बोल शाहीन के लब आज़ाद है तेरे – जाम के झाम में फंसी काशी, बेचैन रही इंसानियत

शाहीन बनारसी संग ए0 जावेद

वाराणसी। मियाँ फैज़ अहमद “फैज़” साहब का कल एक तराना सुन रही थी। कलाम कुछ इस तरीके से था कि “बोल के लब आज़ाद है तेरे, बोल जुबां अब तक तेरी है।” इस तराने को सुनकर हमें भी अपने लबो की आजादी का अहसास हुआ। वर्ना  अभी तक हमारे लबो कि आजादी खामोशी के गुलामी की ज़ंजीरो में जकड़ी हुई थी। शाहीन के इन लबो कि आजादी को परवाज़ हमारे उस्ताद ने दे दिया. तो आज लफ्जों के असमान में खुद की एक परवाज़ करने कि इस शाहीन ने सोचा।

कल हमने अपने सहकर्मी ए0 जावेद के साथ शहर बनारस में बनारसियो को जाम के झाम में फंसा देखा। हर तरफ जाम ही जाम नज़र आ रहा था। आने जाने वाले लोग उस जाम में फंसने के कारण बेचैन से नज़र आ रहे थे। वो बेचैनी भी तो होनी ही थी गुरु…! क्योकि लोगो को जल्दी रहती है जाने की। कुछ लोग उस जाम में फंसने के कारण ऐसा चिल्लाते है, जैसे सारे दुनिया के काम तो सिर्फ उन्ही भाई साहब को है। उस जाम से निकलने कि जल्दी तो सबको होती है साहब, मगर कोई ये नही जानना चाहता कि वो जाम लगा कैसे है? इस जाम के झाम का सबसे बड़ा ज़िम्मेदार कौन है जानते है आप? नहीं जानते तो हम बताते है। इसके सबसे बड़े ज़िम्मेदार है हम खुद। ये बात तो आप जानते ही है कि असल में जाने कि जल्दी तो सबको ही होती है। जाम में फंसा हुआ हर व्यक्ति सबसे पहले जाना चाहता है। झन्न से करके बगल से दुसरे मुल्क की सीमा जैसे पार करते हुए जिसको जहा से भी जगह मिलती है, लोग वही घुस जाते है।

ऐसे में अब सामने वाला भी खड़ा और हम भी खड़े। जाम में फंसा हुआ हर शख्स आगे ही जाना चाहता है, क्योकि पीछे जाने पर तो खुद का ऐसा अपमान समझते है कि जैसे दुश्मन को पीठ दिखा दिए है। कमाल तो इतना करते है कि साउथ फिल्म का हीरो भी न करे। मुंह बिचुका के सामने से आ रहे सही साइड के वाहन चालक को अईसा घूरे देंगे कि उसका तो तीसरका हार्ट फेल पहली बार में हो जाए।

जाम के झाम में फंसी मै अपने सहकर्मी ए0 जावेद की बाइक पर सवार थी। (अपने सहकर्मी कि बाइक से जाने में एक बड़ा फायदा है कि ऑटो का भाड़ा बच जाता है। बस एक बार मोहब्बत से कहना ही तो है कि जावेद भाई फलाँ जगह छोड़ दो) तभी हमारे बगल में एक भाई साहब की बाइक आकर रुकी। जैसे ही उनकी गाडी आकर रूकती ही है कि वह साहब जोरो से चिल्लाने लगे कि “अबे ऑटो वाले तनि गाडी आगे बढ़ा।”  अपने  जावेद भी कौन से कम है, ऐसे ही उनको ए0 जावेद थोड़े ही कहा जाता है, तुरंते तपाक से बाइक वाले से बोल पड़े..! “अरे गुरु हेलीकाप्टर वाले गियर लगावा, धप से न उड़ा कर ऊपार कर ला।” बाइक वाला ए0 जावेद को ऐसा घुर कर देख रहा था जैसे अपने जावेद भाई ने उसको हीरो से कॉमेडियन बना दिया। बाइक वाले भाई साहब ने तत्काल शर्मिंदगी के साथ कहा कि जाम में सब फंसे तो रहते है पर कोई इस जाम को सुलझाना नहीं चाहता।

अब उन्हें कौन बताये? कि इस जाम के झाम को सुलझाने में पानदरीबा चौकी इंचार्ज मिथिलेश यादव का भी पसीना ऐसा छुटा कि वो अपना चौकी क्षेत्र छोड़े, दुसरे और तीसरे थाना क्षेत्र में पहुँच गये। ऐसा मुग्ध हुए जाम का झाम छुडवाने में कि बेनिया से लाइन सही करवाते हुए नई सड़क चौराहे तक चले गये। वो तो हमारे सहयोगी ए0 जावेद ने उनको याद दिलाया कि आप चेतगंज ही नहीं बल्कि चौक थाना क्षेत्र पार करके अब दशाश्वमेध थाना क्षेत्र में आ गए है। तब तो उन्हें याद आया कि गुरु पडोसी के भी पडोसी थाना क्षेत्र में पहुँच गए है। फिर वापस आये और चेतगंज तक लाइन लगवाया।

उस जाम के झाम में पैदल चलने वाले लोग भी फंसे रह जाते है। उस जाम के झाम में रुकी गाडियों के बीच से निकलने पर अईसा प्रतीत होता है जैसे वर्ल्ड कप जीत लिया हो। हर जाम वाली सडक चौक की गलिया बन जाती है। पैदल चलने वाले लोग कभी इधर से निकलने कि कोशिश करते है तो कभी उधर से लेकिन ले देकर फिर उस जाम में फंस जाते है। एक साहब तो पूरा जिम्नास्टिक करते हुवे गाडियों के ऊपर से कूद कूद के उस पार ऐसा जा रहे थे जैसे पहले सर्कस में काम करते हो। आखिर हमारे जावेद भाई पूछ ही बैठे उनसे, “का गुरु पहिले सर्कस में काम करत राहीला का।” वो भाई साहब बस मुस्कुरा कर चले गए।

शाहीन बनारसी एक युवा लेखिका है

मछोदरी से लेकर काशीपुरा, विश्वेश्वरगंज, मैदागिन, पियरी, बेनियाबाग, चेतगंज, चौक तथा दशाश्वमेध आदि स्थानों पर अधिकाधिक जाम लगा हुआ था। कसम से गुरु वो जाम के झाम को ख़त्म करने के लिए कबीरचौरा चौकी इंचार्ज प्रीतम तिवारी कबीरचौरा से अईसा चले की चलते-चलते मैदागिन पहुँच गये। तब उनको याद आया कि अरे गुरु वो तो सीमा पार चले आए है। फिर ऊहा से पलट कर कबीरचौरा पहुंचे और जाम का झाम छुड़ाने का प्रयास करते करते पियरी पहुँच गये। फिर शायद उनको याद आया होगा कि अरे पडोसी थाना क्षेत्र में आ गये है। लेकिन सुबह से चल रहे इस जाम के झाम का कोई निस्तारण नहीं हो पा रहा था।

बहरहाल, कोयलाबाज़ार से निकल कर अपने जावेद भाई के साथ लल्लापुरा तक जाने के लिए पूरा तीन घंटा लग गया। जिसमे से एक घंटा जाने का वक़्त था और दो घंटा हमारे जावेद भाई द्वारा समाचार कवरेज का वक़्त था। आखिर हमारे जावेद भाई ठहरे एक कररे वाले पत्रकार। रास्ते में किसी भी मुद्दे में खबर तलाशना ही उनकी खूबी है। तीन घंटे के बाद जब हम घर पहुंचे तो हम इस नतीजे पर है कि शहर-ए-बनारस जाम के झाम में सिर्फ इसीलिए फंसता है कि यहाँ की सकरी सडको पर सबको पहले जाने कि जल्दी रहती है। अगर आपके भी पास आम जन समस्या से सम्बंधित तस्वीर और जानकारी है तो निः संकोच हम से शेयर करे। हम आपके आभारी होंगे।

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