‘मैसूर का तूफान’ हैदर अली: वो इन्साफ पसंद शासक, जिसने अंग्रेजों के दांत ही नहीं खट्टे किये, बल्कि हुकूमत की नींव हिला दी थी

तारिक आज़मी

PNN24 News डेस्क: भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे दर्ज हैं, जिनकी गूंज ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों की नींद उड़ा दी थी। 18वीं सदी का वो दौर, जब प्लासी की लड़ाई (1757) जीतने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के हौसले सातवें आसमान पर थे, उन्हें लगा कि हिंदुस्तान अब उनकी मुट्ठी में है। लेकिन, उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि दक्षिण भारत के पठारों से एक ऐसा तूफान उठने वाला है, जो उनकी सल्तनत की नींव हिला कर रख देगा। वो तूफान थे- मैसूर के शेर, हैदर अली

यह कहानी सिर्फ एक राजा की नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘इन्साफ पसंद’ शासक और रणनीतिकार की है, जिसने साबित किया कि हौसले और सही तकनीक के दम पर फिरंगियों को भी घुटनों पर लाया जा सकता है।

एक मामूली सैनिक से सुल्तान बनने का सफर

हैदर अली का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं था। कहा जाता है कि वे पंजाबी मूल के थे और मैसूर की सेना में एक साधारण पद से अपना सफर शुरू किया था। लेकिन उनकी रगों में एक जन्मजात सैनिक का खून दौड़ता था। वे न सिर्फ घुड़सवारी और तलवारबाज़ी में माहिर थे, बल्कि उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी।

लेविन बी बोरिंग अपनी किताब में लिखते हैं, “हैदर में थकान को बर्दाश्त करने का ज़बरदस्त माद्दा था। युद्ध के मैदान में उन्हें अपनी जान की ज़रा भी परवाह नहीं होती थी, यही वजह थी कि उनके सैनिक उनके लिए आग में कूदने को भी तैयार रहते थे।”

1776 में, अपनी काबिलियत के दम पर उन्होंने मैसूर के वाडियार राजा को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली। यह एक नए युग की शुरुआत थी।

निरक्षर, मगर अद्भुत बुद्धिजीवी

हैदर अली के व्यक्तित्व का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि वे बिल्कुल पढ़े-लिखे नहीं थे। बड़ी मुश्किल से वे अपना शुरुआती अक्षर ‘है’ लिखना सीख पाए थे। उन्हें फारसी या अरबी का भी ज्ञान नहीं था।

लेकिन, जैसा कि मेस्थर ला टू लिखते हैं, “निरक्षरता के बावजूद उनकी याददाश्त हाथियों जैसी थी।” दशकों पहले मिले इंसान को भी वे पहचान लेते थे। 5 फीट 6 इंच का कद, चेचक के दागों वाला खुरदुरा चेहरा, लेकिन उनकी मौजूदगी में एक गजब का आत्मविश्वास और ऊर्जा झलकती थी। वे सुबह सूरज की पहली किरण के साथ उठ जाते और देर रात तक काम करते थे।

एक धर्मनिरपेक्ष और इन्साफ पसंद शासक

हैदर अली एक सच्चे ‘इन्साफ पसंद’ शासक थे। उनके राज में धर्म कभी बाधा नहीं बना। मार्क विल्क्स के अनुसार, “सारे मुसलमान राजाओं में हैदर सबसे अधिक सहिष्णु थे। उन्होंने ऐलान किया था कि सभी धर्म ईश्वर की देन हैं और उनकी नज़र में सब बराबर हैं।” इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि उन्होंने मैसूर के प्रसिद्ध दशहरा त्योहार को पूरी शान-ओ-शौकत के साथ जारी रखा, और वे खुद विजयादशमी के जुलूस में सबसे आगे हाथी पर बैठते थे। उन्होंने श्रृंगेरी मठ के जगतगुरु शंकराचार्य को ‘महान पवित्र आत्मा’ कहते हुए भारी दान-दक्षिणा भी भेंट की थी।

हैदर ने मैसूर के मशहूर दशहरा त्योहार को जो कि सन 1610 से मनाया जाता आ रहा था जारी रखने की अनुमति दी थी। वो दशहरा के त्योहार में खुद भाग लेते थे। विजयादशमी के दसवें दिन निकाले जाने वाले जुलूस में वो सबसे आगे हाथी पर बैठ कर चलते थे। मार्क विल्क्स ने अपनी किताब ‘हिस्टॉरिकल स्केचेज़ ऑफ़ द साउथ ऑफ़ इंडिया इन एन अटेंम्प्ट टु ट्रेस द हिस्ट्री ऑफ़ मैसूर’ में लिखा था, “सारे मुसलमान राजाओं में हैदर सबसे अधिक सहिष्णु थे। उनको अपने धर्म के अनुसार प्रार्थना करना और रोज़े रखना न तो आता था और न ही उन्हें सिखाया गया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया था कि सभी धर्म ईश्वर की देन हैं और ईश्वर की नज़र में सभी धर्म बराबर हैं।” हैदर ने 27 अप्रैल, 1769 को शृंगेरी मठ के जगतगुरू शंकराचार्य को एक पत्र लिखा था। एके शास्त्री अपनी किताब ‘द रिकॉर्ड्स ऑफ़ द श्रंगेरी धर्मस्थान’ में लिखते हैं, “एक पत्र में ज़िक्र है कि हैदर ने जगतगुरू को एक हाथी, पाँच घोड़े, एक पालकी, पाँच ऊँट और देवी शारदा अंबा के लिए एक साड़ी, दो शॉल और 10 हज़ार रुपयों की थैली भेंट भेजी थी। उन्होंने जगतगुरू को एक महान और पवित्र आत्मा के तौर पर संबोधित किया था।”

जब हैदर ने अंग्रेजों को दिखाई आधुनिक युद्धकला

प्लासी के बाद अंग्रेजों को गुमान था कि भारतीय राजा उनकी सैन्य तकनीक के आगे नहीं टिक सकते। लेकिन हैदर अली ने इस भ्रम को तोड़ दिया। इरफ़ान हबीब बताते हैं कि हैदर ने अपनी सेना को प्रशिक्षित करने के लिए फ्रांसीसी कमांडरों को बुलाया। उनकी तोपें और राइफलें अत्याधुनिक फ्रांसीसी तकनीक पर आधारित थीं, जिनकी मारक क्षमता कंपनी की सेना से कहीं ज़्यादा थी।

हैदर की सेना ने युद्ध में ऊँटों से रॉकेट दागने की तकनीक अपनाई, जिसने अंग्रेजों को हैरान कर दिया। रसद आपूर्ति के लिए बैलों का इस्तेमाल करने का उनका विचार इतना कारगर था कि बाद में अंग्रेजों ने भी इसे अपनाया।

1780 का महासंग्राम और पोलिलूर का खौफनाक मंज़र

अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेप से तंग आकर, हैदर अली ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने अपने पुराने दुश्मन मराठों (नाना फड़नवीस) और हैदराबाद के निज़ाम के साथ मिलकर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने का एक महागठबंधन बनाया।

जुलाई 1780 में, 60 हज़ार घुड़सवारों और 100 तोपों के साथ हैदर अली ने मद्रास की तरफ कूच किया। यह एक ऐसा हमला था जिसने ब्रिटिश खेमे में खलबली मचा दी।

सितंबर 1780 में पोलिलूर के मैदान में जो हुआ, वह ब्रिटिश सैन्य इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। मूसलाधार बारिश के बीच, हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान की सेना ने अंग्रेज कमांडर कर्नल बेली की फौज को चारों तरफ से घेर लिया।

वह मंज़र खौफनाक था। हैदर की तोपों ने कहर बरपा दिया। जब कर्नल बेली ने हार मानकर आत्मसमर्पण के लिए रुमाल लहराया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मैसूर के घुड़सवारों ने हताश अंग्रेजी सेना को रौंद डाला। एक अंग्रेज लेफिनेंट के मुताबिक, “लोग हाथियों के पैरों तले रौंदे जा रहे थे, कुछ साथियों के शवों के नीचे दबकर दम तोड़ रहे थे।”

करीब 7000 अंग्रेज सैनिकों को बंदी बनाया गया, जिनमें कर्नल बेली भी शामिल थे। यह अंग्रेजों के लिए एक ऐसी अपमानजनक हार थी, जिसे वे कभी नहीं भूल पाए। एक कैदी जेम्स स्करी ने लिखा कि 10 साल हैदर की कैद में रहने के बाद वे भूल गए थे कि कुर्सी पर कैसे बैठा जाता है या अंग्रेजी कैसे बोली जाती है।

एक अधूरी जीत और एक युग का अंत

इतिहासकार विलियम डेलरिंपिल का मानना है कि अगर 1780 में हैदर अली और उनके साथियों ने दबाव बनाए रखा होता, तो शायद अंग्रेज उसी समय हमेशा के लिए भारत से निकल जाते। लेकिन अंग्रेजों की कूटनीति ने मराठों को इस गठबंधन से अलग कर दिया, और एक सुनहरा मौका हाथ से निकल गया।

इसी संघर्ष के बीच, हैदर अली को पीठ के कैंसर ने जकड़ लिया। इस जानलेवा बीमारी ने उनकी अदम्य शक्ति को कम कर दिया। 7 दिसंबर, 1782 को, 60 साल की उम्र में, इस महान योद्धा ने हमेशा के लिए अपनी आँखें मूंद लीं।

शामा राव ने बिल्कुल सही लिखा है: “हैदर की मौत भारत के इतिहास की सिर्फ एक घटना नहीं थी। उनकी मौत ने भारत में ब्रिटिश ताकत की नींव रख दी, जो उनके जीते जी शायद कभी संभव नहीं हो पाती।”

हैदर अली का जीवन हमें सिखाता है कि एक सच्चा शासक वही है जो अपनी प्रजा के लिए इन्साफ पसंद हो और दुश्मन के लिए काल। उन्होंने अंग्रेजों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा और दिखाया कि भारत की मिट्टी में ऐसे वीर पैदा होते हैं जो दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों से टकराने का माद्दा रखते हैं।

नोट: इस लेख की रचना के लिए लेविन बी बोरिंग की किताब ‘हैदर अली एंड टीपू सुल्तान’, इरफ़ान हबीब की लिखित किताब ‘रेसिस्टेंस एंड मॉडर्नाइज़ेशन अंडर हैदर अली एंड टीपू सुल्तान’, मेस्थर ला टू लिखित किताब ‘द हिस्ट्री ऑफ़ हैदर एंड हिज़ सन टीपू सुल्तान’, मार्क विल्क्स की लिखित किताब ‘हिस्टॉरिकल स्केचेज़ ऑफ़ द साउथ ऑफ़ इंडिया इन एन अटेंम्प्ट टु ट्रेस द हिस्ट्री ऑफ़ मैसूर’, ए0के0 शास्त्री लिखित किताब ‘द रिकॉर्ड्स ऑफ़ द श्रंगेरी धर्मस्थान’,  फ़्रेंच इतिहासकार ज्यां मेरी लाफ़ों लिखित किताब इंडिका :एसेज़ इन इंडो-फ़्रेंच रिलेशंस 1630-1976′, मार्क विल्क्स की किताब ‘हिस्टॉरिकल स्केचेज़ ऑफ़ द साउथ ऑफ़ इंडिया’, कैप्टेन मुआत के पेपर ‘अकाउंट ऑफ़ द डिफ़ीट ऑफ़ पोलिलूर’ और विलियम डेलरिंपिल की किताब ‘द अनार्की’ किताबो और पत्र का सहारा लिया गया है।

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