तारिक़ आज़मी की मोरबतियाँ – इस तस्वीर को देख कर भले आपके रोंगटे खड़े हो जाए मगर एक सवाल ज़रूर करे खुद से कि इसका ज़िम्मेदार कौन……?

तारिक़ आज़मी

वाराणसी। एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। एक ई-रिक्शा जिसको आप टोटो कहकर पुकार लेते है पर एक महिला बैठी है। उसके कदमो के पास रिक्शे के पावदान पर एक युवक पड़ा हुआ है। तस्वीर में दावा है कि युवक मर चूका है। जो हकीकत भी है। उस युवक ने अपने माँ के पाँव में ही दम तोड़ दिया था। साथ ही दावा किया गया है कि शव वाहन न मिलने की स्थिति में ऐसे ई रिक्शा से एक माँ अपने बेटे का शव लेकर गई।

इस तस्वीर को सेवा निवृत आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने ट्वीट किया है। उन्होंने अपने ट्वीट द्वारा वाराणसी के सांसद प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पर कटाक्ष करते हुवे लिखा है कि “‘ना मैं आया हूँ, ना मुझे किसी ने भेजा है,मुझे गंगा माँ ने बुलाया है’ क्या ये भी जुमला मात्र था? वाराणसी में एक बेटे ने अपनी माँ के कदमों में दम तोड़ दिया, जितनी दुखद यह तस्वीर है, उससे भी दुखद सिस्टम की हक़ीक़त। हमें माफ कर देना माँ” सेवानिवृत आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के इस ट्वीट को हज़ारो लोगो ने पसंद किया है और हज़ारो ने इसको रीट्वीट भी किया है।

हम आपको इस तस्वीर के सम्बन्ध में बता देते है कि हमे मिल रही जानकारी के अनुसार मृतक का नाम विनीत सिंह पुत्र स्व विनोद सिंह था। वह मड़ियाहूं जौनपुर का रहने वाला था। युवक मुंबई में काम करता था। इस बीव्ह वह अपने घर जौनपुर में आया था, तो किडनी में प्रॉब्लम होने पर बीएचयू में एडमिट नही लिया गया। फिर ककरमत्ता स्थित एक निजी अस्पताल में गया तो उसने भी भर्ती नही लिया। उसके बाद ईरिक्शे पर ही उसकी मौत हो गयी। बताया जाता है कि इलाज के अभाव में मां के पैर पर उसने अपने प्राण त्याग दिए। जिसके बाद उसकी माँ उसी ईरिक्शे पर लेकर उसे चली गई। कहा जाता है कि शव वाहन के लिए उसने प्रयास किया मगर शव वाहन नही मिल सका। अब युवक कोरोना संक्रमित था या नही ये स्थिति अभी स्पष्ट नही हो पाई है।

अब आते है अपनी मोरबतियाँ पर। सवाल पूछना हमारा अधिकार है भले इस अधिकार पर लोगो ने बंदिशे लगा रखा है। आखिर इस तस्वीर का ज़िम्मेदार कौन है ? ये हमारा पहला सवाल है और हम इसी का जवाब तलाशते है। इस तस्वीर का ज़िम्मेदार लोग अपने अपने नज़रिए से ठहरा रहे है। शासन, प्रशासन, से लेकर अंड, बंड, शंड जिसको समझ आ रहा है हम ज़िम्मेदारी दे रहे है। “कह रहे है कि ये तस्वीर रोंगटे खड़े करने वाली है। धिक्कार है ऐसे नकारा सरकार और सिस्टम पर जो इलाज की व्यवस्था तक नहीं दे पा रहा है।“ बेशक आप धिक्कार सकते हो। बेशक आपके लब आज़ाद है उनकी आज़ादी का नाजायज़ और जायज़ दोनों फायदा उठा सकते हो। मगर मेरे एक सवाल का जवाब दे डालो भाई लोग और वो भी लोग लोग मुझको भैया कहते है।

बेशक आपको मौलिक अधिकारों की सुविधाए नही मिल पा रही है तो आप चीत्कार मचा रहे हो। अगर दुसरे लफ्जों में कहे तो चिंघाड़ रहे हो आप। मगर एक बात बताना जरा। क्या इस तस्वीर को जीते जागते जितने लोगो ने देखा है उनमे कोई एक भी ऐसा नही था जो इस दुखियारी माँ की मदद कर पाया होगा। चलो मान लेते है कि नहीं कर पाया होगा कही बेड नही मिली होगी। जिम्मेदारो को फोन किया होगा और किसी ने फोन नही उठाया होगा। कोई नहीं मान भी ले तो ज़रा एक बात बताना बड़का बाऊ लोगन या भड़का बाऊ लोगन कि जब उस युवक की मौत हो गई तो तस्वीर देख कर लगता है कि उसकी माँ के होशो हवास नही रहे। बेशक किसी भी माँ के होशो हवास नही रहेगे। मगर आपके तो थे न। आपने कौन सी मदद कर डाली।

तस्वीरे खीच रहे है। प्रशासनिक व्यवस्था को कोस रहे है। अगर कोई मदद का हाथ आगे बढाता है तो उसका नंबर आप फेसबुक पर तबर्रुक के तरह तकसीम कर दे रहे है। मगर आप दो कदम और आगे बढ़कर उस माँ की मदद नही कर सकते थे। आप 20 हज़ार का मोबाइल जेब में रख कर उस माँ की मज़बूरी की तस्वीर उतार रहे है। क्या 500 रुपया जेब में नही था कि खुद किसी प्राइवेट शव वाहन को पकड़ कर उस माँ की थोड़ी मदद कर देते। बेचारी बेबस माँ अपने आंसू भी तो नही पोछ पा रही होगी। उसकी बेबसी तस्वीर में साफ़ दिखाई दे रही है। साडी का पल्लू भी तो दुरुस्त नही कर पा रही है। एक हाथ में जो मल्टीमीडिया सेट दिखाई दे रहा है पक्का वो उसके बेटे की आखरी निशाने होगी। उसके हाथो में तो 500 वाला सेट थे। आप उसकी मदद कर नही सकते थे। अगर नहीं कर सकते थे तो थू है आपकी की हुई आलोचना पर। आप खुद आलोचना के एक हिस्सा हो।

सरकार ये कर दे, सरकार वो कर दे। आप कुछ न करो। जब हर तरफ त्राहि त्राहि मची हुई है तो आप खामोश हो। जब हर कोई मदद मांग रहा है तो आप डर रहे हो। जब हर तरफ आपके मदद की दरकार है तो आप शांत नज़र अंदाज़ कर रहे हो। आखिर क्या हो आप ? बन्दर को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। उस बंदरो के झुण्ड में अगर एक किसी बन्दर पर मुसीबत आ जाये तो बकिया सभी बंदर उसकी मदद करते दिखाई देते है। कभी देखना हो तो एक बंदर को छेड़ के देख लो। न सभी ने आपको काट काट कर अपने जैसा बना लिया तो बताना आप। और हम खुद को अशरफुल मख्लूकात कहने वाले सर्वश्रेष्ठ समझने वाले पुरे ब्रह्माण्ड का सबसे सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझने वाले आखिर क्या कर रहे है ?

ध्यान रखे, सरकारे आती है जाती है। आप किसी दल के समर्थक हो। आज वो दल है कल नही होगा। आज ये नेता तो कल वो नेता के पीछे आप रहो। बेशक आपकी अपनी संवैधानिक आज़ादी है। मगर ध्यान रखना ये देश सबसे बड़ा है। इस देश से बड़ा कोई नही है और न कोई हो सकता है। मगर हम तो जयकारे के पीछे आज तक भागे है। फलनवा नेता की कभी जय, तो कभी ढमकाने नेता जिन्दाबाद करते हुवे भूल जाते है कि देश से बड़ा कोई नही है। दुष्यंत ने कहा था कि “अपने रहनुमाओं की अदा पर फ़िदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो।” इसको बहकती हुई दुनिया के हम भी हिस्सा बनते जा रहे है। कौन सुनता है नही सुनता है आप याद रखो न। सब याद रखा जायेगा, सबकुछ याद रखा जायेगा के तर्ज पर सही समय पर उनको नकार दो जो नही सुनते है। मगर एक दुसरे की मदद तो करो। सोचो आप क्या कहना चाहता हु मैं। एक दुसरे की मदद करे। सुरक्षित रहे, घरो से बिना ज़रूरत बाहर न निकले। मास्क पहने। और सबसे बड़ी बात, खुद के घर में पकते खाने पर ध्यान दे कि पडोसी के यहाँ कोई भूखा तो नही है। पडोसी के नाते आपने कर्तव्यों का निर्वाहन करे।

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