रुबैया सईद किडनैपिंग केस: CBI की गिरफ़्तारी, स्पेशल कोर्ट ने अभियुक्त शफ़ात अहमद शंगलू को छोड़ा

तारिक आज़मी

श्रीनगर/जम्मू: देश के सबसे चर्चित और 35 साल पुराने रुबैया सईद किडनैपिंग केस में एक नाटकीय मोड़ आया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने जिस अभियुक्त शफ़ात अहमद शंगलू को हाल ही में फ़रार बताकर गिरफ़्तार किया था, उन्हें मंगलवार को स्पेशल कोर्ट ने रिहा (Discharged) कर दिया है। यह ख़बर सीबीआई की कार्यप्रणाली और 35 साल पुराने इस संवेदनशील केस की जांच पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

सीबीआई ने फ़रार बताकर की थी गिरफ़्तारी

1 दिसंबर को सीबीआई ने एक प्रेस रिलीज़ जारी कर दावा किया था कि उन्होंने पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण से जुड़े 35 साल पुराने मामले में फ़रार चल रहे शफ़ात अहमद शंगलू को गिरफ़्तार किया है।

सीबीआई का आरोप था कि शंगलू ने आतंकी यासीन मलिक और अन्य लोगों के साथ मिलकर 1989 में इस अपहरण की साजिश रची थी। सीबीआई के मुताबिक़, शंगलू पर 10 लाख रुपये का इनाम भी था।

स्पेशल कोर्ट ने क्यों किया रिहा?

शफ़ात अहमद शंगलू के वकील शफ़ात अहमद डार ने रिहाई की जानकारी देते हुए मीडिया को बताया कि सीबीआई के पास उनके मुवक्किल के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं था।

वकील ने कहा, “सीबीआई ने टाडा कोर्ट (TADA Court) में अर्ज़ी दी थी। वे इस आधार पर ज्यूडिशियल कस्टडी मांग रहे थे कि शफ़ात अहमद शंगलू 35 साल से फ़रार चल रहे थे। लेकिन आज कोर्ट ने जब फ़ाइल देखी तो शंगलू के ख़िलाफ़ कुछ पाया नहीं इसलिए उन्हें छोड़ दिया गया है।”

यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सीबीआई द्वारा की गई गिरफ़्तारी और अदालत में पेश किए गए सबूतों के बीच एक बड़ा अंतर था।

‘शंगलू फ़रार नहीं थे, श्रीनगर में कर रहे थे बिज़नेस’

वकील ने सीबीआई के ‘फ़रार’ होने के दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि शंगलू कहीं भागे नहीं थे, बल्कि वह पिछले 35 सालों से श्रीनगर में ही अपना बिज़नेस चला रहे थे।

यह मामला तब सामने आया था जब 1989 में रुबैया सईद का अपहरण हुआ था और उन्हें रिहा करने के बदले में जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के पाँच आतंकवादियों को छोड़ा गया था। इस मामले में यासीन मलिक समेत कई अन्य लोग भी अभियुक्त हैं, लेकिन एक फ़रार अभियुक्त की गिरफ़्तारी के तुरंत बाद रिहाई ने पूरे केस की जांच पर संदेह पैदा कर दिया है।

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