‘पीएम मोदी की न्यूज़ीलैंड यात्रा: “प्रेस कॉन्फ्रेंस” पर विदेश मंत्रालय के “डेजा वू” बयान से मचा बवाल; हेला लेंग का तंज, विपक्ष बोला— कमरे से बाहर निकला लोकतंत्र!’
पीएम मोदी की न्यूज़ीलैंड यात्रा और प्रेस कॉन्फ्रेंस पर बढ़ा वैश्विक विवाद। विदेश मंत्रालय के सचिव रुद्रेंद्र टंडन के 'डेजा वू' और 'ग्रामीण मतदाता' वाले तर्क पर कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत और पवन खेड़ा का तीखा पलटवार। नॉर्वे की पत्रकार हेला लेंग ने कूटनीतिक जवाब पर उठाए सवाल। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 में भारत 157वें पायदान पर। पढ़ें PNN24 की विशेष कूटनीतिक व राजनीतिक विधिक रिपोर्ट।

तारिक खान
PNN24 News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की आधिकारिक यात्रा का अंतिम पड़ाव (न्यूज़ीलैंड विज़िट) द्विपक्षीय समझौतों से ज्यादा अब एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक और मीडिया विवाद को लेकर सुर्खियों में आ गया है। रविवार को विदेश मंत्रालय की एक विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जब एक विदेशी महिला पत्रकार ने पूछा कि प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूज़ीलैंड के पत्रकारों के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की, तो इस पर मिले आधिकारिक कूटनीतिक जवाब ने सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक एक नई बहस छेड़ दी है।
🗣️ “यह सवाल एक देजा वू है”— विदेश मंत्रालय के सचिव रुद्रेंद्र टंडन का तर्क
सवाल सुनते ही मंच पर मौजूद विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) रुद्रेंद्र टंडन मुस्कुराए और कहा कि इस सवाल ने उन्हें एक तरह का ‘डेजा वू’ (Deja Vu – ऐसा लगना कि यह पहले भी हो चुका है) महसूस कराया। उनका इशारा पिछले महीने नॉर्वे में हुए ठीक ऐसे ही एक विवाद की तरफ था।
प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक कार्यशैली और सीधे संवाद की कला का विधिक व प्रशासनिक बचाव करते हुए रुद्रेंद्र टंडन ने कहा:
“एक सिविल सेवक के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक कार्यशैली पर सवाल उठाना मेरे लिए उचित नहीं है, क्योंकि वह एक बेहद सफल राजनेता हैं। लेकिन मैं आपको इसका संदर्भ देना चाहता हूँ। पीएम मोदी एक विशुद्ध भारतीय राजनेता हैं और आमतौर पर भारतीय राजनेता अपने मतदाताओं से सीधे संपर्क को प्राथमिकता देते हैं।”

“आपको यह भी याद रखना चाहिए कि भारत का अधिकांश मतदाता वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। वे सीधे संवाद को पसंद करते हैं। उन्हें ऊपर से समझाया जाना या बिचौलियों (मीडिया) के ज़रिए बात पहुँचाना पसंद नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मतदाताओं से सीधे संवाद करने की कला में महारत हासिल की है और यही वजह है कि वह लगातार तीसरी बार निर्वाचित होकर देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्रियों में से एक हैं।”
🇳🇴 नॉर्वे की पत्रकार हेला लेंग का पलटवार— “क्या वह रोज़मर्रा के मुद्दों पर जवाब देते हैं?”
विदेश मंत्रालय के इस बयान का वीडियो क्लिप जैसे ही वायरल हुआ, बीते मई महीने में ओस्लो (नॉर्वे) में पीएम मोदी से सवाल पूछने का प्रयास करने वाली नॉर्वे की चर्चित पत्रकार हेला लेंग ने इसे अपने ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) हैंडल पर शेयर करते हुए तीखा विधिक और तार्किक तंज कसा।
हेला लेंग ने लिखा:
“यह दिलचस्प जवाब था। क्या इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री आमतौर पर टाउन हॉल जैसे कार्यक्रमों में लोगों से मिलते हैं और उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं से जुड़े सवालों के जवाब देते हैं? मैंने तो उन्हें कभी ज़मीनी स्तर के आंदोलन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के साथ सीधे संवाद करते नहीं देखा है। अगर मैं ग़लत हूँ, तो कृपया मुझे सुधारिए।”
गौरतलब है कि मई में नॉर्वे के पीएम योनास गार स्टोरे के साथ मीटिंग के बाद जब पीएम मोदी जा रहे थे, तब हेला लेंग ने उनसे सवाल पूछना चाहा था, लेकिन पीएम मोदी आगे बढ़ गए थे, जिसके बाद ओस्लो में भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव सीबी जॉर्ज और प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के साथ पत्रकारों की तीखी नोंकझोंक हुई थी।
🔥 “तर्क और लोकतंत्र कमरे से बाहर चले गए”— कांग्रेस का चौतरफा हमला
विदेश मंत्रालय के इस कूटनीतिक तर्क पर भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने सरकार को आड़े हाथों लिया है।
- सुप्रिया श्रीनेत (कांग्रेस प्रवक्ता): उन्होंने वीडियो साझा करते हुए लिखा, “तर्क सबसे पहले कमरे से बाहर चला गया। उसके बाद जवाबदेही भी चली गई। फिर लोकतंत्र भी पीछे-पीछे निकल गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद सवाल पूछना, जवाब मांगना और सरकारों को जवाबदेह ठहराना होता है। एकतरफा संवाद कभी भी सार्वजनिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।”
- पवन खेड़ा (वरिष्ठ कांग्रेस नेता): उन्होंने तीखा रुख अपनाते हुए कहा, “टंडन जी की टिप्पणी मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, को सरकार की सुविधा का विषय बनाकर पेश करती है। हकीकत यह है कि जनता तक सीधे पहुंच बनाना, मीडिया की जवाबदेही तय करने वाली भूमिका का विकल्प नहीं हो सकता। यह तर्क बेहद कमज़ोर है और स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ है।”
📈 ‘कंटेंट’ बनाम ‘जवाबदेही’ और वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का सच
इस पूरे विवाद पर पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने एक अलग दृष्टिकोण रखते हुए एक्स पर लिखा कि विदेशी पत्रकारों को अब समझ आ गया है कि भारत में सुर्खियां बटोरने और फॉलोअर्स बढ़ाने का सबसे आसान तरीका प्रधानमंत्री से प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल पूछना है। उन्होंने कहा कि हम जवाबदेही वाली पत्रकारिता के नहीं, बल्कि कंटेंट आधारित पत्रकारिता के दौर में जी रहे हैं। वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश कामत ने भारत में मीडिया साक्षरता और निष्पक्ष विचारों को मजबूत करने पर जोर दिया।
इस पूरे विवाद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों के बीच प्रेस स्वतंत्रता की रैंकिंग की तुलना को भी हवा दे दी है। पेरिस स्थित नॉन-प्रॉफ़िट संगठन ‘रिपोर्टर्स सां फ़्रोंतिए’ (RSF) द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार:
- नॉर्वे: लगातार पिछले 10 वर्षों से दुनिया में नंबर 1 स्थान पर काबिज है।
- न्यूज़ीलैंड: 77.38 के मजबूत स्कोर के साथ वैश्विक रैंकिंग में 22वें नंबर पर है।
- भारत: 31.96 के बेहद कम स्कोर के साथ 180 देशों की इस सूची में 157वें पायदान पर खिसक चुका है।
विपक्ष इसी गिरती रैंकिंग को आधार बनाकर लगातार सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठा रहा है। PNN24 News इस अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलचल और वैश्विक पटल पर भारत की छवि से जुड़ी हर एक राजनीतिक अपडेट आप तक निष्पक्षता से पहुँचाता रहेगा।











