जीएसटी बुनकरों की कला खत्म करना चाहता है – वाराणसी के बुनकर

जावेद अंसारी की ख़ास रिपोर्ट

वाराणसी : प्रधानमंत्री नरेन्द्र के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के छीत्तनपूरा इम्लिया तल्ले जीएसटी के विरोध में एक सभा हुई। जिसकी सदारत हाजी मुख्तार व पार्षद साजिद अंसारी ने किया। सभा को संबोधित करते हुए बुनकरों ने कहा कि बनारस के सभी बुनकर बिरादराना तन्जिमों के सरदार ने हम बुनकरों की लड़ाई लड़ रहे हैं। और हम सब बुनकर समाज के भलाई के लिए बुनकरों के सहयोग से चार दिन की मुर्री बंद करके जीएसटी काला कानून के साथ एक साथ खड़े है।

हम सब बुनकर ये लड़ाई तबतक लड़ेंगे जबतक बुनकर गरीब मजदूर के बिने हुए कपड़ो पर से जीएसटी नही हटेगा। आज पूरा भारत जीएसटी के खिलाफ कपड़ा व्यापारी सड़कों पर है और सब भारत सरकार से मांग करते हैं कि बुनकरों द्वारा निर्मित कपड़ों पर से जीएसटी हटाया जाए (आजादी के बाद से अबतक बुनकरों द्वारा निर्मित कपड़ों पर टैक्स नही लगा। तो हम बुनकरों के साथ ये नाइंसाफी क्यूँ। वो भी अपने प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र काशी में) क्या मोदी जी बनारस की मशहूर साड़ी को खत्म कर देंगे जिसकी मिसाल पूरी दुनिया भर में कायम हैं। हम बुनकरों के कपड़े का कारोबार जीएसटी लागू होने से खत्म हो जाएगा। और पूरी दुनिया भर में फैली हुई बुनकर मजदूर की हाथों बिनी हुई साड़ी की कला खत्म हो जाएगी। उसे खत्म करने की साजिश जिएसटी द्वारा की जा रही है हम बुनकर समाज कभी कामयाब नहीं होने देंगे।

क्या खासीयत हैं बनारसी साड़ी की 
बनारसी साड़ी का मुख्य केंद्र बनारस है। बनारसी साड़ी मुबारकपुर, मऊ, खैराबाद में भी बनाई जाती हैं। यह माना जा सकता है कि यह वस्त्र कला भारत में मुगल बाद्शाहों के आगमन के साथ ही आई। पटका, शेरवानी, पगड़ी, साफा, दुपट्टे, बैड-शीट, मसन्द आदि के बनाने के लिए इस कला का प्रयोग किया जाता था। चूंकि भारत में साड़ियों का प्रचलन अधिक था इरान, इराक, बुखारा शरीफ आदि से आए हथकरघा के कारीगरों द्वारा विभिन्न प्रकार के डिज़ाइनों को साड़ियों में डाला जाता था। कतान, रेशम, ज़री के संग बुनकर के गरीब मजदूर अपनी हाथों की कला से सुवा जाले के जोड़ बैठाकर डिजाइन दो दो फन्नी बिन कर एक सुन्दर सी साड़ी तैयार करते हैं और आज भी अपनी बनारसी पहचान बनाए हुए हैं, जैसे बूटी, बूटा, कोनिया, बेल, जाल और जंगला, झालर जैसी बनारसी साड़ीयों की पूरी दुनिया भर में एक मिशाल कायम हैं।गोल्ड, सिल्वर या रेशमी धागे या इनके मिश्रण से बूटा काढ़ा जाता है। रंगों का चयन डिज़ाइन तथा आवश्यकता के अनुसार किया जाता है। बूटा साड़ी के बॉर्डर, पल्लु तथा आंचल में काढ़ा जाता है जबकि ब्रोकेड के आंगन (पोत) में इसे काढ़ा जाता है। कभी-कभी साड़ी के किनारे में एक खास प्रकार के बूटे को काढ़ा जाता है, जिसे यहाँ के लोग अपनी भाषा में कोनिया कहते हैं (जी हाँ) इसी को कहते हैं बनारसी साड़ी जिस पर भारत सरकार ने जीएसटी लागू किया हैं। हम बुनकर भारत सरकार से ये माँग करते हैं कि बुनकर के बिने हुए कपड़ों पर से जीएसटी तुरन्त हटाया जाए।
वक्ताओं में ये थे शामिल 
अतीक़ अहमद अंसारी, हाजी ओकास अंसारी, हाजी बोदा अंसारी, हाजी इक़बाल अंसारी, रियाजूलहक़ अंसारी, अमामुर्रहमान अंसारी, मंजर, हुसैन, हाफिज कल्लू, हाजी वकार, अंसारी भाई, वकिल, महतों, सौऐब, मुन्ना, हाजी अलताफ़, हाजी महबूब, अब्दुल्ला अंसारी, नुरूल हसन, जैनुलआब्दिन, हाजी बैदुल्लाह, हाजी कय्यूम, सरदार मुनाऊ, सरदार हनिफ़, महतों अफरोज़ अंसारी, पार्षद गुलशन अली, हाजी बेलाल सरदार, बसीरूद्दिन, सरप्रस्ती पाँचों के सरदार, मुर्तुजा साहेब ने किया।

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