‘अजब एमपी का गजब खेल: इंदौर में बिना जमीन और बिल्डिंग के ही खड़ा हो गया 100 बेड का अस्पताल; डॉक्टर-स्टाफ सब तैनात, पर इलाज के लिए ढूंढनी पड़ रही जगह!’
'अजब एमपी का गजब खेल': इंदौर के खजराना में 6 साल बाद भी 100 बेड के सरकारी अस्पताल को नहीं मिली जमीन, लेकिन कागजों पर नियुक्त हो चुका है 87 लोगों का पूरा स्टाफ। बिना बिल्डिंग के दूसरे अस्पतालों में ड्यूटी कर रहे हैं डॉक्टर और लैब टेक्नीशियन। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट पर सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी की सफाई। पढ़ें PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

शफी उस्मानी
इंदौर (PNN24 News): “मध्य प्रदेश अजब है, सबसे गजब है”— यह नारा पर्यटन विभाग का जरूर है, लेकिन सूबे का स्वास्थ्य विभाग इसे प्रशासनिक स्तर पर चरितार्थ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इंदौर के खजराना इलाके से एक ऐसा अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जहां शासन-प्रशासन के बीच पिछले छह सालों से ‘कागज-पत्तर’ की दौड़ तो जारी है, लेकिन धरातल पर 100 बिस्तरों (100 Beds) वाले अस्पताल के लिए अब तक जमीन की एक इंच जगह भी अलॉट नहीं हो पाई है। गजब खेल यह है कि बिना जमीन और बिना किसी ढांचे के, इस ‘हवाई अस्पताल’ के लिए डॉक्टरों और स्टाफ की नियुक्तियां धड़ल्ले से की जा रही हैं।
📅 6 साल पहले हुआ था ऐलान, 3 लाख आबादी आज भी बेहाल
खजराना और उसके आसपास के मूसाखेड़ी, तेजाजी नगर और बिचोली हप्सी जैसे क्षेत्रों की आबादी लगातार बढ़ रही है, जो वर्तमान में 3 लाख को पार कर चुकी है। इस बड़ी आबादी को स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश सरकार ने 23 जून 2020 को खजराना में 100 बेड का सिविल अस्पताल बनाने की मंजूरी दी थी।
उद्देश्य यह था कि इस अस्पताल के बनने से इंदौर के महाराजा यशवंतराव (MY) अस्पताल, पीसी सेठी अस्पताल, जिला अस्पताल और महाराजा तुकोजीराव होल्कर महिला अस्पताल (MTH) पर मरीजों का बढ़ता हुआ बोझ कम किया जा सके। लेकिन छह साल बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू होना तो दूर, जमीन आवंटन (Land Allotment) का मामला ही फाइलों में दबा हुआ है।
🧪 बिना अस्पताल के ही हो रही है स्टाफ की बहाली
मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जो अस्पताल जमीन पर अस्तित्व में ही नहीं है, उसके नाम पर नियुक्तियों के आधिकारिक आदेश जारी हो रहे हैं।
- ताजा नियुक्ति: ‘दैनिक भास्कर‘ की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, अभी हाल ही में 15 जून २०२६ को विभाग द्वारा जारी एक आदेश के तहत खजराना सिविल अस्पताल के नाम पर एक लैब टेक्नीशियन की बकायदा नियुक्ति कर दी गई है।
- 87 पद स्वीकृत: अस्पताल की मंजूरी के समय सरकार ने स्पेशलिस्ट डॉक्टरों, मेडिकल अफसरों, स्टाफ नर्सों, लैब टेक्नीशियनों और फार्मासिस्टों सहित कुल 87 पदों को स्वीकृत किया था। पिछले चार-पाँच सालों में इस कागजी अस्पताल के नाम पर लगातार नियुक्तियां की जाती रहीं।
🏥 दूसरे अस्पतालों में ‘एडजस्ट’ हो रहा है स्वीकृत स्टाफ
अब सवाल यह उठता है कि जब खजराना में कोई बिल्डिंग ही नहीं है, तो यह स्टाफ अपनी ड्यूटी कहाँ दे रहा है और इन्हें सैलरी किस बात की मिल रही है?
इस प्रशासनिक विसंगति पर सफाई देते हुए इंदौर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव हसानी दैनिक भाष्कर ने बताया:
“खजराना में प्रस्तावित 100 बेड के अस्पताल के लिए अभी तक उपयुक्त जमीन आवंटित नहीं हो पाई है। इस विधिक व प्रशासनिक विषय को लेकर उच्च स्तर पर लगातार पत्राचार और बैठकें जारी हैं। चूंकि वहां के लिए स्टाफ की नियुक्तियां स्वीकृत हो चुकी थीं, इसलिए संसाधनों का सही इस्तेमाल करने के लिए हमने उस स्टाफ को फिलहाल पीसी सेठी अस्पताल, हुकुमचंद अस्पताल और अन्य सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर अटैच (संबद्ध) कर रखा है, जहाँ वे अपनी सेवाएं दे रहे हैं।”
📉 जनता के साथ खिलवाड़ और प्रशासनिक विफलता
स्थानीय निवासियों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारियों की ढिलाई और वरिष्ठ स्तर पर समन्वय की कमी के कारण यह महत्वपूर्ण स्वास्थ्य परियोजना सिर्फ विभागीय रिकॉर्ड तक ही सिमट कर रह गई है। यदि समय रहते जमीन आवंटित कर निर्माण पूरा कर लिया जाता, तो खजराना की 3 लाख से अधिक जनता को इलाज के लिए मीलों दूर बड़े अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ते और न ही वहां पैर रखने की जगह के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती।










