संत तुलसीदास महाविधालय में महिला दिवस पर संगोष्ठी, क्या मौका परस्त मुखौटा तो नहीं

हरिशंकर सोनी 
सुल्तानपुर. कादीपुर स्थित संत तुलसीदास महाविधालय में भारतीय लोकतंत्र में महिलाएँ एक राजनैतिक अवलोकन विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने महिलाओं का चुनाव में  बड़ी  हिस्सेदारी पर अपने अपने विचार रखे। कर्मयोगी रामकिशोर त्रिपाठी व्याख्यान माला के तहत राजनीतीशास्त्र विभाग में आयोजित संगोष्ठी में महिलाओं की चुनाव में अच्छी भागीदारी की तरफ इंगित करते हुये विभागाध्यक्ष डॉ आर पी सिंह ने कहा कि बिहार में सम्पन्न चुनाव में महिलाओं की मतदान के तरफ रुक्षान व भागीदारी का होना समाज में एक स्वस्थ उदाहरण पेश किया है।

बिहार में चुनाव में महिलाओं ने  एक फिर  मजबूत नारी सशक्तिकरण एव अपने जागरूक होने का परिचय दिया है वर्तमान में पुरूषो के अपेक्षा मतदान में  महिलाओं की  हिस्सेदारी बड़ी है। वोट पॉवर में महिलाओ ने बड़ चढ़ कर हिस्सा लिया  डॉ0 राम धीरज यादव ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि धीरे धीरे महिलाओं का राजनीति की तरफ रुझान ,उनकी सक्रियता का ही परिणाम है। उक्त अवसर पर डॉ0 अनूप गुप्ता डॉ0 जितेंद्र कुमार तिवारी, डॉ0 राजकुमार सिंह, डॉ0 राम कुमार रावत, ब्रजेश कुमार रजक आदि ने महिलाओं की राजनीती समेत अन्य क्षेत्रों में भी पुरूषो के अपेक्षा अधिक भागीदारी, देश विदेश में भी अपना परचम लहराना प्रत्येक क्षेत्र के लिये शुभ संकेत है ।

प्राचार्य डॉ0 अब्दुल रशिद ने उक्त संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महिलाओं ने अपनी प्रतिभा के बलपर चुनाव में हिस्सा ही नही लिया बल्कि समाज का मार्गदर्शन भी किया है कार्यक्रम का संचालन डॉ0 अनूप कुमार गुप्ता ने किया। इस कार्यक्रम को देख कर लगा कि पुरे महाविद्यालय में महिलाओ का एक विशेष सम्मानजनक स्थान है. वही दूसरी तरफ आपको स्मरण करवाते चले कि इसी महाविद्यालय में महिला प्रवक्ता के साथ छेड़छाड़ का मुद्दा भी सामने आया था जिस पर उच्चाधिकारियों के निर्देश पर मुकदमा कायम हुआ था. तत्कालीन प्राचार्य और उनके निकटवर्ती के ऊपर इस छेड़छाड़ का आरोप लगा था. उस समय वर्त्तमान के प्राचार्य एक वरिष्ठ प्रवक्ता हुआ करते थे और शिक्षको के एक संगठन के मुखिया भी, तब यही वर्त्तमान प्राचार्य डॉ अब्दुल रशीद ने एक वक्तव्य में कहा था कि उक्त पीड़ित शिक्षिका मेरे बहन है और हम उसकी लड़ाई लड़ेगे. सूत्रों की माने तो प्रबंधतंत्र ने उनके इस बयान का उनको उचित इनाम देते हुवे उनको प्राचार्य बना दिया, पद ग्रहण करने के पहले पूर्ववर्ती प्राचार्य के अति निकटवर्ती शिक्षक को बुरा भला कहने वाले डॉ अब्दुल रशीद के अब वही शिक्षक दाहिने हाथ है. वही पीडिता जिसको डॉ अब्दुल रशीद ने अपनी बहन का दर्जा देते हुवे उसकी लड़ाई में उसका साथ देने का एलान किया था उसी पीड़ित शिक्षिका को यही कथित भाई ने महाविद्यालय में आने तक से रोक दिया और कहा कि उनके कारण महाविद्यालय का माहोल ख़राब होता है.
तो साहेब ये है ज़मीनी स्तर की हकीकत. जब कोई विशेष दिवस आता है तो हम मुखौटा चहरे पर लगा कर दुनिया को दिखावे के लिए मैदान में आ जाते है. मदर डे या फादर डे पर जितने मा पिता के भक्त और आज्ञा पालक बालक हमको सेमिनारो और सोशल मीडिया पर मिल जाते है उसके अगर 75% भी वास्तव जीवन में हो जाए तो हमारे देश के 90% वृद्धा आश्रम को ताले पड़ जाए. जितने लोग महिला दिवस पर महिला सशक्तिकरण पर ज्ञान बांचा करते है उसका केवल 75% भी वास्तविक जीवन में हो जाए तो महिलाओ का उत्पीडन बंद हो जाये. महाविद्यालय प्रबंधतंत्र जो चाहे वह दलील दे मगर महिला उत्थान के लिए इस ज्ञान का मंच सजाने से पहले अगर उन पीड़ित महिलाओ को इन्साफ दिलवा दिया होता जो पूर्व प्राचार्य और उनके दाहिने हाथ के द्वारा सताए जाने का आरोप लगा चुकी है तो इस प्रकार के मच अच्छे भी लगते अन्यथा तब तक इसको मौका परस्त मुखौटा ही कहा जायेगा. 

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