अख़लाक़ मॉब लिंचिंग: यूपी सरकार द्वारा केस वापस लेने की अर्जी मामले में बोला पीड़ित परिवार ‘लड़ाई जारी रखेंगे’

तारिक आज़मी
PNN24 न्यूज़, ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश की राजनीति और न्याय के गलियारों से एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने ग्रेटर नोएडा की एक स्थानीय अदालत से 2015 के मोहम्मद अख़लाक़ हत्याकांड के सभी अभियुक्तों के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे को वापस लेने की अनुमति मांगी है। सरकार के इस कदम से पूरे देश में सियासी बहस छिड़ गई है और यह फैसला पीड़ित परिवार के लिए किसी सदमे से कम नहीं है।
क्या था मोहम्मद अख़लाक़ हत्याकांड?
यह घटना 2015 में ग्रेटर नोएडा के बिसहड़ा गांव में हुई थी। मोहम्मद अख़लाक़ को भीड़ ने गोमांस रखने के झूठे आरोप में पीट-पीटकर मार डाला था। यह घटना देश की राजनीति में असहिष्णुता (Intolerance) और मॉब लिंचिंग (Mob Lynching) के एक भयावह उदाहरण के तौर पर दर्ज हो गई थी। इस मामले में कई स्थानीय लोगों को अभियुक्त बनाया गया था।
सरकार ने क्यों माँगी केस वापस लेने की अनुमति?
उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी अर्जी में मुक़दमे को वापस लेने के लिए ‘लोकहित’ (Public Interest) का हवाला दिया है।
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कारण: हालांकि, आधिकारिक तौर पर स्पष्ट कारण नहीं बताए गए हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि सरकार ऐसे संवेदनशील मामलों को स्थानीय समुदाय के बीच शांति बनाए रखने या राजनीतिक दबाव के चलते वापस लेने की कोशिश करती है।
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विरोध: सरकार की इस अर्जी पर कई मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे न्याय की हत्या बताया है।
अख़लाक़ का परिवार बोला- ‘कोर्ट में लड़ाई जारी रहेगी’
सरकार के इस कदम पर मोहम्मद अख़लाक़ के परिवार ने गहरा दुःख और रोष व्यक्त किया है। परिवार ने साफ़ कर दिया है कि वे सरकार के इस फैसले के आगे घुटने नहीं टेकेंगे और अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे।
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न्याय की उम्मीद: अख़लाक़ के बेटे और परिवार के सदस्यों ने कहा कि, “हम पिछले दस सालों से न्याय के लिए लड़ रहे हैं। हमने अपना पिता और भाई खोया है। अगर सरकार केस वापस ले लेती है, तो हमें कभी न्याय नहीं मिलेगा। हम कोर्ट में सरकार की अर्जी का विरोध करेंगे।”
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सुप्रीम कोर्ट तक जाने का ऐलान: परिवार ने कहा है कि वे निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे ताकि उनके प्रियजन के हत्यारों को सज़ा मिल सके।
आगे क्या होगा? न्यायालय का फैसला अहम
अब सबकी निगाहें ग्रेटर नोएडा की अदालत पर टिकी हैं। कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) की धारा 321 के तहत, सरकार जनहित में मुक़दमा वापस लेने की अर्जी दे सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार न्यायालय के पास होता है। न्यायालय, सरकार की अर्जी पर विचार करने से पहले पीड़ित पक्ष (अख़लाक़ का परिवार) का पक्ष सुनेगा और देखेगा कि क्या मुक़दमा वापस लेना वाकई जनहित में है या इससे न्याय प्रभावित होगा। इस मामले ने एक बार फिर देश के सामने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्ताधारी दलों की राजनीति न्याय से बड़ी हो सकती है? अख़लाक़ का परिवार आज भी न्याय की आस में खड़ा है।
मोहम्मद अख़लाक़ के परिवार पर दज है गोहत्या का केस
इसके बाद यह भी कहा गया कि घटनास्थल से बरामद मांस को फोरेंसिक रिपोर्ट ने गोमांस बताया है। 2016 में अख़लाक़ के परिवार के ख़िलाफ़ गोवध क़ानून के तहत एक मामला दर्ज किया गया था, जो अब भी अदालत में लंबित है। हालाँकि परिवार ने इन आरोपों का लगातार खंडन किया है। मोहम्मद यूसुफ़ सैफ़ी ने आरोप लगाया कि यह मामला परिवार पर ‘दबाव डालने’ के लिए दर्ज किया गया।
उन्होंने कहा कि स्थानीय पशु चिकित्सा की एक प्रारंभिक रिपोर्ट ने मांस को बकरी का बताया था, गाय का नहीं। उन्होंने कहा कि अब अदालत पर निर्भर करता है कि वह सरकार द्वारा दिए गए आवेदन को स्वीकारती है या नहीं। मोहम्मद यूसुफ़ सैफ़ी ने इस आवेदन पत्र पर भी अपनी हैरानी जताई। उन्होंने कहा, “क्या मॉब लिंचिंग जैसे गंभीर मामले में केस वापस होगा?” अख़लाक़ का परिवार भी इस मामले में उम्मीद लगाए बैठा है। जान मोहम्मद ने कहा, “मुझे अब भी अदालत पर भरोसा है। मुझे यकीन है कि एक दिन न्याय मिलेगा।”












