वाराणसी पुलिस की जांच पर अदालत की भारी फटकार: एक्सिस बैंक फर्जीवाड़ा केस में ‘अंतिम रिपोर्ट’ खारिज, दोबारा जांच के आदेश
वाराणसी की अदालत ने एक्सिस बैंक फर्जी खाता मामले में पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अंतिम रिपोर्ट खारिज कर दी है। बुनकर के पैन कार्ड पर हुए 4.90 करोड़ के इस फर्जीवाड़े की जांच अब वाराणसी पुलिस कमिश्नर की निगरानी में दोबारा होगी। पूरी रिपोर्ट PNN24 News पर।

तारिक आज़मी
वाराणसी: यूपी की वाराणसी अदालत ने पुलिसिया कार्यप्रणाली और ढुलमुल जांच पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस कमिश्नरेट को तगड़ी फटकार लगाई है। मामला एक्सिस बैंक के एक फर्जी खाते से करीब 5 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन का है, जिसमें पुलिस ने बिना किसी ठोस कार्रवाई के केस रफा-दफा करने की कोशिश की थी। कोर्ट ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट (Final Report) को सिरे से खारिज करते हुए वाराणसी पुलिस कमिश्नर को अपनी सीधी निगरानी में मामले की दोबारा जांच (Re-investigation) कराने का सख्त हुक्म दिया है।
क्या है पूरा मामला? कैसे फंसा एक सीधा-साधा बुनकर?
यह पूरी कहानी वाराणसी के जैतपुरा के रहने वाले एक साधारण बुनकर एजाज अहमद की है। साल 2023 में उनके पैरों तले जमीन तब खिसक गई, जब आयकर विभाग (Income Tax Department) ने उन्हें एक नोटिस थमाया। नोटिस में लिखा था कि लखनऊ के गोमती नगर स्थित एक्सिस बैंक के एक खाते में उनके नाम पर 4 करोड़ 90 लाख रुपये जमा और निकाले गए हैं। विभाग ने उनसे इस भारी-भरकम रकम की कमाई का जरिया पूछा था।
एक गरीब बुनकर के लिए इतनी बड़ी रकम का नोटिस किसी सदमे से कम नहीं था। एजाज ने थानों और चौकियों के चक्कर काटे, लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने वाराणसी पुलिस कमिश्नर से गुहार लगाई। कमिश्नर के दखल के बाद जैतपुरा थाने में जालसाजी और धोखाधड़ी का मुकदमा (अपराध संख्या 92/2023) दर्ज हुआ।
जांच में खुली पोल: बैंक कर्मी की मिलीभगत और फर्जीवाड़ा
जब पुलिस ने शुरुआती जांच की, तो परतें खुलती चली गईं। पता चला कि खाता (नंबर 91101004587247) एजाज अहमद के पैन कार्ड का इस्तेमाल करके खोला गया था, लेकिन:
- खाते में लगी फोटो एजाज अहमद की नहीं थी।
- पैन कार्ड के अलावा बाकी सभी दस्तावेज पूरी तरह से फर्जी (कूटरचित) थे।
- खाते से जुड़ा मोबाइल नंबर लखनऊ के बक्शी का तालाब निवासी किसी अन्य व्यक्ति का था।
- खाते में जो पता दर्ज था, वहां एजाज या उनका कोई परिचित कभी रहा ही नहीं।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि एक्सिस बैंक के कर्मचारी अंसार जमाल (कर्मचारी आईडी: 16359) ने इस खाते को खोलने में मुख्य भूमिका निभाई थी। बैंक कर्मी ने बिना किसी जमीनी सच्चाई को जाने, सिर्फ कागजों पर ही ‘स्थल निरीक्षण’ (Physical Verification) दिखाकर यह फर्जी खाता चालू करवा दिया था।
अदालत क्यों हुई आगबबूला? पुलिस की संदिग्ध भूमिका पर उठाए सवाल
इतने सारे पुख्ता सबूत मिलने के बाद यह साफ हो चुका था कि एजाज अहमद निर्दोष हैं और उनके दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल कर कोई बड़ा रैकेट चलाया जा रहा था। इसके बावजूद, विवेचक (जांच अधिकारी) ने किसी भी आरोपी या संदिग्ध बैंक कर्मी की गिरफ्तारी किए बिना ही खेल खत्म करने की कोशिश की।
जांच अधिकारी ने 10 अक्टूबर 2025 को मामले में अपनी ‘अंतिम रिपोर्ट’ (केस बंद करने की रिपोर्ट) लगाकर फाइल एसीपी चेतगंज कार्यालय भेज दी। हद तो तब हो गई जब यह फाइल एक साल से ज्यादा समय तक एसीपी दफ्तर में धूल फांकती रही। इसके बाद, 4 दिसंबर 2025 को बिना किसी जिम्मेदार अधिकारी के हस्ताक्षर और बिना तारीख लिखे ही इसे अदालत में पेश कर दिया गया।
“अदालत ने पुलिस की इस लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर भारी नाराजगी जताई। जज ने पूछा कि आखिर किस दबाव या लालच में मुख्य आरोपियों को बचाकर केस को बंद करने की जल्दबाजी की जा रही थी?”
वरिष्ठ अधिवक्ता शिशिर सिंह की धारदार बहस
अदालत में वादी (एजाज अहमद) का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शिशिर सिंह ने पुलिस की इस कहानी की धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने कोर्ट के सामने अकाट्य तर्क रखते हुए बताया कि पुलिस की यह विवेचना न सिर्फ अधूरी है, बल्कि पूरी तरह तथ्यहीन और संदेहास्पद है। उन्होंने सवाल उठाया कि बैंक कर्मचारी और फर्जी मोबाइल नंबर धारक पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (आठवां) शिवम द्विवेदी ने अधिवक्ता शिशिर सिंह की दलीलों को सही पाया। कोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए अंतिम रिपोर्ट को वापस कर दिया।
अब आगे क्या?
अदालत के इस कड़े आदेश की गूंज अब लखनऊ तक सुनाई देगी, क्योंकि इस आदेश की प्रति प्रमुख गृह सचिव और डीजीपी (उत्तर प्रदेश सरकार) को भी भेज दी गई है। अब वाराणसी पुलिस कमिश्नर को खुद अपनी देखरेख में इस 5 करोड़ के बैंक घोटाले की नए सिरे से जांच करानी होगी। देखना यह है कि दोबारा शुरू हो रही इस जांच में एक्सिस बैंक के भ्रष्ट कर्मियों और इस फर्जीवाड़े के असली मास्टरमाइंड पर कानून का शिकंजा कब तक कसता है।













