दालमंडी निवासी भाजपा नेता आसिफ शेख के पुत्र अरबाज़ का निधन, दस दिनों पहले हुआ था एक्सीडेंट, नवजवानों ज़रा सोचे क्या सिर्फ अरबाज़ का ही इन्तेकाल हुआ है ?

शाहीन बनारसी/ शफी उस्मानी

वाराणसी: वाराणसी के दालमंडी निवासी भाजपा नेता आसिफ शेख के पुत्र अरबाज़ (19) का आज सुबह तडके दौरान-ए-इलाज निधन हो गया। निधन का समाचार आते ही इलाके में मायूसी ने पाँव पसार लिया। वही परिजनों में कोहराम की स्थिति उत्पन्न हो गई। अरबाज़ दस दिनों पहले बाइक एक्सीडेंट में घायल हुआ था और ट्रामा सेंटर में उसका इलाज चल रहा था। आज सुबह लगभग 5 बजे अरबाज़ ने इस दुनिया-ए-फानी को अलविदा कह दिया।

अरबाज़ के निधन का समाचार आते ही इलाके में शोक का माहोल फ़ैल गया। इलाके के नवजवान की असमय मृत्यु ने सभी को गमजदा कर दिया। परिजनों में कोहराम की स्थिति उत्पन्न हो गई। गौरतलब हो कि लगभग 10 दिन पहले अरबाज़ की बाइक का एक्सीडेंट हो गया था और बाइक असंतुलित होकर रोड डिवाइडर से टकरा गई थी। प्रत्यक्षदर्शियो की माने तो अरबाज़ बाइक पर पीछे बैठा था और बाइक चला रहा युवक रफ़्तार के साथ बाइक चला रहा था।

अरबाज़ के मृत्यु ने एक बड़ा सवाल ज़ेहन में कौंधा दिया, जो शायद आज के उन नवजवानों को सोचना चाहिए जो सडको पर बाइक से फर्राटा भरते है। आज अरबाज़ की मौत से क्या सिर्फ अरबाज़ का निधन हुआ है। शायद नही। आसिफ शेख एक जिंदादिल इंसान है, आज देखा उनकी आँखों में नमी और बेचैनी। नवजवान बेटे की मय्यत कंधे पर बहुत भारी होती है। आसिफ मियाँ ने अरबाज़ की परवरिश में कोई कमी नही छोड़ी थी। आज अरबाज़ के साथ उनकी वह उम्मीद भी चली गई कि अपने बेटे के कंधो पर वह ज़िन्दगी का आखरी सफ़र करेगे। आँखों में क्या वह उम्मीद बची जो अरबाज़ को लेकर अपनी बुज़ुर्गी के लिए आसिफ मियाँ ने सजाये होंगे। बेशक उन अरमानो और सपनी का भी आज इन्तेकाल अरबाज़ के साथ हो गया।

आसिफ मिया की अहिलया यानी अरबाज़ की माँ का रो-रो कर बुरा हाल था। लगभग सुध बुध खो बैठी थी। बार बार तन्द्रा भंग होती तो अरबाज़ को चीखते हुवे पुकार रही थी। अपने शौहर को पकड़ कर चिल्लाती थी कि मेरे बेटे को लाकर दो, उनके शौहर आसिफ मियाँ अपने गम को छिपाते हुवे उन्हें तसल्ली दे रहे थे। आज इन्तेकाल सिर्फ अरबाज़ का ही नही हुआ बल्कि माँ के वह सभी अरमान भी आज कफ़न पहन लिए जो उन्होंने अरबाज़ के लिए लगाये थे। अरबाज़ के बड़े भाई की आँखों में आंसू तो दिखाई दिए, मगर वह कभी अपने पिता को सम्भालता तो कभी माँ को दिलासा देता। कभी रो रही बहनों को समझाता। आज वह अचानक ही बड़ा हो गया। अचानक ही उसके कंधो पर बड़ी ज़िम्मेदारी आ गई। आज इन्तेकाल अरबाज़ का ही नही हुआ बल्कि उसके भाई के मासूमियत का भी देहांत हो गया।

अरबाज़ की बहने अपने भाई की मय्यत देख कर चीख उठी थी। अरबाज़ की मय्यत को छूना चाहती थी। भाई उनका एक बड़ा सहारा था। हर सुख दुःख में खड़ा रहता था। कभी लड़ता, कभी झगड़ता, तो कभी चिढाता, मगर बहनों के लिए जान कुर्बान करने को तैयार रहने वाला अरबाज़ अपनी बहनों के लिए एक चराग-ए-सुखन था, आज वह चराग ही गुल हो गया। भाई के लिए अब उनको उम्र भर तड़पना है। भाई की यादे ही अब रह गई है।

अरबाज़ यारो का यार था। बचपन में इलाके के अपने साथ पढने वाले और खेलने वाले उसके दोस्त हम उम्र ही है। सभी नवजवान गमजदा है। उनकी आँखों में आंसू रुक नही रहे है। आज इन्तेकाल सिर्फ अरबाज़ का ही नही हुआ है बल्कि दोस्ती की भी आज मय्यत निकली है। किसी ने सच ही तो कहा है कि मौत सिर्फ एक नही होती है बल्कि लाखो अरमान, सपने, तमन्नाये और ख्वाहिशे कफ़न ओढ़ लेती है। ज़िन्दगी में रफ़्तार तो बेशक ज़रूरी है, मगर रफ़्तार बाइक के पहियों में नही बल्कि कामयाबी में ही अच्छी लगती है। हम अल्लाह से अरबाज़ के मगफिरत की दुआ करते है।

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