दालमंडी का दर्द…! लाखो की ‘पगड़ी’ देकर दूकान लेने वाले दुकानदारों का क्या कसूर? लक्ष्मी कटरे पर चला हथौड़ा, 13 दुकाने करवाया गया खाली
वाराणसी में दालमंडी चौड़ीकरण की ज़द में आए लक्ष्मी कटरे पर प्रशासन का हथौड़ा चला, जिससे 13 दुकानदारों की रोजी-रोटी खत्म हो गई। मकान मालिक को तो मुआवजा मिल गया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल उन छोटे दुकानदारों का है जिन्होंने दुकान लेने के लिए लाखों रुपये की 'पगड़ी' (Goodwill) फूंक दी थी! यह पगड़ी की रकम न तो मकान मालिक लौटा रहा है और न ही सरकार ने मुआवजे में इसका प्रावधान रखा। दालमंडी तेरा दर्द कौन जानेगा? जानिए, विकास की इस बड़ी कीमत को चुका रहे छोटे व्यापारियों की पूरी कहानी और उनकी पुनर्वास की मांग।

तारिक आज़मी
PNN24 न्यूज़, वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में चल रहे दालमंडी चौड़ीकरण अभियान ने अब एक नया और भावनात्मक मोड़ ले लिया है। आज रविवार को प्रशासन का हथौड़ा लक्ष्मी कटरे पर चला और देखते ही देखते यह पुरानी इमारत ढह गई। मकान मालिक को तो मुआवजा मिल गया, लेकिन अब सवाल ये है कि जिन 13 छोटे दुकानदारों ने लाखों रुपये की ‘पगड़ी’ देकर इन दुकानों को किराए पर लिया था, उनका दर्द कौन समझेगा और उन्हें क्या मिलेगा?

लक्ष्मी कटरे पर हथौड़ा: खत्म हुआ एक युग
लक्ष्मी कटरा, दालमंडी क्षेत्र का एक ऐतिहासिक और व्यस्त व्यावसायिक केंद्र था। इसका टूटना केवल एक इमारत का ढहना नहीं है, बल्कि यहां सालों से दुकानदारी कर रहे लोगों के रोजी-रोटी के ठिकाने का उजड़ना है। कभी इस भवन के ज़ेर-ए-साया आज़ादी की लड़ाई के परवानो ने मनसूबे बनाये थे और इस भवन ने आज़ादी की जंग में अपनी भूमिका निभाया था। हथौड़ा केवल एक इमारत पर ही नहीं बल्कि उन 13 दुकानदारो के भविष्य पर भी चल गया जिनकी इसमें दुकाने थी।
- मकान मालिक को राहत: प्रशासन ने नियमों के तहत मकान मालिकों को तो करोड़ों का मुआवजा दे दिया। यह एक कानूनी प्रक्रिया है जिसका पालन हुआ है।
- दुकानदारों की दुविधा: असली संकट उन दुकानदारों का है जिन्होंने वर्षों पहले इन दुकानों को किराए पर लेने के लिए 10 लाख रुपये से 50 लाख रुपये तक की भारी-भरकम ‘पगड़ी’ (गुडविल मनी) चुकाई थी। पगड़ी की यह रकम न तो किरायेदार (Tenant) को वापस मिली है और न ही सरकारी मुआवजे में इसका कोई प्रावधान है।
दालमंडी के इस लक्ष्मी कटरे के एक दुकानदार ने रोते हुए बताया, “हमने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई पगड़ी देने में लगा दी। अब दुकान टूट गई, मालिक को पैसा मिल गया, लेकिन हम सड़क पर आ गए। हमारे 15 लाख रुपये का हिसाब कौन देगा? मेरा लाखो का माल इस दूकान में था, आज वह कूड़े की तरह मेरे पास पड़ा है, हमारा दर्द कौन सुनेगा?”
‘पगड़ी’ का दर्द, कानून की चुप्पी
वाराणसी जैसे पुराने शहरों में किराया नियंत्रण अधिनियम (Rent Control Act) लागू है, जिसके तहत मकान मालिक सालों तक किराया नहीं बढ़ा पाते। इसलिए, दुकान किराए पर देते समय एकमुश्त बड़ी रकम ली जाती है जिसे ‘पगड़ी’ या ‘गुडविल’ कहा जाता है।
- कानूनी पेंच: यह ‘पगड़ी’ का लेन-देन अक्सर गैर-कानूनी या गैर-पंजीकृत होता है, जिसका सरकारी रिकॉर्ड में कोई हिसाब नहीं होता।
- दुकानदारों का भविष्य: इन दुकानदारों के पास अब न तो दुकान बची है और न ही वह पगड़ी की रकम। उनके परिवार का भविष्य अंधकार में है।
दालमंडी तेरा दर्द कौन जानेगा?
दालमंडी का यह चौड़ीकरण शहर के विकास के लिए ज़रूरी हो सकता है, लेकिन इस विकास की बड़ी कीमत उन छोटे व्यापारियों को चुकानी पड़ रही है जिन्होंने मोदी के संसदीय क्षेत्र को अपनी खून-पसीने की कमाई से बसाया था।
प्रशासन को इस मानवीय पहलू पर भी विचार करना चाहिए। क्या सरकार इन दुकानदारों के पुनर्वास, या कम से कम उनकी ‘पगड़ी’ की रकम का कुछ हिस्सा वापस दिलाने के लिए कोई विशेष योजना ला सकती है? दालमंडी आज विकास की रौशनी में खड़ी है, लेकिन उसके हजारों दुकानदार रोजी-रोटी के अँधेरे में हैं।











