‘ज़िंदगी का क्रैश कोर्स’: वक़्त, इंसान की दगाबाजी और हमारी ‘संस्कार वाली खामोशी”
ज़िंदगी की यूनिवर्सिटी में 'वक़्त' और 'इंसान' नाम के दो प्रोफ़ेसर आपको दर्द और दगा का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन इस सब के बीच हमारी 'अच्छी तरबियत' हमें चुप रहना सिखा देती है। जानिए क्यों आज के दौर में शराफत ही सबसे बड़ा ट्रैप बन गई है! पढ़िए PNN24 पर यह खास आर्टिकल।

महविश कुरैशी
न्यूज डेस्क (PNN24 News): ज़िंदगी भी बड़े कमाल की यूनिवर्सिटी है। यहाँ एडमिशन लेते ही आपको दो ही प्रोफ़ेसर मिलते हैं—एक ‘वक़्त’ और दूसरे ‘इन्सान’। दोनों के पास पढ़ाने का तरीका एकदम अलग है, लेकिन गोल एक ही है: आपकी मासूमियत का जुलूस निकालना!
⏳ प्रोफ़ेसर 1: ‘वक़्त’ और उसके बिना आवाज़ वाले थप्पड़
पहले बात करते हैं वक़्त की। जब यह सिखाने पर आता है कि ‘तकलीफ़ क्या चीज़ है’, तो बिना किसी वॉर्निंग के आपकी ज़िंदगी में भूचाल ले आता है।
कल तक आप सोच रहे थे कि सुबह की चाय थोड़ी ठंडी होना ही दुनिया का सबसे बड़ा ग़म है, और अगले ही दिन वक़्त आपको बताता है—“बेटा, असली दर्द तो अभी लाइन में खड़ा है!” वक़्त जब थप्पड़ मारता है, तो न कोई आवाज़ होती है और न ही कोई निशान, बस अंदर ही अंदर इंसान समझ जाता है कि ‘बुरे दिन’ किसे कहते हैं।
🎭 प्रोफ़ेसर 2: ‘इंसान’ और दगाबाजी का ओलंपिक मेडल
फिर एंट्री होती है हमारे प्यारे इंसानों की। अब वक़्त ने तो सिर्फ़ माहौल बनाया था, असली कलाकारी तो इंसान दिखाते हैं। ये आपको सिखाते हैं कि ‘दग़ा क्या चीज़ है’।
यह वो स्पेशल विद्या है जो केवल अपने ही सिखा सकते हैं, क्योंकि ग़ैरों को क्या पता कि आपकी कमज़ोरी कहाँ है? आप जिन्हें अपना ‘ऑल-वेदर फ्रेंड’ या ‘जिगरी’ समझते हैं, वही वक़्त आने पर ऐसी पलटी मारते हैं कि ओलंपिक के जिम्नास्ट भी शरमा जाएँ। कल तक जो आपके लिए जान देने की बातें करते थे, आज वो आपकी ही जान के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं।
🪤 असली ट्रैप: हमारी अपनी ‘तरबियत’ और संस्कार
और इन दोनों सूरतों में सबसे ज़्यादा कॉमेडी किसकी बनती है? हमारी! हम दोनों ही सूरतों में बेबस खड़े रह जाते हैं।
क्यों? क्योंकि बीच में आ जाती है हमारी ‘तरबियत’ (संस्कार)।
यही तो असली ट्रैप है! हमारी तरबियत ने हमें सिखा रखा है कि ‘इज़्ज़त क्या चीज़ है’। अब सामने वाला चाहे आपके पीठ में छुरा घोंप रहा हो या वक़्त आपकी धज्जियाँ उड़ा रहा हो, आप मुस्कुराकर कहेंगे, “कोई बात नहीं, आप बड़े हैं/अपने हैं, आपकी इज़्ज़त पहले है।”
दिल करता है कि सामने वाले को उसकी सही जगह दिखा दें, चार बातें ऐसी सुनाएँ कि उसकी पुश्तें याद रखें, लेकिन तभी दिमाग़ के किसी कोने से मम्मी-पापा की आवाज़ आती है—“बेटा, अपनी तहज़ीब मत भूलना।” और बस! हम अपने ही संस्कारों के जाल में फँसकर शांत रह जाते हैं।
💡 ‘तमाचा खाकर हाल-चाल पूछने की बीमारी’
इंसान दग़ा दे गया? हम इज़्ज़त के चक्कर में चुप। वक़्त ने बैंड बजा दिया? हम सब्र के नाम पर चुप।
सच तो यह है कि इस दुनिया में थोड़ा ‘बेशर्म’ होना भी एक आर्ट (कला) है। लेकिन अफ़सोस, जिनकी तरबियत अच्छी हो जाती है, वे तमाचा खाकर भी सामने वाले का हाल-चाल पूछने की बीमारी से ताउम्र उबर नहीं पाते!











