‘PNN24 स्पेशल: 100 साल पुरानी यह लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी मंदिर व ट्रस्टों के लिए नजीर; जानिए ‘सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925’ कैसे सुनिश्चित करता है पारदर्शिता’
धार्मिक स्थलों व मंदिर ट्रस्टों के प्रबंधन के लिए मिसाल बनी 100 साल पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था! 'सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925' ने कैसे दान की चोरी रोकी और वित्तीय पारदर्शिता कायम की? गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अमरजीत सिंह के विचार और PNN24 की विशेष रिपोर्टर महविश कुरैशी की खास पड़ताल।

विशेष रिपोर्ट: महविश कुरैशी
PNN24 News: देशभर में प्रमुख धार्मिक स्थलों, मठों और विशाल मंदिर ट्रस्टों के प्रबंधन और चढ़ावे के पारदर्शी हिसाब-किताब को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। सरकारी नियंत्रण और कानूनी बोर्डों के अधीन संचालित होने वाले कई बड़े मंदिर भी समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं या विवादों से पूरी तरह खुद को मुक्त नहीं रख पाए हैं।

📜 ‘सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925’ से मिलती है लोकतांत्रिक ताकत
धार्मिक पूजा स्थलों के प्रबंधन की यह पारदर्शी व्यवस्था ‘सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925’ (Sikh Gurdwaras Act, 1925) के तहत संचालित होती है। यह ऐतिहासिक कानून मूल रूप से ब्रिटिश काल के दौरान गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के बाद अस्तित्व में आया था, जिसे आजादी के बाद स्वतंत्र भारत की संसद ने भी पूर्ण स्वीकृति दी।
इस कानून के स्थायित्व और दूरदर्शिता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी स्थापना से लेकर आज तक इस अधिनियम में केवल तीन बार ही संशोधन किए गए हैं, जो इसके मूल लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती और प्रासंगिकता को दर्शाता है।
💰 चढ़ावे और दान की चोरी रोकने में कारगर मॉडल
धार्मिक मामलों और प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून ने धार्मिक संस्थाओं में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले दान, गुप्त दान और चढ़ावे की चोरी व दुरुपयोग को रोकने में निर्णायक भूमिका निभाई है।
इस ऐतिहासिक व्यवस्था की सराहना करते हुए गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (GNDU) के धार्मिक अध्ययन विभाग के प्रोफेसर व डीन अमरजीत सिंह ने कहा:
“आज भी यह व्यवस्था बहुत पारदर्शी है। जहाँ एक तरफ कई सरकारी या निजी नियंत्रण वाले धार्मिक संस्थान वित्तीय अनियमितताओं और विवादों के घेरे में आ जाते हैं, वहीं यह लोकतांत्रिक मॉडल प्रबंधन में स्पष्टता, सेवा और सार्वजनिक जवाबदेही बनाए रखने में बेहद कारगर साबित हुआ है।”
🏛️ क्यों खास है यह प्रबंधन मॉडल?
- सच्चा लोकतंत्र: गुरुद्वारों का प्रबंधन सीधे संगत (श्रद्धालुओं) द्वारा चुनी गई प्रतिनिधि संस्थाओं (जैसे SGPC आदि) द्वारा किया जाता है।
- सार्वजनिक ऑडिट: वित्तीय प्रवाह और दान का नियमित रूप से कड़ा ऑडिट होता है, जिससे भ्रष्टाचार की गुंजाइश न के बराबर रहती है।
- कम संशोधन, ज्यादा असर: 100 वर्षों में सिर्फ 3 संशोधनों के साथ यह कानून साबित करता है कि धार्मिक निष्ठा और लोकतांत्रिक मूल्यों का संतुलन कैसे दीर्घकालिक हो सकता है।











