दुष्यंत कुमार: वो शायर जिसकी ग़ज़लें आज भी सत्ता से सवाल करती हैं और आम आदमी का दर्द लिखती हैं

तारिक आज़मी
PNN24 News डेस्क: हिंदी साहित्य के आकाश में जब-जब जन-आक्रोश और आम आदमी की पीड़ा की बात होगी, एक नाम सबसे पहले उभरेगा— दुष्यंत कुमार। उनके गुज़र जाने के पाँच दशकों बाद भी, उनके शेर आज सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सड़कों पर होने वाले प्रदर्शनों, संसद की बहसों और महफ़िलों की जान बने हुए हैं।

- मीर ने ग़ज़लों को ‘दर्द’ दिया।
- ग़ालिब ने उसे ‘सोच की ऊँचाई’ बख्शी।
- दाग़ ने उसे ‘आसान लहजा’ दिया।
- नज़ीर ने उसे ‘लोकभाषा’ दी।
- लेकिन दुष्यंत कुमार ने उसे ‘क्रांति’ और ‘आम आदमी की तड़प’ दी।
नारा बन गए दुष्यंत के शेर दुष्यंत की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने शायरी को महलों के ड्राइंग रूम से निकालकर धूल-धूसरित सड़कों पर ला खड़ा किया। उनकी ये कालजयी पंक्तियाँ आज भी व्यवस्था परिवर्तन का सबसे बड़ा नारा हैं:
“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
उनकी ग़ज़लें केवल विरोध का स्वर नहीं थीं, बल्कि उनमें रूमानियत और जीवन की सूक्ष्म खूबसूरती भी रची-बसी थी। उन्होंने सिखाया कि कैसे अपनी रोज़मर्रा की पीड़ा को आवाज़ देकर उसे एक सामूहिक चेतना में बदला जा सकता है।
साये में धूप: एक युगांतकारी कृति उनका काव्य संग्रह ‘साये में धूप’ आज भी हिंदी ग़ज़ल की सबसे लोकप्रिय पुस्तकों में से एक है। उन्होंने अपनी शायरी के जरिए सत्ता को आईना दिखाया और जनता को जगाने का काम किया। आज जब भी कोई युवक अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है, तो उसके पास अनजाने में दुष्यंत कुमार का ही कोई शेर होता है।
दुष्यंत कुमार के कुछ कालजयी शेर
- “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”
- “कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।”
- “मैसेज साफ़ है— तुम पर बस एक उंगली उठाना काफी है, अगर तुम चुप रहे तो ये पूरा हाथ उठेगा।” (भावार्थ)
50 साल पहले लिखे गए दुष्यंत के शेर आज की राजनीति का ‘सच’ क्यों लगते हैं?
हिंदी के महान कवि दुष्यंत कुमार ने जब ‘साये में धूप’ लिखी थी, तब देश आपातकाल के दौर से गुजर रहा था। लेकिन आज, 2025 में भी जब हम समाचारों की सुर्खियां देखते हैं, तो दुष्यंत के शेर किसी ‘ताजा संपादकीय’ की तरह सटीक बैठते हैं।
1. चुनावी वादे और धरातल की हकीकत
आज जब नेता बड़े-बड़े विजन और मुफ्त योजनाओं की घोषणा करते हैं, तो दुष्यंत का यह शेर याद आता है:
“कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।” यह शेर आज भी उन अधूरे वादों पर सबसे करारा व्यंग्य है, जो फाइलों में तो पूरे हो जाते हैं लेकिन आम आदमी की झोपड़ी तक नहीं पहुँचते।
2. संसद और सड़क की दूरी
सदन में होने वाले हंगामे और जनता के असल मुद्दों से उनकी दूरी पर दुष्यंत ने दशकों पहले जो कहा था, वह आज की राजनीतिक कार्यप्रणाली का आईना है:
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।” यह आज के उन कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए नसीहत है जो समाधान के बजाय केवल शोर को राजनीति समझते हैं।
3. आम आदमी की बेबसी और सत्ता का मौन
आज जब महंगाई, बेरोजगारी या भ्रष्टाचार पर सवाल उठता है और जनता खामोश रहती है, तो दुष्यंत का यह कटाक्ष चुभता है:
“न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।” यह शेर सत्ता के प्रति उस ‘आज्ञाकारी जनता’ पर व्यंग्य है जो अभावों में भी सवाल पूछना भूल गई है।
4. व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रहार
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और फाइलों में दबे न्याय पर दुष्यंत का प्रहार आज भी बेजोड़ है:
“यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं, खुदा जाने यहाँ किस तरह का जलसा हुआ होगा।”
दुष्यंत कुमार की राजनीति किसी दल विशेष के खिलाफ नहीं थी, बल्कि उनकी शायरी ‘सत्ता की प्रवृत्ति’ के खिलाफ थी। यही कारण है कि चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, दुष्यंत कुमार हमेशा ‘विपक्ष’ में खड़े नजर आते हैं। उनके शेर आज भी हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में जनता का ‘सवाल पूछना’ कितना जरूरी है।











