बुनकरों की बदहाली (भाग-1): वक्त के धागों से साँसों के करघो पर बुनाई करता बेहाल बुनकर, कौन सुनेगा…? किसको सुनाये…..? ये अपनी बदहाली की कहानी….!

तारिक़ आज़मी संग शाहीन बनारसी

कितनी असाईशें हस्ती रही है वानो में,
कितने दर मेरी कहानी पर सदा बंद रहे
मेरे हाथो ने तो पोशाके बुनी रेशमी लेकिन
मेरे कपड़ो के मुकद्दर में पैबंद रहे

मशहूर शायर इमरान प्रतापगढ़ी का ये खुबसूरत कलाम बुनकर के हालात को ब्यान करने के लिए काफी है। कहते है बनारस की पहचान उसकी साडी और बुनकर से है। वो बुनकर जो वक्त के धागों से साँसों के करघो पर बुनाई करता है। वो बुनकर जो खुद पैबंद लगे कपडे पहनता है मगर हमे रेशमी कपडा बुनकर देता है। वो बुनकर जो हमारी पहचान है और हमारी संस्कृति है। मगर आज वही बुनकर बदहाली की कगार पर है। जिस उद्योग से देश के लाखो परिवार का चूल्हा जलता है, आज वही बुनकर समाज बदहाली के आगोश में है।

कितनी असाईशें हसती रही वानो मे
कितने दर मेरी कहानी पर सदा बंद रहे
मेरे हाथो ने तो पोशाके बुनी रेशमी लेकिन
मेरे कपड़ो के मुकद्दर मे पैबंद रहे

वो बुनकर समाज जो अपने उंगलियों के हुनर से धागों से धागों को पिरोकर हमारे और आपके तन के लिए लिबास बुनता है। एक ऐसा समाज जो कृषि के बाद सबसे ज्यादा बेरोजगारी और बदहाली से जूझता है। आज वही बुनकर परिवार बदहाली के मंजरो में घिरा है। जिन बुनकरों की सुबह और शाम करघे से होती थी आज वही बुनकर सडको पर ई-रिक्शा चलाने पर मजबूर है।

वो बुनकर जो अपने शहर-ए-बनारस की शान है आज वही बुनकर अपनी पहचान और अपने शहर को छोड़ने पर मजबूर हो गया है। जो बुनकर सुबह कल्लू चाचा की अडी से अल्हड अंदाज़ में चाय पी कर पान खा कर “झीनी झीनी सी बिनी चादरिया” बुनता था, आज वही बुनकर अपना शहर छोड़ दुसरे शहरो में प्रवासी मजदूर बनकर रह रहा है।

बदहाली की सरहदों पर उम्मीद की किरण लिए बुनकर खड़ा है। शायद कोई तो उसके लिए आवाज़ उठाएगा। बदहाली की मार सह रहा बुनकर समाज अपनी ही हक़ की लड़ाई आखिर क्यों नहीं लड़ रहा है? आखिर बुनकर की बदहाली का ज़िम्मेदार कौन है? क्या कर रही है बुनकर की तंजीमे अपने तबके के लिए? और क्या है बुनकर की समस्याए? इन सभी पहलुओ से हम आपको रूबरू करवाएंगे अगले अंक में।

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