाद रूप से मुसलमानों की मिल्कियत (स्वामित्व) स्वीकार किया है। यह बकायदा उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में दर्ज है और उत्तर प्रदेश सरकार के ‘उम्मीद पोर्टल’ पर भी इसका आधिकारिक डिजिटल रजिस्ट्रेशन हो चुका है। हम अवाम से अपील करते हैं कि वे किसी भी बहकावे में न आएं और पूरा धैर्य बनाए रखें।

🕯️ तारिक आज़मी का विशेष संपादकीय दृष्टिकोण

अंधेरे रास्तों पर प्रशासनिक “शॉर्टकट” और सुलगते सवाल

“वाराणसी के राजघाट की फिजाओं में एक बार फिर अविश्वास का धुआं घोलने की कोशिश की जा रही है। रेलवे जैसी जिम्मेदार राष्ट्रीय संस्था जब किसी धार्मिक स्थल को ढहाने की 20 जून जैसी संवेदनशील डेड-लाइन तय करती है, तो उसकी कानूनी सुदृढ़ता पर कोई उंगली नहीं उठनी चाहिए। लेकिन मस्जिद गंज शहीदा की दीवार पर जो कागज चिपकाया गया, वह सरकारी नोटिस कम और किसी अज्ञात साए का पर्चा ज्यादा नजर आता है। बिना दस्तखत, बिना सरकारी मोहर और बिना तारीख के जारी इस फरमान ने प्रशासनिक मर्यादा को तार-तार किया है।

जैसा कि अंजुमन के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन ने दर्द बयां किया कि ‘अज़गैब शहीद’ में रात के अंधेरे में जो मशीनरी का कारनामा शहर देख चुका है, उसने अवाम के भीतर गहरे जख्म और अविश्वास पैदा किया है। अगर 1991 का मुकदमा केवल अदम-पैरवी (वकील के न आने) के कारण खारिज हुआ, तो क्या रेलवे को सदियों पुराने वक्फ रिकॉर्ड्स और 1880 के ऐतिहासिक नक्शों को दरकिनार कर सीधे बुलडोजर की धमकी देने का नैतिक या विधिक अधिकार मिल जाता है? विकास की रफ्तार जरूरी है, काशी स्टेशन का कायाकल्प होना ही चाहिए, लेकिन उसकी नींव में किसी की जायज आस्था और विधिक मिल्कियत को कुचलना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। शहर बनारस के ‘इंसाफ पसंद तबके’ की नजरें अब इलाहाबाद हाई कोर्ट पर टिकी हैं, जहां सोमवार का सूरज उम्मीद की नई किरण लेकर आ सकता है। तब तक बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब को सिर्फ और सिर्फ ‘धैर्य’ के धागे से बांधे रखने की जरूरत है।”

— तारिक़ आज़मी

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