अरुलमिगु पुथुकुडी अय्यनार मंदिर में दलितों के प्रवेश की अनुमति मांगने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुवे मद्रास हाई कोर्ट ने कहा ‘भगवन तटस्थ है और अपने बच्चो में भेदभाव नहीं करता’

ईदुल अमीन

डेस्क: मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में अरुलमिगु पुथुकुडी अय्यनार मंदिर में दलितों के प्रवेश की अनुमति मांगने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि सभी जातियों के लोगों को मंदिरों में प्रवेश करने और पूजा-अर्चना करने का अधिकार है, क्योंकि सभी भगवान के बच्चे हैं, और भगवान के सामने कोई जातिगत भेदभाव नहीं हो सकता। वह तटस्थ है।

यह टिप्पणी उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत और आशा की किरण है जो लंबे समय से मंदिरों में प्रवेश के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत के संविधान में समानता का अधिकार दिया गया है, लेकिन इसके बावजूद कई जगहों पर आज भी जातिगत भेदभाव के कारण लोगों को मंदिरों में प्रवेश से रोका जाता है। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने इस बयान से स्पष्ट संदेश दिया है कि धार्मिक स्थलों पर किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अगर किसी मंदिर में भक्तों को जाति के आधार पर रोका जाता है, तो यह न केवल संविधान के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों के भी खिलाफ है।

इस मामले में कोर्ट का यह रुख समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है। उम्मीद है कि यह फैसला उन अन्य मंदिरों और समुदायों के लिए भी एक मिसाल बनेगा जहां अभी भी जातिगत भेदभाव के कारण लोगों को पूजा-अर्चना से वंचित किया जाता है। यह निर्णय समाज में समावेशिता और समानता की भावना को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। आगे की सुनवाई में यह देखना होगा कि कोर्ट इस मामले में क्या और निर्देश जारी करता है और अरुलमिगु पुथुकुडी अय्यनार मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर क्या अंतिम फैसला आता है। लेकिन एक बात तो साफ है, यह टिप्पणी धार्मिक स्थलों पर समानता के अधिकार की दिशा में एक बड़ी जीत है।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जाति के आधार पर प्रवेश से इनकार करना, सम्मान और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने ‘तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम, 1947’ का हवाला भी दिया। ये अधिनियम सुनिश्चित करता है कि सभी हिंदुओं को मंदिरों में प्रवेश करने और पूजा करने का अधिकार है। बार एंड बेंच की ख़बर के मुताबिक़, कोर्ट के आदेश में कहा गया है, ये अधिनियम कई नेताओं के लंबे संघर्ष के बाद लागू हुआ। जो ये सुनिश्चित करना चाहते थे कि लोगों को उनकी जाति के आधार पर मंदिरों में प्रवेश करने से न रोका जाए। राज्य के हिंदू मंदिरों में हिंदु धर्म के ही कुछ वर्गों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए गए थे। इसे रोकने के लिए ही राज्य सरकार ने इस अधिनियम को लागू किया था।

याचिका में क्या कहा गया?

पुथुकुडी अय्यनार मंदिर अरियालुर जिले के उदयरपलायम तालुक में मौजूद है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पुथुकुडी गांव में ये मंदिर कई दशकों से अस्तित्व में है। सभी जातियों और संप्रदायों के ग्रामीण लंबे समय से इसकी पूजा करते रहे हैं। लेकिन 2019 में कुछ लोगों के एक ग्रुप ने परिसर में एक नया मंदिर बनाने का फैसला करके मंदिर प्रशासन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की।

द हिंदू की ख़बर के मुताबिक़, याचिका में कहा गया कि मंदिर बनाने में अनुसूचित जाति के निवासियों ने भी आर्थिक योगदान दिया था। लेकिन उन्हें मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया। इसके अलावा, मंदिर परिसर में अनुसूचित जाति के लोगों द्वारा स्थापित सभी मूर्तियों और पत्थर की संरचनाओं को तोड़ दिया गया। याचिकाकर्ता ने ये भी कहा कि पुथुकुडी अय्यनार मंदिर में एक लोहे का गेट लगा दिया गया था। और अनुसूचित जाति के श्रद्धालुओं को गेट के बाहर से ही भगवान की पूजा करने के लिए मजबूर किया जा रहा था। आरोप लगाया गया कि इस तरह के भेदभाव के बावजूद, कानून-व्यवस्था की समस्या के डर से सरकारी अधिकारियों ने इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।

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