नेपाल-तिब्बत सीमा पर जल प्रलय; 392 मौतों की पुष्टि, 1400 से अधिक लापता, नई झील बनने से मंडराया दोबारा बाढ़ का खतरा’
नेपाल और तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ में मृतकों की संख्या 392 पहुंच गई है, जबकि 1,400 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। भोटेकोशी नदी के ऊपरी क्षेत्र में बने नए नेचुरल बैरियर (झील) से दोबारा बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। पढ़िए PNN24 की अंतरराष्ट्रीय कवरेज।

यश कुमार
काठमांडू/तिब्बत सीमा (PNN24 News): हिमालयी क्षेत्र में नेपाल और चीन (तिब्बत) सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई तबाही ने भारी तबाही मचाई है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आए उफान, मलबे और आदमकद पत्थरों के सैलाब ने पूरे इलाके को तहस-नहस कर दिया है। सीमावर्ती इलाकों में सेना, एनडीआरएफ (NDRF) और स्थानीय एजेंसियां शून्य से नीचे के तापमान व दुर्गम रास्तों के बीच राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं।
📊 ताजा आंकड़ों में तबाही की भयावहता
- मृतकों की संख्या: नेपाल और तिब्बत सीमा क्षेत्र में अब तक 392 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं (जिसमें अकेले नेपाल के विभिन्न जिलों से 389 और तिब्बत में 3 मौतें शामिल हैं)।
- लापता नागरिक: 1,400 से अधिक लोग (लगभग 1,468) अभी भी लापता या असंपर्क बताए जा रहे हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकले श्रद्धालु, विदेशी पर्यटक, स्थानीय निवासी तथा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के कर्मचारी शामिल हैं।
- भारतीयों की स्थिति: विदेश मंत्रालय (MEA) स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। कई सौ भारतीय नागरिकों से संपर्क साधने और उन्हें एयरलिफ्ट करने का काम तेजी से जारी है।
⚠️ नया खतरा: ‘नैचुरल बैरियर’ झील बनने से हाई अलर्ट
बाढ़ का खतरा अभी भी टला नहीं है:
- मलबे से बनी कृत्रिम झील: ग्लेशियर और चट्टानों के खिसकने से नदी के ऊपरी हिस्से में मलबे का एक बड़ा प्राकृतिक बांध (Natural Barrier) बन गया है, जिससे पानी रुककर झील का रूप ले चुका है।
- झील फटने की आशंका: उपग्रह तस्वीरों (Satellite Imagery) के अनुसार, अगर यह अस्थायी झील अचानक फूटती है, तो निचले इलाकों में एक बार फिर तबाही का सैलाब आ सकता है।
- सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन: प्रशासन ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों, बचाव दलों और यात्रियों को तत्काल ऊंचे स्थानों पर जाने की सलाह दी है।
🚧 बुनियादी ढांचा ध्वस्त, कई इलाके पूरी तरह कटे
हादसे में बेत्रावती से रसुवागढ़ी तक का मुख्य संपर्क मार्ग और कई कंक्रीट पुल पूरी तरह बह गए हैं। इसके अलावा जलविद्युत परियोजनाएं (Hydroelectric Projects) और कस्टम ऑफिस भी मलबे में तब्दील हो चुके हैं, जिससे कई दूरस्थ गांवों तक राहत सामग्री पहुंचाना चुनौती बना हुआ है।












