अरावली को बचाने की जंग में बड़ी जीत: सुप्रीम कोर्ट ने ‘नई परिभाषा’ के आदेश पर लगाई रोक; अब उच्चस्तरीय समिति करेगी वैज्ञानिक जांच

आदिल अहमद

नई दिल्ली: उत्तर भारत की ‘रक्षक’ अरावली पहाड़ियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और राहत भरा फैसला सुनाया है। सोमवार को तीन जजों की पीठ ने अरावली की उस नई परिभाषा पर फिलहाल रोक (Stay) लगा दी है, जिसे केंद्र सरकार की सिफारिशों के बाद 20 नवंबर को स्वीकार किया गया था। कोर्ट ने माना है कि इस मामले में कई ऐसे गंभीर मुद्दे हैं जिनकी और अधिक जांच की आवश्यकता है।

क्या था विवादित ‘100 मीटरका फॉर्मूला? केंद्र सरकार की सिफारिशों के अनुसार, केवल उन्हीं हिस्सों को अरावली पहाड़ी माना जाना था जो आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर (328 फीट) ऊँचे हों। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी थी कि इस मनमाने पैमाने से उन छोटी पहाड़ियों और झाड़ियों वाले क्षेत्रों पर खनन और निर्माण का रास्ता खुल जाएगा जो रेगिस्तान को रोकने और भूजल रीचार्ज करने के लिए बेहद जरूरी हैं।

CJI सूर्यकान्त का बड़ा निर्देश: मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकान्त ने सुओ मोटो (स्वतः संज्ञान) लेते हुए कहा:

“हम निर्देश देते हैं कि नई परिभाषा से जुड़ी सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष फिलहाल स्थगित रहेंगे। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी, 2026 को होगी।”

अदालत ने अरावली की परिभाषा तय करने के लिए एक नई उच्चस्तरीय समिति (High-Level Committee) गठित करने का प्रस्ताव दिया है और अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से सहायता मांगी है।

जन आंदोलन और राजनीतिक विरोध का असर: पिछले एक हफ्ते में गुरुग्राम, उदयपुर और दिल्ली समेत कई शहरों में अरावली बचाने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए। ‘अरावली विरासत जन अभियान’ की नीलम अहलूवालिया और पर्यावरण कार्यकर्ता विक्रांत टोंगड़ ने इस फैसले का स्वागत किया है। विपक्षी दलों ने भी इसे ‘दिल्ली और उत्तर भारत का अस्तित्व बचाने’ की लड़ाई बताया है।

  • अखिलेश यादव (सपा प्रमुख): “अरावली की रक्षा दिल्ली के अस्तित्व को बचाने से अलग नहीं है।”
  • टीका राम जुल्ली (कांग्रेस): “अरावली राजस्थान की जीवनरेखा है, इसके बिना दिल्ली तक रेगिस्तान होता।”

सरकार का पक्ष: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और मंत्री भूपेंद्र यादव का कहना है कि नई परिभाषा का मकसद नियमों में एकरूपता लाना था, न कि सुरक्षा कम करना। सरकार के अनुसार, अरावली का केवल 2% हिस्सा ही संभावित खनन के लिए विचाराधीन था। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल इन तर्कों के बजाय पर्यावरण की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

अरावली क्यों है जरूरी? (विशेषज्ञों की राय)

  1. रेगिस्तान को रोकना: यह थार मरुस्थल को दिल्ली और हरियाणा की ओर बढ़ने से रोकने वाली एक प्राकृतिक दीवार है।
  2. भूजल रीचार्ज: यह पहाड़ियाँ उत्तर भारत के लिए ‘वाटर टावर’ का काम करती हैं।
  3. जलवायु: दिल्ली-NCR की हवा को साफ करने और तापमान को नियंत्रित करने में इसकी अहम भूमिका है।

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