‘चंदा नहीं, यह “चढ़ावा चोरी” का महापाप है! काशी विश्वनाथ न्यास के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने उठाए मंदिर प्रबंधन पर गंभीर सवाल; बोले— “गलाए न जाएं भगवान के आभूषण”‘

राम मंदिर विवाद के बीच काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का बड़ा बयान— 'चंदा नहीं, यह चढ़ावा चोरी का मामला है।' काशी विश्वनाथ मंदिर में पूर्व में हुई नकदी गिनती की गड़बड़ियों का किया खुलासा। चंपत राय की विधिक जिम्मेदारी और मंदिर आभूषणों को न गलाने की नीति पर उठाए गंभीर सवाल। पढ़ें PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी

वाराणसी (PNN24 News): अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन और विधिक अनियमितताओं की आंच अब देश के अन्य प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और देवस्थानों तक पहुंचने लगी है। इस महाघोटाले के सामने आने के बाद मंदिरों के आंतरिक वित्तीय प्रबंधन (Financial Management) में पारदर्शिता की मांग को लेकर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने व्यवस्थापकों को विधिक और पारंपरिक कटघरे में खड़ा कर दिया है।

आचार्य द्विवेदी ने न केवल राम मंदिर के घटनाक्रम पर अपनी बेबाक राय रखी, बल्कि काशी विश्वनाथ मंदिर के अतीत से जुड़े कई चौंकाने वाले विधिक उदाहरण भी सामने रखे।

🪙 ‘चंदा’ और ‘चढ़ावे’ का विधिक व धार्मिक अंतर

आचार्य अशोक द्विवेदी ने सबसे पहले मीडिया और प्रशासनिक हलकों में इस्तेमाल किए जा रहे शब्दों पर आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया:

“सनातन धर्म में मंदिर के भीतर श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित की जाने वाली सामग्री या धन को ‘चंदा’ कहना सर्वथा अनुचित है। चंदा किसी विशिष्ट सांसारिक उद्देश्य के लिए रसीद काटकर लिया जाता है, जबकि गर्भगृह में भक्त अपनी स्वेच्छा और अगाध श्रद्धा से ‘चढ़ावा’ या ‘दक्षिणा’ अर्पित करते हैं। इसलिए विधिक और नैतिक रूप से इसे ‘चंदा चोरी’ के बजाय ‘चढ़ावा गबन’ या ‘चढ़ावा चोरी’ कहा जाना चाहिए।”

🚨 काशी विश्वनाथ मंदिर का बड़ा खुलासा: “मैंने खुद पकड़ी थी बैंक कर्मियों की चोरी”

राम मंदिर में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के आउटसोर्सिंग कर्मियों पर उठ रहे सवालों के बीच आचार्य द्विवेदी ने काशी विश्वनाथ मंदिर का एक अत्यंत गंभीर और ऐतिहासिक उदाहरण साझा किया।

उन्होंने दावा किया कि अतीत में जब वे न्यास के अध्यक्ष थे, तब काशी विश्वनाथ मंदिर में भी चढ़ावे की गिनती के दौरान भारी प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताएं सामने आई थीं। नकदी गिनने की विधिक प्रक्रिया के दौरान बैंक के कुछ कर्मचारियों द्वारा पैसों के हेरफेर और गड़बड़ी की घटनाओं को उन्होंने खुद रंगे हाथों पकड़ा था। हालांकि, बाद में वहां कड़े विधिक उपाय लागू कर व्यवस्था को पूरी तरह दुरुस्त कर दिया गया। उन्होंने सचेत किया कि भ्रष्टाचार किसी एक मंदिर की बपौती नहीं है; जहां भी प्रशासनिक निगरानी (SOP Monitoring) कमजोर होगी, वहां तिजोरी पर डाका पड़ने की आशंकाएं हमेशा बनी रहेंगी।

⚖️ चंपत राय की विधिक जवाबदेही पर दो टूक

जब आचार्य द्विवेदी से राम मंदिर ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय की विधिक गिरफ्तारी को लेकर सीधा सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बहुत संतुलित लेकिन विधिक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि किसी की गिरफ्तारी या कानूनी शिकंजा कसने का अंतिम निर्णय पूरी तरह पुलिस और विधिक जांच एजेंसियों (SIT/CBI) के पाले में है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि इतने बड़े और पावन स्तर पर कोई वित्तीय गड़बड़ी या विधिक चूक हुई है, तो शीर्ष पद पर बैठे व्यक्तियों की नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय होना देश के कानून के तहत बेहद आवश्यक है।

🏛️ आभूषणों को गलाने के बजाय बने ‘भव्य संग्रहालय’

मंदिरों में जमा होने वाले सोने, चांदी और बहुमूल्य रत्नों को लेकर आचार्य द्विवेदी ने राज्य सरकारों और न्यासों को एक अत्यंत महत्वपूर्ण नीतिगत सुझाव दिया:

  1. परंपरा के विरुद्ध आभूषण गलाना: सनातन परंपरा और शास्त्रों में भगवान को अर्पित किए गए आभूषणों या देव प्रतिमाओं के विग्रह के अंगों के आभूषणों को गलाना (Melting) कतई उचित और शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है।
  2. पारदर्शी संग्रहालय (Museum Policy): उन्होंने सुझाव दिया कि इन आभूषणों को गलाने के बजाय मंदिरों में एक अति-सुरक्षित और भव्य संग्रहालय (Museum) स्थापित किया जाना चाहिए। वहां उन आभूषणों के साथ-साथ दानदाताओं का पूरा विवरण (Donor Directory) विधिक रूप से सुरक्षित रखा जाए। यदि दशकों बाद भी इनका उपयोग करना अनिवार्य हो, तो उसके लिए एक बेहद पारदर्शी और सार्वजनिक विधिक नीति बनाई जानी चाहिए।

📜 पूजा-पद्धति को शास्त्रसम्मत बनाने की मांग

वित्तीय गड़बड़ियों के अलावा, आचार्य द्विवेदी ने राम मंदिर की वर्तमान आंतरिक पूजा-पद्धति पर भी नीतिगत सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि श्री राम जन्मभूमि मंदिर में किसी भी प्रकार के असमंजस से बचने के लिए वैदिक परंपराओं के अनुरूप एक स्पष्ट, सर्वमान्य और शास्त्रसम्मत पूजा व्यवस्था (Standardised Ritual Protocol) को लिखित रूप में तय किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में सनातनी क्रियाओं के संचालन में कोई त्रुटि न हो।

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