क्या बाबरी मस्जिद के मुख्य गुम्बद के नीचे मूर्ति रखे जाने की घटना का ज़िक्र करते हुवे नेहरू, सरदार पटेल और पन्त के बीच हुआ था पत्राचार, पढ़े क्या कहते है दावे

तारिक आज़मी
PNN24 न्यूज़ डेस्क: वर्तमान में बाबरी मस्जिद एक बार फिर चर्चाओं का केंद्र बनी हुई है। इस सम्बन्ध में इंडियन एक्सप्रेस ने नेहरु आर्काइव्स के आधार पर नेहरू के उन पत्रों का उल्लेख किया है जो 1949 में बाबरी मस्जिद के बारे में लिखे गए थे। इसके अनुसार, 22 दिसंबर 1949 को कुछ लोग अयोध्या के बाबरी मस्जिद परिसर में घुसे और केंद्रीय गुंबद के नीचे भगवान राम और सीता की मूर्ति रख दी।

अख़बार के अनुसार 26 दिसंबर 1949 को, मूर्तियाँ रखे जाने के तुरंत बाद, नेहरू ने पंत को एक तार भेजा, ‘अयोध्या की घटनाओं से मैं परेशान हूँ। आशा है कि आप व्यक्तिगत रूप से इस मामले में दिलचस्पी लेंगे। वहाँ एक ख़तरनाक उदाहरण पेश हो रहा है जो बुरे नतीजे देगा।’ फरवरी 1950 में, उन्होंने पंत को एक और पत्र लिखा, ‘अगर आप मुझे अयोध्या की स्थिति से अवगत कराते रहें तो मुझे खुशी होगी। जैसा कि आप जानते हैं, मैं इसे बहुत अहमियत देता हूँ और इसके पूरे भारत पर, खासकर कश्मीर पर असर को भी गंभीरता से देखता हूँ।’
उन्होंने यह भी पूछा कि क्या उन्हें खुद अयोध्या जाना चाहिए, जिस पर पंत ने जवाब दिया कि ‘अगर समय सही होता तो मैं खुद आपको अयोध्या जाने को कहता।’ एक महीने बाद, गांधीवादी केजी मशरूवाला को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, ‘आपने अयोध्या मस्जिद का ज़िक्र किया है। यह घटना दो या तीन महीने पहले हुई और मैं इसको लेकर बहुत गंभीर रूप से परेशान रहा हूँ। यूपी सरकार ने बहादुरी का दिखावा किया, लेकिन असल में बहुत कम किया… पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने कई मौकों पर इस कृत्य की निंदा की, लेकिन ठोस कार्रवाई से इसलिए रुके रहे क्योंकि उन्हें बड़े पैमाने पर दंगे का डर था…मैं पूरी तरह यक़ीन रखता हूँ कि अगर हमारी तरफ़ से व्यवहार ठीक होता, तो पाकिस्तान से निपटना कहीं आसान होता।’
उन्होंने अपनी लाचारी भी जताई, ‘मुझे नहीं पता कि देश में बेहतर माहौल कैसे बनाया जाए। सिर्फ़ सद्भाव की बात करना लोगों को चिढ़ाता है। बापू शायद कर सकते थे, लेकिन हम इस तरह की बातों के लिए बहुत छोटे हैं।’ जुलाई 1950 में, उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को लिखा, ‘हम फिर किसी तरह की तबाही की तरफ़ बढ़ रहे हैं।।।।जैसा कि आप जानते हैं, अयोध्या में बाबरी मस्जिद का मामला हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा है और हमारी पूरी नीति और प्रतिष्ठा को गहराई से प्रभावित करता है। लेकिन इसके अलावा, लगता है कि अयोध्या की हालत बद से बदतर हो गई है। यह भी संभव है कि ऐसी परेशानी मथुरा और अन्य जगहों पर भी फैल जाए।’
अख़बार के अनुसार इससे पहले, अप्रैल में, उन्होंने पंत को एक लंबा पत्र लिखा, ‘मैं लंबे समय से महसूस कर रहा हूँ कि यूपी का पूरा माहौल साम्प्रदायिक नज़रिए से बिगड़ रहा है। सच तो यह है कि यूपी मेरे लिए लगभग एक पराई ज़मीन बनता जा रहा है। मैं वहाँ फिट नहीं होता… यूपी कांग्रेस कमेटी, जिसके साथ मैं 35 साल से जुड़ा हूँ, अब जिस तरह काम करती है वह मुझे हैरान करता है… सदस्य, जैसे विश्वंभर दयाल त्रिपाठी, लिखने और बोलने का ऐसा दुस्साहस रखते हैं जो हिंदू महासभा के किसी सदस्य के लिए भी आपत्तिजनक होता।’
किताबो का अगर रुख किया जाए तो नेहरू की तरह, पटेल ने भी मूर्तियां रखे जाने के बाद पंत को पत्र भेजा (संदर्भ: सरदार पटेल्स कॉरस्पॉन्डेंस, वॉल्यूम 9, संपादक दुर्गा दास)। ‘प्रधानमंत्री ने आपको पहले ही एक तार भेजा है जिसमें उन्होंने अयोध्या की घटनाओं पर चिंता जताई है। मैंने भी लखनऊ में आपसे इस पर बात की थी। मुझे लगता है कि यह विवाद बेहद अनुचित समय पर उठाया गया है…’
उन्होंने लिखा, ‘व्यापक साम्प्रदायिक मुद्दों को हाल में ही विभिन्न समुदायों की आपसी सहमति से सुलझाया गया है। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, वे अभी अपने नए परिवेश में स्थिर हो रहे हैं। हम कह सकते हैं कि विभाजन का पहला झटका और उसकी अनिश्चितताएं अब कम हो रही हैं और यह भी कि बड़े पैमाने पर वफ़ादारियों के बदलाव की संभावना कम है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘मेरा मानना है कि इस मुद्दे को आपसी सहनशीलता और सद्भाव की भावना में शांतिपूर्वक सुलझाया जाना चाहिए। मैं समझता हूँ कि जो कदम उठाया गया है उसके पीछे गहरा भावनात्मक तत्व है।’
आगे लिखा कि ‘लेकिन ऐसी बातें तभी शांतिपूर्वक हल हो सकती हैं जब हम मुस्लिम समुदाय की स्वेच्छा को अपने साथ लें। ज़बरदस्ती से ऐसे विवाद नहीं सुलझाए जा सकते। उस स्थिति में कानून और व्यवस्था की ताक़तों को हर हाल में शांति बनाए रखनी पड़ेगी। अगर इसलिए शांत और समझाने वाले तरीक़ों को अपनाना है, तो किसी भी आक्रामक या दबाव आधारित एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैं पूरी तरह यक़ीन रखता हूँ कि इस मुद्दे को इतना जीवंत नहीं बनाया जाना चाहिए और मौजूदा अनुचित विवादों को शांतिपूर्ण तरीक़े से हल किया जाना चाहिए। जो काम हो चुका है उसे आपसी समझदारी की राह में बाधा नहीं बनने देना चाहिए।’











