‘यौम-ए-आशूरा विशेष: करबला कोई किस्सा नहीं, ज़ुल्म के खिलाफ हर इंसान के जिंदा रहने का परचम है!’

विशेष संपादकीय: 'सर कट जाए, मगर जालिम के सामने मत झुकना'। 10वीं मोहर्रम (यौम-ए-आशूरा) के मौके पर करबला के मैदान का वो ऐतिहासिक सबक, जो हर दौर में इंसानियत को जिंदा रखता है। पढ़िए PNN24 के मुख्य संपादक की कलम से एक बेहद मर्मस्पर्शी और रूहानी दास्तान।

तारिक आज़मी

PNN24 News): आशुरा वह दिन है, जब तपते हुए रेगिस्तान की सुनसान और बेदर्द रेत पर दुनिया के एक बहुत बड़े लावलश्कर के ज़ुल्मी ने सोचा था कि— एक शख्स और उनके अपनों के पाक खून को बहाकर, यहाँ हमेशा के लिए किस्सा ख़त्म कर देंगे। लेकिन वह लहू कोई आम लहू नहीं था; वह तो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लिखी जाने वाली एक ऐसी अमर दास्तान थी, जिसे मिटाने की कोशिश करने वाला खुद इतिहास के पन्नों में राख हो गया।

⏳ जब रेत ने अपनी नसों में पैबस्त कर लिया वो पाक लहू

यह कड़वा सच है कि आज ही के रोज़ वह मुकद्दर खून बहाया गया था। तपती रेत ने उसे अपनी नसों में पैबस्त कर लिया और फिर रेत तो रेत थी, हवाओं के पंख लगाकर जहाँ-जहाँ पहुँच सकती थी, उस मैदान की ज़ुल्म भरी दास्तान खोलती चली गई। देखते ही देखते सारे आलम ने जान लिया कि एक थी “कर्बला”

करबला के मैदान में पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे, मौला हज़रत अली की औलाद और हर ज़माने के ईमाम हज़रत हुसैन का लहू मुबारक उस मिट्टी में जज़्ब हो गया। मगर धीरे-धीरे वह लहू हर उस दिल में दस्तक देने लगा, जो ज़ुल्म के खिलाफ धड़कता था। यह वह लहू था जिसने करबला की ज़मीन को चूमा और हर उस तरफ बिखर गया, जिधर-जिधर हज़रत हुसैन का रास्ता था। यह लहू ज़माने की ऐसी तारीख़ बनकर ज़िन्दा हुआ कि हर दौर इससे रोशनी पाने लगा।

“ज़ुल्म के ख़िलाफ़ जो मौत मिलती है, वह किसी भी बुज़दिली की ज़िन्दगी से बहुत बेहतर है। करबला ने शहादत के मर्तबे को बुलंद कर दिया।”

💔 ग़म है, दर्द है, तड़प है… मगर मायूसी नहीं

आज दसवीं मोहर्रम है। आँखों में नमी है, सीने में ग़म है, तक़लीफ़ है, दर्द है, तड़प है… मगर दिल में कोई मायूसी नहीं है। करबला ने हमें सिखाया है कि कभी किसी बातिल (झूठ) के आगे झुकना नहीं और खुदा की ज़ात से कभी मायूस मत होना। सर भले तन से उतर जाए, लेकिन सही और सच्चा रास्ता मत छोड़ना। ज़ुल्मी कितना ही ताकतवर और सितमगर क्यों न हो, उसके सामने घुटने मत टेकना।

बस यही सबक लिए इंसान नँगे पांव आज अशुरे के रोज़ अपने ईमाम हुसैन को याद करता है ताकि आत्मिक रूप से ज़िन्दा रह सके। ज़िन्दा वैसे ही— जैसे करबला के शहीद, करबला की मिट्टी और करबला के क़िस्से आज भी ज़िन्दा हैं। करबला हमारा सबक है, हमारा रास्ता है, हमारा इम्तेहान है और हमारा ग़ुरूर है, क्योंकि इसमें हमारी तारीख़ की सबसे जानदार नज़ीर (उदाहरण) दर्ज है। करबला हमारी हिम्मत की वजह है।

🚩 हर दौर में यज़ीद आएंगे और हर दौर में करबला रास्ता दिखाएगी

दुनिया का हर इंसाफ़पसन्द इंसान करबला से सबक़ लेता है और ताज़िंदगी लेता रहेगा। वह आज का ही दिन था, जब दुनिया में यह शाश्वत क़ायदा तय हो रहा था कि जिस्म से खून का क़तरा-क़तरा बह जाए मगर उस ताक़त के सामने मत झुकना, जो ज़ालिम हो। मोहर्रम और करबला हमारे दिलों को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मज़बूत करते हैं और कमज़ोर के साथ खड़े होने की ताकत व हिम्मत देते हैं।

आज हज़रत ईमाम हुसैन और उनके साथ शहीद हुए करबला के हर जाँबाज को अदब से याद करने का दिन है। यह हर उस इंसान की तारीख़ है, जो इंसाफ, बराबरी और हक के साथ खड़ा रहना चाहता है। हार और जीत कभी फौज की तादाद से तय नहीं होती; हार और जीत हमेशा उसूलों पर तय होती है, इंसाफ और सही रास्ते से तय होती है।

जिस यजीद को लगा था कि सर काटकर, तपती रेत में मुठ्ठीभर लोगों को क़त्ल करके वह जीत जाएगा, आज तारीख़ ने उसके मुँह पर ऐसी कालिख़ पोत दी है कि वह सिर्फ एक गाली बनकर रह गया है। इसके विपरीत, जो शहीद हुए, उनके किस्से करबला की रेत ने ज़माने पर ज़ाहिर कर दिए और कायनात ने उस शहादत को अपनी पलकों पर बैठा लिया।

🌍 समकालीन दौर में करबला का अक्स

नस्ल दर नस्ल, पीढ़ी दर पीढ़ी यह सबक़ गहरा होता जाएगा और हर ज़ालिम के ख़िलाफ़, यही हमारा परचम होगा। करबला का बेहतरीन सबक़ आज के दौर में भी प्रासंगिक है, जहाँ दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यवादी और ज़ुल्मी ताकतों के सामने बिना डरे, बिना हिचके हक की बात कहना और उस पर टिके रहना सिखाया जाता है। दुनियावी ताकतें और सियासतदान (जैसे ट्रम्प आदि) वक्त के साथ भुला दिए जाएंगे, लेकिन जो नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में हमेशा के लिए अमर रहेंगे, वो हैं हक के लिए डटने वाले रहनुमा। यही सबक़ करबला का है, जो हमेशा हम सबको रौशनी दिखाएगा।

हज़रत इमाम हुसैन और करबला के तमाम शहीदों को शत्-शत् नमन व सलाम, जिन्होंने हमारी जिंदगियों को फलसफा और सच्चाई के लिए निडर होकर लड़ना सिखाया!

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