‘देश में पहली बार: मध्य प्रदेश वक़्फ़ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति; नया कानून लागू कर MP बना पहला राज्य, भोपाल से लेकर दिल्ली तक विधिक व सियासी घमासान!’
'वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम 2025' के तहत मध्य प्रदेश ने रचा इतिहास; वक़्फ़ बोर्ड में पहली बार दो गैर-मुस्लिम सदस्यों अनिमेष भार्गव और मनोज मालपानी की नियुक्ति। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का बड़ा दावा। फैसले के खिलाफ भोपाल में ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी और कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद का तीखा विरोध, सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी। पढ़ें PNN24 की विशेष विधिक रिपोर्ट।

आफताब फारुकी
भोपाल (PNN24 News): मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार ने केंद्रीय वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के प्रावधानों को धरातल पर उतारते हुए एक अत्यंत बड़ा और देश का पहला नीतिगत फैसला लिया है। राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश वक़्फ़ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए इतिहास में पहली बार दो गैर-मुस्लिम चेहरों को बोर्ड का आधिकारिक सदस्य मनोनीत किया है। मुख्यमंत्री के दावों के मुताबिक, नए संशोधित वक़्फ़ कानून के तहत इस प्रकार का प्रगतिशील और पारदर्शी बोर्ड गठित करने वाला मध्य प्रदेश पूरे देश का पहला सूबा बन गया है。

💼 कौन हैं बोर्ड में शामिल हुए दो गैर-मुस्लिम सदस्य?
बोर्ड में शामिल किए गए दोनों गैर-मुस्लिम चेहरे प्रशासनिक, वित्तीय और सामाजिक रूप से लंबा अनुभव रखते हैं, हालांकि उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं:
- अनिमेष भार्गव (गुना): राघौगढ़ के निवासी अनिमेष भार्गव ने एमबीए (फाइनेंस) की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और उनके पास बैंकिंग सेक्टर का लगभग 18 वर्षों का लंबा अनुभव है। इसके अतिरिक्त, वे पिछले 8 वर्षों से वक़्फ़ संपत्तियों के विधिक व प्रशासनिक प्रबंधन का अध्ययन कर रहे हैं。 वर्तमान में वे भाजपा (BJP) के मीडिया पैनलिस्ट के रूप में भी सक्रिय हैं। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा— “मेरी प्राथमिकता वक़्फ़ बोर्ड के बेहतर संचालन, संपत्तियों और वित्तीय संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने तथा बोर्ड की आय बढ़ाने की होगी।”
- मनोज मालपानी (इंदौर): स्नातक मनोज मालपानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के समर्पित कार्यकर्ता हैं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि बीजेपी से उनका कोई सीधा संगठनात्मक संबंध नहीं है। वे पिछले कई वर्षों से वक़्फ़ संपत्तियों से जुड़े विधिक मामलों का गहरा अध्ययन कर रहे हैं। मालपानी का मानना है कि बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी से विधिक फैसलों में संतुलन आएगा और जनता का भरोसा मजबूत होगा।
🚨 भोपाल में फूटा गुस्सा: ‘अल्लाह की रज़ा की संपत्ति में दखल बर्दाश्त नहीं’
सरकार के इस आदेश पत्र के जारी होते ही राजधानी भोपाल में विरोध की लपटें तेज हो गई हैं। सोमवार को ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी के बैनर तले सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पोस्टरों के साथ सड़कों पर उतरकर भारी विरोध प्रदर्शन किया।
कमेटी के संरक्षक शमशुल हसन ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा:
“वक़्फ़ कोई विशुद्ध प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज की एक बेहद पवित्र धार्मिक और सामाजिक अमानत है, जहाँ लोग अपनी निजी संपत्तियाँ सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए वक़्फ़ (दान) करते हैं। ऐसे में इसके प्रबंधन में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति किसी भी स्तर पर शास्त्रसम्मत और मजहबी तौर पर उचित नहीं है。 यदि सरकार को विशेषज्ञ ही चाहिए थे, तो मुस्लिम समुदाय के भीतर ही रिटायर्ड IAS-IPS, डॉक्टर और इंजीनियरों की कोई कमी नहीं थी।”
शमशुल हसन ने एक बड़ा नीतिगत सवाल दागते हुए कहा कि जब मुस्लिम समाज ने कभी अयोध्या, सोमनाथ या मथुरा जैसे सनातनी व हिंदू धार्मिक ट्रस्टों के प्रबंधन में अपने प्रतिनिधित्व की मांग नहीं की, तो फिर वक़्फ़ बोर्ड में इस प्रकार की जबरन एंट्री की आवश्यकता क्यों पड़ी?
🏛️ कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद की चुनौती— ‘मामला सुप्रीम कोर्ट में है, सरकार ने की जल्दबाजी’
भोपाल मध्य सीट से कांग्रेस के फायरब्रांड विधायक आरिफ मसूद ने इस पुनर्गठन को पूरी तरह विधिक कटघरे में खड़ा कर दिया है। उन्होंने एक आपातकालीन प्रेस वार्ता में सरकार पर नियमों की अनदेखी का आरोप लगाया। मसूद ने तर्क दिया कि केंद्रीय वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता (Constitutional Validity) को चुनौती देने वाली कई मुख्य याचिकाएं पहले से ही देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) में लंबित हैं。 ऐसे में न्यायिक फैसले से पहले इतनी जल्दबाजी में बोर्ड का गठन करना पूरी तरह असंवैधानिक है。
मसूद ने विधिक दावा किया कि कानून में अन्य समुदायों के केवल दो प्रतिनिधियों का प्रावधान है, जबकि राज्य सरकार ने कथित रूप से तीन गैर-मुस्लिम प्रतिनिधियों को बैकडोर से जगह दी है, जिसके खिलाफ वे जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
⚖️ सरकार का विधिक बचाव: ‘मस्जिद नहीं, वक़्फ़ संपत्तियों का प्रशासन है यह’
विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के चौतरफा हमलों के बीच प्रदेश सरकार के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने इस ऐतिहासिक फैसले का पुरजोर विधिक बचाव किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री और नवनियुक्त बोर्ड को बधाई देते हुए कहा कि मध्य प्रदेश का यह कदम देश के लिए नजीर बनेगा。
मंत्री सारंग ने स्पष्ट विधिक अंतर समझाते हुए कहा:
“वक़्फ़ बोर्ड को केवल एक ‘मस्जिद प्रबंधन समिति’ के संकीर्ण चश्मे से देखना पूरी तरह गलत होगा। बोर्ड की मुख्य विधिक जिम्मेदारी सिर्फ मस्जिदों के धार्मिक कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पास अरबों रुपये की विशाल वक़्फ़ संपत्तियों के व्यावसायिक प्रशासन, भू-संरक्षण और वित्तीय प्रबंधन का जिम्मा होता है। नया ढांचा आने से इन संपत्तियों में चल रहा भ्रष्टाचार खत्म होगा, और पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित होगी।”
जहाँ मुस्लिम पर्सनल लॉ और संगठनों में इस बात को लेकर भारी असहजता है, वहीं श्री हिंदू उत्सव समिति और संस्कृति बचाओ मंच के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी जैसे हिंदू संगठनों ने सरकार के इस विधिक निर्णय का स्वागत करते हुए इसे वक़्फ़ के एकतरफा एकाधिकार को समाप्त करने वाला बताया है।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकीं देश भर की नजरें
इस विवाद की अंतिम परिणति अब देश की सर्वोच्च अदालत के विधिक निर्णय पर निर्भर करेगी。 उल्लेखनीय है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूर्व में केंद्र सरकार से इस संशोधित कानून पर बेहद कड़े सवाल पूछे थे। शीर्ष अदालत ने पूछा था कि यदि वक़्फ़ बोर्डों में गैर-मुस्लिमों को शामिल किया जा रहा है, तो क्या भविष्य में मुस्लिम समुदाय के योग्य नागरिकों को भी हिंदू धार्मिक ट्रस्टों और देवस्थानम प्रबंधनों में शामिल होने की विधिक अनुमति दी जाएगी? कोर्ट ने ‘वक़्फ़ बाय यूजर’ (Waqf by User) जैसे महत्वपूर्ण क्लॉज पर भी स्पष्टीकरण मांगा है。
मध्य प्रदेश का यह प्रयोग अब देश के अन्य राज्यों के लिए एक विधिक लिटमस टेस्ट बन चुका है, जिसके सामाजिक और राजनैतिक परिणाम बेहद दूरगामी होंगे।










