‘PNN24 स्पेशल: “बाबू जी…! ज़रा संभल कर, आपके फेंके हुए कचरे में मेरी रोटी भी है”; एक तस्वीर जो सिस्टम और समाज को आईना दिखाती है’

"बाबू जी...! ज़रा संभल कर, आपके फेंके हुए कचरे में मेरी रोटी भी है"— PNN24 की सहयोगी महविश कुरैशी की एक तस्वीर ने उठाए समाज और सिस्टम पर गंभीर सवाल। ढलती उम्र में कचरा बीनने को मजबूर बुजुर्गों और मासूम बच्चों की दर्दनाक दास्तां। कागजों में सिमटती सरकारी योजनाएं और दावे। पढ़ें PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी (फोटो क्रेडिट: महविश कुरैशी)

वाराणसी/न्यूज़ डेस्क (PNN24 News): “बाबू जी…! ज़रा संभल कर, आपके फेंके हुए कचरे में मेरी रोटी भी है…” — यह महज कुछ शब्द नहीं, बल्कि उस कड़वी और नग्न सच्चाई का बयान हैं जो रोज हमारी और आपकी नजरों के सामने से गुजरती है, लेकिन हम अक्सर नजरें चुराकर आगे बढ़ जाते हैं।

हाल ही में हमारी सहयोगी महविश कुरैशी ने एक ऐसी ही मार्मिक और संवेदनात्मक तस्वीर अपने कैमरे में कैद की। तस्वीर में एक वयोवृद्ध बुजुर्ग हाथों में बोरी लिए कचरे के ढेर से प्लास्टिक की बोतलें और कबाड़ चुनते दिखाई दे रहे हैं। गोपनीयता और सम्मान का ध्यान रखते हुए महविश ने तस्वीर ऐसे कोण से ली कि बुजुर्ग का चेहरा तो सामने नहीं आया, लेकिन उनके संघर्ष की पूरी कहानी बयां हो गई।

👵 उम्र की जिस दहलीज़ पर आराम होना चाहिए, वहां हाथों में बोरी है!

यह तस्वीर समाज और सरकार दोनों के गाल पर एक करारा तमाचा है। जिस उम्र में एक बुजुर्ग को अपने घर में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ आराम से दो वक्त की रोटी मिलनी चाहिए, उस उम्र में वे ढलती सांसों के साथ सड़क किनारे कचरे में अपनी आजीविका तलाश रहे हैं।

कहने को तो केंद्र और राज्य सरकारों की दर्जनों कल्याणकारी योजनाएं हैं— बुजुर्गों के लिए पेंशन, शेल्टर होम, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य योजनाएं। लेकिन सवाल यह है कि सरकारी योजनाओं की धरातल (Ground Level) पर पहुंच कितनी है? अगर ये योजनाएं वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच रही हैं, तो यह बुजुर्ग आज कचरे के ढेर में रोटी क्यों तलाश रहा है?

👶 मासूमों का छिनता बचपन: कागज़ों पर दौड़ते NGO और खामोश सिस्टम

सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं, देश और प्रदेश की गलियों-मोहल्लों में सुबह-तड़के और देर रात पीठ पर भारी बोरी लादे कचरा बीनते छोटे-छोटे मासूम बच्चे भी अक्सर मिल जाएंगे।

  • कागज़ी दावे: ऐसे बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा और आवास के नाम पर दर्जनों गैर-सरकारी संगठन (NGO) काम करने का दावा करते हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर का काम सिर्फ फाइलों, बैठकों और सरकारी अनुदानों तक ही सीमित रह जाता है।
  • आवास का अभाव: बेसहारा और कचरा बीनने वाले इन मासूमों के लिए स्थायी सरकारी व्यवस्था और पुनर्वास केंद्रों की कमी आज भी एक बड़ा सच बनी हुई है।

🌱 PNN24 की अपील: कचरा फेंकने से पहले ज़रा सोचिए!

अगली बार जब आप अपने घरों या दुकानों से कांच, नुकीली चीजें या जहरीला कचरा खुले में फेंकें, तो एक बार जरूर सोचिएगा कि आपके फेंके हुए उस कचरे में किसी गरीब की रोटी भी छिपी हुई है। आपकी एक छोटी सी सावधानी किसी बुजुर्ग या मासूम के हाथों को जख्मी होने से बचा सकती है।

इसके साथ ही PNN24 News शासन और प्रशासन से यह मांग करता है कि कागजी आंकड़ों से बाहर निकलकर ऐसे असहाय बुजुर्गों और बेसहारा बच्चों तक सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ पहुंचाया जाए।

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