म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक और साज़िश

रिजवान अंसारी

म्यांमार में रोहिंग्या अल्पसंख्यकों को जबरन ऐसे पहचान पत्र दिए जा रहे हैं जो उन्हें ‘विदेशी’ की श्रेणी में रखते हैं। इस तरह इस देश के मुसलमानों से म्यांमार की नागरिकता छीनने की साज़िश रची जा रही है।

दो साल से पूरे विश्व का ध्यान म्यांमार में रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के साथ हुई हिंसा और दुर्व्यवहार की ओर है और इसकी हर ओर से निंदा भी हुई है। इस बीच फोर्टिफाई राइट्स नामक के संगठन की इस रिपोर्ट के बाद एक बार फिर ऐसा हो सकता है क्योंकि वे म्यांमार में जारी एक ऐसे अभियान के बारे में बता रहे हैं जिसके अंतर्गत इस देश के अल्पसंख्यकों को ‘नेशनल वैरिफ़िकेशन कार्ड्स’ सौंपे जा रहे हैं। संगठन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथ्यू स्मिथ का कहना है, “म्यांमार सरकार इस प्रशासनिक तरीक़े से रोहिंग्या लोगों को बर्बाद करने की कोशिश कर रही है और इसके कारण उनके बुनियादी अधिकार भी छिन जाएंगे।”

संगठन ने बताया कि सरकार रोहिंग्या लोगों पर ऐसे कार्ड स्वीकार करने का दबाव डाल रही है “जो सीधे सीधे रोहिंग्या को ‘विदेशी’ बताते हैं।” उनका कहना है कि “म्यांमार सरकार ने रोहिंग्या को प्रताड़ित किया और कार्ड वाले सिस्टम को लागू करने के लिए रोहिंग्या मुसलमानों की आवाजाही की आज़ादी पर भी पाबंदियां लगा रही है।”

बौद्ध बहुल म्यांमार की सरकार ने रोहिंग्या लोगों को म्यांमार की नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। इन्हें वहां बांग्लादेश से आए अवैध आप्रवासियों के तौर पर देखा जाता है। जबकि कई रोहिंग्या अपनी पिछली कई पीढ़ियों से पश्चिमी म्यांमार के रखाइन प्रांत से अपनी जड़ें जुड़ी होने की बात करते हैं। रखाइन प्रांत ने तब पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था जब सन 2017 में यहां से क़रीब 7,30,000 रोहिंग्या अल्पसंख्यक भाग कर पड़ोसी देश बांग्लादेश चले गए थे। इसका कारण म्यांमार के चरमपंथी बौध और इस देश की सेना द्वारा की गई अमानवीय कार्रवाई थी। जिससे दुनिया के बहुत से लोगों ने आतंकी कार्यवाही भी कहा था। सैकड़ों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमानों का इस देश के चरमपंथी बौद्ध और सेना ने जनसंहार किया था।

इस बीच म्यांमार की सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल टुन टुन नाई ने रोहिंग्या पर दबाव डालकर उन्हें कार्ड दिए जाने के दावों का खंडन किया है। समाचार एजेंसी रोएटर्ज़ से बातचीत में उन्होंने कहा, “यह सच नहीं है और मेरे पास इसके अलावा कहने को कुछ नहीं है।” माना जा रहा कि म्यांमार सरकार की कार्ड वाली स्कीम का असर बांग्लादेश से रोहिंग्या शरणार्थियों के वापस लौटाने की प्रक्रिया पर भी हो सकता है। बांग्लादेश में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थी कहते हैं कि जब तक उन्हें म्यांमार की ओर से सुरक्षा और नागरिकता की गारंटी नहीं मिलती तब तक वे वापस नहीं लौटेंगे।

उल्लेखनीय है कि, 2018 में रखाइन में संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से भेजे गए तथ्यखोजी दल ने रिपोर्ट दी थी कि 2017 में रखाइन प्रांत में चलाए गए म्यांमार की सेना ने “नरसंहार के इरादे” से रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ कार्यवाही की थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधिमंडल ने म्यांमार सेना के कमांडर इन चीफ़ और पांच अन्य जनरलों को “अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के अंतर्गत कठोरतम अपराध” के तहत सज़ा दिए जाने की सिफारिश भी की थी।

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