“तकनीकी बातों में नहीं उलझ सकते, शिकायत की होगी जांच”— मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के कथित पुलिस निर्देशों पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित’
मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के कथित मौखिक पुलिस निर्देशों के खिलाफ जनहित याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। एक्टिंग चीफ जस्टिस तपाब्रत चक्रवर्ती की बेंच ने सुनीं एडवोकेट जनरल और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी की दलीलें। पढ़ें PNN24 की लीगल रिपोर्ट।

महविश कुरैशी
कोलकाता/नई दिल्ली (PNN24 News): पश्चिम बंगाल में अनुमत ध्वनि सीमा के उल्लंघन का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए बिना पुलिस अधिकारियों द्वारा मस्जिद समितियों को कथित तौर पर लाउडस्पीकर हटाने के मौखिक निर्देश देने का मामला अब अदालत के दरवाजे पर पहुंच गया है। इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर कलकत्ता हाईकोर्ट की एक्टिंग चीफ जस्टिस तपाब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस अतारुप बनर्जी की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत बहस सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
🏛️ राज्य सरकार का पक्ष: “आरोप बेबुनियाद, पुलिस ने नहीं दिए कोई निर्देश”
राज्य सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल (AG) सूरजीत नाथ मित्रा ने जनहित याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर कड़ा ऐतराज जताया:
- आरोपों का खंडन: एजी ने स्पष्ट किया कि पुलिस प्रशासन द्वारा मस्जिद समितियों के साथ ऐसी कोई बैठक नहीं की गई और न ही लाउडस्पीकर हटाने का कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिया गया।
- तथ्यों की कमी: उन्होंने तर्क दिया कि याचिका एक वकील द्वारा दायर की गई है, जिसमें इमामों या मस्जिद प्रतिनिधियों का सीधे शामिल होना दर्ज नहीं है। साथ ही, किसी विशिष्ट पुलिस अधिकारी या आदेश का उल्लेख किए बिना केवल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं।
⚖️ याचिकाकर्ता का तर्क: “ध्वनि सीमा के भीतर बिना नियम उल्लंघन के कार्रवाई गलत”
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने राज्य की आपत्तियों का जोरदार विरोध किया:
- जनहित याचिका का स्वरूप: कल्याण बनर्जी ने कहा कि जनहित याचिका को सामान्य सिविल सूट की तरह नहीं देखा जा सकता, जहां हर तकनीकी तथ्य पहले से साबित हो। इसका उद्देश्य व्यापक जनहित और प्रशासनिक कमियों को उजागर करना है।
- मौखिक निर्देशों की नई व्यवस्था: उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में बिना कोई लिखित नोटिस या आधिकारिक आदेश जारी किए सीधे मौखिक निर्देश देकर कार्रवाई करने की नई परिपाटी शुरू हो गई है।
- सुप्रीम कोर्ट के नियम: वरिष्ठ अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता असीमित ध्वनि में लाउडस्पीकर बजाने की छूट नहीं मांग रहा है, बल्कि मांग यह है कि जब तक ध्वनि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मानकों और निर्धारित डेसिबल सीमा के भीतर है, तब तक पुलिस को केवल मौखिक आदेशों के आधार पर हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
💬 अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जनहित याचिका के मामलों में तकनीकी बारीकियों को मूल समस्या पर हावी नहीं होने दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि नागरिकों की ओर से कोई वास्तविक शिकायत आई है, तो उस पर विचार किया जाना जरूरी है।
अदालत ने राज्य से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि यदि ध्वनि सीमा का उल्लंघन नहीं पाया जाता है, तो क्या पुलिस अपनी सीमा से आगे जाकर कार्रवाई कर सकती है? सुनवाई पूरी होने के बाद पीठ ने अतिरिक्त हलफनामा लेने से इनकार करते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया।












