बढ़ते आधुनिक युग में बच्चों में पुस्तकों को पढ़ने की छूटती आदत को लेकर उत्तर-प्रदेश सरकार की पहल, डिजिटल दौर में अब बच्चे पढ़ेंगे अखबार, उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में अखबार पढ़ना होगा अनिवार्य

फारूख हुसैन

डेस्क: बढ़ते आधुनिक व डिजिटल युग में बच्चों में पुस्तकों को पढ़ने की आदत छूटती लगातार दिखाई दे रही है। अब बच्चे हो या फिर युवा वह ज़्यादातर पुस्तकों को पढ़ने के बजाय मोबाइल और लैपटाप पर ही ध्यान देने लगे हैं और सही मायनों में देखा जाए तो यह काफ़ी चिंताजनक विषय है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के बदलते स्वरूप को यथास्थिति बनाए रखने के लिए ही अब उत्तर प्रदेश सरकार ने विद्यार्थियों में पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है।

इसके तहत राज्य के स्कूलों में हिंदी और अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र उपलब्ध कराने तथा सुबह की प्रार्थना सभा में कम से कम दस मिनट का समय विद्यार्थियों द्वारा इन्हें पढ़ने के लिए निर्धारित करने का निर्देश दिया गया है, जो की सराहनीय है। गौरतलब है पुस्तकों को पढ़ने की संस्कृति बच्चे हो या फिर युवा सभी के लिए बेहद फायदेमंद साबित होता है क्योंकि पढ़ना बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाती है।

इससे हमारे जेहन में शब्दों के संग्रहण का विस्तार होता है, आलोचनात्मक सोच विकसित होती है और रचनात्मकता एवं कल्पनाशीलता को बढ़ावा मिलता है,जो हमें समाज में एक जिम्मेदार और विवेकपूर्ण नागरिक बनता है और यह भी सच है कि पुस्तके ही सही मायनों में सच्ची दोस्त साबित होती है। पुस्तक पढ़ने वाला कभी ग़लत राह पर नहीं जाता ।देखा जाए तो छात्र जीवन के संघर्ष की सच्ची साथी किताबें ही होती हैं। हर छात्र को निश्चित रूप से किताबें पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। किताबें सिर्फ प्रतियोगी जीवन की ही साथी नहीं है बल्कि यह जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर हमारा मार्गदर्शन करती हैं। परंतु डिजिटल दौर में सूचनाएं हर तरफ से आ रही हैं,लेकिन उसमें कौन-सी सही हैं और कौन गलत – यह समझना भी एक चुनौती साबित होता है।

एक ऐसा समय था जब लोग आधुनिकता और डिजिटल दौर से दूर थे। उस वक्त लोगों को समय बिताने के लिए मोबाइल लैपटॉप आदि चीजों की जरूरत नहीं होती थी,बल्कि उस वक्त पुस्तके ही एकमात्र बेहतर विकल्प होता था। तो वही मनोरंजन के तौर पर विभिन्न प्रकार के खेल जो विद्यालयों में भी खिलाये जाते थे। सिनेमा देखना और सर्कस भी लोगों के पसंद थी और उस वक्त लोगों में पुस्तकों को पढ़ने की ललक भी हुआ करती थी। जिसमें सबसे ज्यादा साहित्य को लोग पसंद करते थे और बच्चों को बाल साहित्य लुभाता था जिनको पढ़ने के लिए हर वक्त जैसे होड़ सी दिखाई देती थी।

युवा जहां वेद प्रकाश के उपन्यास हो या फिर साहित्यिक पत्रिका हंस, सारिका, सरस सलिल, पायस आदि पत्रिकायें पढ़ता था तो बच्चे बाल साहित्य पत्रिका कामिक्स, चंपक, नंदन, बालहंस, लोट-पोट, बाल भारती पढ़ते दिखाई देते थे। जो अधिकतर बुक स्टालों पर आसानी से मिल जाती थी। लेकिन बढ़ते आधुनिक दौर ने खुद ही लोगों को बदलने के लिए मजबूर कर दिया क्योंकि जिन बुक स्टालों पर पुस्तक के आसानी से मिल जाती थी, वह बुक स्टॉल न जाने कब के बंद हो गए हैं न जाने कितनी पत्र पत्रिकाएं निकलनी ही बंद हो गई है। पढ़ने की आदत छूटना या भी सबसे बड़ा कारण है। जिसको बढ़ाने की पहल भी सरकार को जमीनी स्तर पर शुरू करनी चाहिए और अखबारों के साथ-साथ बाल साहित्य भी बच्चों के हाथों में देना चाहिए, तो निश्चय ही पढ़ने की आदत बच्चों में तेज़ी से विकसित होगी ।यानी कि अखबारों के साथ-साथ बाल साहित्य भी बच्चों के लिए जरूरी है।

बता दें कि हाल ही जुलाई में बढ़ते डिजिटल दौर को लेकर हुए सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जिसके मुताबिक भारतीय बच्चों की दिनचर्या में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है, जिसमें सांस्कृतिक और मीडिया गतिविधियों में जुड़ाव बढ़ा है और पढ़ाई का समय कम हुआ है। यह रुझान बच्चों की डिजिटल खपत और उस पर पड़ने वाले प्रभावों पर वैश्विक चर्चाओं के अनुरूप है। इसके अलावा भारत में 5 साल की उम्र तक के बच्चे हर दिन औसतन 2।2 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। यहां तक कि दो साल से कम उम्र के बच्चे भी हर दिन औसतन 1।2 घंटे स्क्रीन देखते हैं, जबकि उन्हें बिल्कुल ही दूर रहना चाहिए। एक चौथाई से ज्यादा की पहुंच इंटरनेट तक है और 10 से कम उम्र वालों के भी सोशल मीडिया अकाउंट हैं। इसके विपरीत, औसत पढ़ाई का समय लगभग 415 मिनट रह गया है,यह ट्रेंड बच्चों की डिजिटल आदतों और कम सामाजिक मेलजोल पर वैश्विक चिंताओं को दर्शाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बच्चों की डिजिटल आदतों पर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंता के बीच ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में संज्ञानात्मक और मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों का हवाला देते हुए, 16 वर्ष और उससे कम उम्र के व्यक्तियों के लिए राष्ट्रव्यापी सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू किया है, क्यों कि विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल या फिर अन्य उपकरण बच्चों की मासूमियत ही नहीं छीन रही है, बल्कि गंभीर बीमारियों की ओर भी इशारा कर रही है जैसे कि बेचैनी, ध्यान की कमी, नींद से जुड़ी समस्याएं, चिड़चिड़ापन भी दे रही है। साथ ही बच्चों में एकाग्रता की भी कमी हो रही है। इन बढ़ते बदलाव को देखकर मद्रास हाईकोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को ऑस्ट्रेलिया जैसा कानून बनाने का सुझाव दिया है।

वैसे देखा जाए तो इस डिजिटल दौर में इससे पहले हिमाचल प्रदेश में इस वर्ष जून में सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान विद्यार्थियों के समाचार पत्र पाठ की व्यवस्था लागू की गई थी। लेकिन इस पहल को अब उत्तर प्रदेश सरकार ने आगे बढ़ाने का काम किया है। इसके तहत विद्यालयों में इंग्लिश और हिंदी के अखबार बच्चों को दिए जाएंगे। सभी सरकारी सेकेंडरी और बेसिक स्कूलों पर आदेश लागू होगा, लेकिन प्राइवेट और दूसरे स्कूल भी चाहें तो इसका पालन कर सकते हैं। जिससे यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि छात्र प्रतिदिन राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय और खेल समाचारों के साथ-साथ प्रमुख संपादकीय भी पढ़ेंगे। साथ ही विद्यार्थी अखबारों से पांच कठिन शब्द चुनकर उन्हें सूचना पट्ट पर प्रमुखता से प्रदर्शित करेंगे।

यह व्यवस्था कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। इससे न‌ केवल बच्चों में सामान्य ज्ञान, शब्दावली,रचनात्मकता और संवाद कौशल विकसित होगा,बल्कि उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहतर ढंग से तैयारी करने में भी मदद मिलेगी। पढ़ने की संस्कृति अगर फिर से बच्चों की आदत में शुमार हो जाए,तो मोबाइल या लैपटाप की स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा समय बिताने की उनकी प्रवृत्ति भी धीरे-धीरे कम हो सकती है। परंतु ये कहना भी ग़लत नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार की यह पहल तभी सार्थक होगी, जब इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के सही मायने में धरातल पर उतारा जाएगा और इसकी निरंतरता को बनाए रखा जाएगा। इसके साथ-साथ सरकारी पुस्तकालयों में भी विद्यार्थियों की आसान पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। जिसमें साहित्यिक पुस्तकें भी शामिल हों।

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