‘PNN24 स्पेशल: लगातार मन उदास रहना डिप्रेशन तो नहीं? जानिए कब है डॉक्टर की ज़रूरत और कैसे रखें मेंटल हेल्थ का ख्याल’

बिस्तर से उठने का मन न होना, लगातार चिंता और अकेलापन—जानिए कब सामान्य परेशानी मानसिक बीमारी (डिप्रेशन या एंग्जायटी) बन जाती है। साइकोलॉजिस्ट और साइकैट्रिस्ट में क्या अंतर है, सोशल मीडिया का दिमाग पर असर और बच्चों व महिलाओं की मेंटल हेल्थ को कैसे संभालें? पढ़िए डॉ. कोमलप्रीत कौर की सलाह के साथ PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी 

हेल्थ डेस्क (PNN24 News): आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में मन न लगना, हर बात से चिड़चिड़ापन होना या बिस्तर से उठने की इच्छा न होना जैसी समस्याएं आम होती जा रही हैं। लेकिन जब यह स्थिति हफ्तों तक बनी रहे, तो यह मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने का संकेत हो सकता है। मनोवैज्ञानिक डॉ. कोमलप्रीत कौर से जानिए कि एक इंसान कैसे अपने मानसिक स्वास्थ्य को समझे और सही समय पर सही पेशेवर की मदद ले।

🩺 साइकोलॉजिस्ट और साइकैट्रिस्ट में अंतर

  • साइकोलॉजिस्ट (Psychologist): यह मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल काउंसलिंग, साइकोथेरेपी और सीबीटी (CBT) जैसी तकनीकों से मरीज की सोच, भावनाओं और व्यवहार को सुधारते हैं। ये दवाइयां नहीं देते।
  • साइकैट्रिस्ट (Psychiatrist): यह एक मेडिकल डॉक्टर होते हैं, जो गंभीर मानसिक स्थितियों में दवाओं के जरिए इलाज करते हैं। कई गंभीर मामलों में दोनों विशेषज्ञ एक टीम की तरह मिलकर काम करते हैं।

⚠️ ये शुरुआती लक्षण दिखें तो तुरंत लें एक्सपर्ट की मदद

डॉ. कौर के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति लगातार दो सप्ताह से अधिक समय तक निम्नलिखित लक्षणों का सामना कर रहा है, तो उसे मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल की आवश्यकता है:

  • बिना किसी स्पष्ट वजह के लगातार चिंता और अत्यधिक या बहुत कम नींद आना।
  • भूख में अचानक बहुत ज्यादा या बहुत कम बदलाव होना।
  • खुद को लोगों से पूरी तरह अलग कर लेना और अपनी पसंदीदा गतिविधियों में खुशी न मिलना।
  • अतीत और भविष्य की चिंता: अतीत की दर्दभरी यादों को बार-बार जीना ‘डिप्रेशन’ है और भविष्य को लेकर बेवजह डरना ‘एंग्जायटी’ कहलाता है।

📱 रील्स का ओवरडोज और वर्क-लाइफ बैलेंस

  1. स्क्रीन टाइम और ब्रेन फॉग: सोशल मीडिया पर लगातार रील्स देखने से दिमाग तेजी से अलग-अलग भावनाओं को प्रोसेस नहीं कर पाता। इससे दिमाग में ‘ब्रेन फॉग’ की स्थिति बनती है और फैसले लेना मुश्किल हो जाता है।
  2. सीमाएं तय करें: वर्कप्लेस के तनाव को घर न लाएं। ऑफिस और पर्सनल लाइफ में स्पष्ट सीमाएं बनाएं।
  3. ब्रीदिंग एक्सरसाइज: दिन भर में बॉक्स ब्रीदिंग या 4-7-8 ब्रीदिंग जैसी तकनीकें अपनाएं, जिससे पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम शांत रहता है।

👩‍👧 महिलाओं और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य

  • महिलाओं के लिए चुनौती: कामकाजी महिलाओं पर घर और करियर का दोहरा दबाव होता है। वहीं होममेकर्स बच्चे बड़े होने के बाद अकेलापन (डिप्रेशन) महसूस करने लगती हैं, जिसके लिए परिवार का सपोर्ट सिस्टम और थेरेपी बहुत जरूरी है।
  • पेरेंटिंग टिप्स: बच्चों को ‘सुस्त’ या ‘बुरे’ जैसे नकारात्मक लेबल न दें। उनकी गलतियों पर डांटने के बजाय धैर्य से सुनें। हर मांग पूरी करने के बजाय तर्क के साथ “ना” कहना भी सिखाएं ताकि वे जीवन की वास्तविकताओं का सामना कर सकें।

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