‘दालमंडी मस्जिद निसारन कांड: कथित मुतवल्ली आज़म की ज़मानत याचिका जिला कोर्ट से खारिज; वक्फ संपत्ति पर कब्जे और फर्जीवाड़े में वकीलों की दलीलें पड़ीं भारी!’
वाराणसी दालमंडी मस्जिद निसारन विवाद: कथित मुतवल्ली मोहम्मद आज़म की ज़मानत याचिका जिला अदालत से खारिज। अपर सत्र न्यायाधीश आलोक कुमार की अदालत में अधिवक्ता मोहिउद्दीन खान 'रॉकी' और अनिल कुमार सिंह की विधिक दलीलों पर लगी मुहर। कूटरचित दस्तावेजों और वक्फ संपत्ति पर अवैध कब्जे के आरोप में हुआ था जेल। पढ़ें PNN24 की विशेष कोर्ट रिपोर्ट।

शफी उस्मानी
वाराणसी (PNN24 News): वाराणसी के सबसे चर्चित दालमंडी चौड़ीकरण अभियान के बीच वक्फ संपत्तियों और धार्मिक स्थलों की विधिक कमान को लेकर छिड़ा विवाद अब अदालत की चौखट पर बेहद आक्रामक रूप ले चुका है। वाराणसी के अपर सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) आलोक कुमार की विधिक अदालत ने धोखाधड़ी, कूटरचित (फर्जी) दस्तावेज तैयार करने और ऐतिहासिक मस्जिद निसारन पर अवैध कब्जे का प्रयास करने के आरोपी मोहम्मद आज़म की जमानत प्रार्थना पत्र को विधिक रूप से खारिज (Bail Rejected) कर दिया है।
अदालत ने जमानत का कड़ा विरोध कर रहे वरिष्ठ विधिक अधिवक्ताओं की दलीलों को तवज्जो देते हुए आरोपी को सलाखों के पीछे ही रखने का विधिक आदेश सुनाया है।
⚖️ कोर्ट रूम लाइव: वकीलों की इन दलीलों पर जज ने लगाई मुहर
शनिवार को जिला अदालत में आरोपी आज़म की जमानत याचिका पर दोनों पक्षों के बीच लंबी विधिक बहस हुई। अभियोजन और वादी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे प्रख्यात अधिवक्ता मोहिउद्दीन खान ‘रॉकी’ और पूर्व डीजीसी (DGC) अनिल कुमार सिंह ने अदालत के समक्ष आरोपी के खिलाफ पुख्ता विधिक साक्ष्य पेश किए।
अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलों में कहा:
“आरोपी मोहम्मद आज़म ने अत्यंत सुनियोजित विधिक साजिश के तहत पवित्र धार्मिक और वक्फ संपत्ति के दस्तावेजों के साथ हेरफेर की है। यदि ऐसे रसूखदार आरोपी को इस मोड़ पर जमानत दी जाती है, तो वह न सिर्फ दालमंडी चौड़ीकरण की विधिक शांति व्यवस्था को प्रभावित करेगा, बल्कि मुख्य विधिक साक्ष्यों (Evidence Tampering) के साथ भी खिलवाड़ कर सकता है।”
अदालत ने इन तर्कों को न्यायसंगत मानते हुए आज़म की जमानत अर्जी को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।
🕌 उहापोह की स्थिति: एक मस्जिद के दो मुतवल्ली कैसे हुए?
दालमंडी चौड़ीकरण की जद में आने वाली मस्जिदों में ‘मस्जिद निसारन’ को लेकर विवाद उस समय गहरा गया था, जब इस वक्फ संपत्ति का खुद को असली मुतवल्ली बताते हुए मोहम्मद आज़म ने प्रशासनिक मुआवजा और नियंत्रण अपने हाथों में लेने का दावा ठोक दिया। जबकि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के आधिकारिक विधिक दस्तावेजों पर मस्जिद के वास्तविक मुतवल्ली शकील दर्ज थे। ऐसे में जिला प्रशासन और वक्फ बोर्ड के सामने एक अजीब उहापोह (असमंजस) की स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि कानूनन एक मस्जिद के दो मुतवल्ली कैसे हो सकते हैं?
📁 कूटरचित दस्तावेजों से 1200 वर्ग फीट के हॉल पर कब्जे का था खेल
PNN24 News की खोजी विधिक टीम को मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े का खेल कुछ इस प्रकार रचा गया था:
- नगर निगम में फर्जी नाम दर्ज: वादी मुकदमा (शकील) ने दावा किया कि वह उक्त वक्फ संपत्ति मस्जिद निसारन के कानूनी मुतवल्ली हैं। मगर जहांगीर पुत्र जलील नामक व्यक्ति ने पहले कुछ कूटरचित (फर्जी) दस्तावेजों के आधार पर खुद को मुतवल्ली दर्शाते हुए नगर निगम के अभिलेखों में अपना नाम चालाकी से दर्ज करवा लिया था।
- प्रतिनिधि बनकर कब्जे का प्रयास: इसके बाद मुख्य आरोपी आज़म ने जलील के वंशजों को विधिक व आर्थिक रूप से बहला-फुसलाकर वक्फ संपत्ति मस्जिद निसारन में खुद को ‘मुतवल्ली प्रतिनिधि’ घोषित करवा लिया।
- चौक थाने में एफआईआर और गिरफ्तारी: इस कथित फर्जी विधिक हैसियत का इस्तेमाल कर आज़म ने मस्जिद के प्रथम तल पर स्थित 1200 वर्ग फीट के विशाल हॉल पर अवैध रूप से कब्जा करने का प्रयास किया। जिसके बाद वास्तविक मुतवल्ली ने तत्काल चौक थाने में गंभीर विधिक धाराओं के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज कराई। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी आज़म को धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
बताते चले कि आज़म पर एक और ऍफ़आईआर रंगदारी मागने की दो दुकानदारों के द्वारा भी दर्ज करवाया गया है, जिसमे उनकी दुकानों पर कब्ज़े के बदले पैसे मांगने का आज़म पर आरोप है।











