छत्तीसगढ़ में ‘कब्र’ पर संग्राम: अंतिम संस्कार के नाम पर धधक रहा है बस्तर; कहीं चर्च में आगजनी, कहीं कब्र से निकाला जा रहा शव

आफताब फारुकी

रायपुर/बस्तर: छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ सालों से आस्था और अंतिम संस्कार के बीच एक खतरनाक विवाद गहरा गया है। केरल से भी बड़े क्षेत्रफल वाले बस्तर संभाग में अब मौत के बाद का ‘सफर’ भी हिंसा और राजनीति की भेंट चढ़ रहा है। धमतरी की पुनिया बाई से लेकर कांकेर के चमरा राम सलाम तक, कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ धर्म परिवर्तन के विवाद ने पूरे प्रदेश को ‘बंद’ करने पर मजबूर कर दिया।

कांकेर कांड: कब्र से निकाला गया शव, फूंके गए चर्च हाल ही में कांकेर जिले के बड़े तेवड़ा पंचायत में जो हुआ, उसने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। 15 दिसंबर को सरपंच राजमन सलाम के पिता चमरा राम सलाम का निधन हुआ। परिवार ने उन्हें अपनी निजी जमीन पर ईसाई रीति से दफनाया, लेकिन 17 दिसंबर को स्थानीय ग्रामीणों और हिंदू संगठनों ने इसका हिंसक विरोध किया।

  • हिंसा का तांडव: भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया और गांव के दो चर्चों को आग के हवाले कर दिया।
  • प्रशासन का कदम: तनाव इतना बढ़ा कि पुलिस को दफनाए गए शव को कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम के लिए रायपुर भेजना पड़ा।
  • सियासी दांवपेच: सरपंच राजमन सलाम का आरोप है कि यह धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक साजिश है। उनके मुताबिक, सरपंच चुनाव में हारे हुए भाजपा समर्थित उम्मीदवार के इशारे पर उनके परिवार को पीटा गया और महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया।

बस्तर में गहराता पहचानका संकट छत्तीसगढ़ में अंतिम संस्कार को लेकर होने वाले ये विवाद अब केवल गांव तक सीमित नहीं हैं।

  1. एसपी पर हमला: इन्हीं विवादों के चलते पहले नारायणपुर जैसे जिलों में पुलिस अधीक्षक (SP) तक का सिर फोड़ दिया गया था।
  2. प्रदेश व्यापी बंद: आमाबेड़ा विवाद के बाद हिंदू संगठनों ने छत्तीसगढ़ बंद का आह्वान किया, जिसे चेंबर ऑफ कॉमर्स और कई जातिगत संगठनों का समर्थन मिला।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक रीति-रिवाज सरपंच राजमन सलाम का कहना है कि उन्होंने पहले मांझी-मुखिया से पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार की अनुमति मांगी थी, लेकिन इनकार कर दिया गया। वहीं, दूसरी ओर हिंदू संगठनों और स्थानीय समाजों का तर्क है कि धर्म बदलने वाले व्यक्ति को गांव की जमीन पर जगह नहीं दी जाएगी।

बस्तर और आसपास के इलाकों में यह विवाद केवल ‘ईसाई बनाम हिंदू’ नहीं रह गया है, बल्कि यह आदिवासी पहचान, जल-जंगल-जमीन और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन गया है। शासन-प्रशासन के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इस सामाजिक दरार को भरना है, जो मौत के बाद भी खत्म नहीं हो रही।

छत्तीसगढ़ में डेथ डिस्प्यूटके 3 बड़े कारण

  • धर्म परिवर्तन: ईसाई धर्म अपनाने के बाद पारंपरिक श्मशान घाट के उपयोग पर रोक।
  • राजनीतिक ध्रुवीकरण: पंचायत स्तर की राजनीति में धर्म को हथियार बनाना।
  • संवाद की कमी: प्रशासन, पारंपरिक मुखिया और धर्मांतरित परिवारों के बीच तालमेल का अभाव।

शवको दफनाने के लिए खटखटाना पड़ा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा: पिता के अंतिम संस्कार पर SC का विभाजित फैसला; क्या कहता है कानून?

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ईसाई धर्म अपनाने वालों के अंतिम संस्कार को लेकर उपजा विवाद देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक जा पहुँचा है। इसी साल जनवरी में पादरी सुभाष बघेल के मामले ने न्यायपालिका को भी झकझोर कर रख दिया, जहाँ एक बेटे को अपने पिता के शव को दफनाने की अनुमति के लिए 3 सप्ताह तक इंतजार करना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “हमें बहुत दुख है” जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दुख व्यक्त किया था। बेंच ने कहा था कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक व्यक्ति को अपने पिता के अंतिम संस्कार जैसे मौलिक कार्य के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ रहा है। हालांकि, इस मामले में दोनों जजों की राय अलग-अलग रही, जिसने इस विवाद की कानूनी जटिलता को और बढ़ा दिया।

जस्टिस बीवी नागरत्ना: गरिमा के साथ मृत्युमौलिक अधिकार जस्टिस नागरत्ना ने मानवाधिकारों और संवैधानिक समानता पर जोर दिया। उनके तर्क के मुख्य बिंदु थे:

  • अनुच्छेद 14 और 15: किसी व्यक्ति को केवल उसके धर्म के आधार पर अंतिम संस्कार के अधिकार से वंचित करना संविधान का उल्लंघन है।
  • गरिमा का अधिकार: गरिमा के साथ जीने और मरने का अधिकार (अनुच्छेद 21) हर नागरिक को प्राप्त है।
  • सुझाव: उन्होंने समाधान के रूप में परिवार की निजी भूमि पर अंतिम संस्कार करने की अनुमति देने की बात कही।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा: स्थानीय नियमोंकी प्रधानता वहीं, जस्टिस शर्मा ने सार्वजनिक व्यवस्था और स्थानीय नियमों को महत्व दिया। उनके तर्क थे:

  • सीमित अधिकार: किसी भी व्यक्ति को यह असीमित अधिकार नहीं है कि वह कहीं भी (खासकर पारंपरिक श्मशान या सार्वजनिक भूमि पर) अंतिम संस्कार की जिद करे।
  • पंचायत की भूमिका: पंचायत और स्थानीय प्रशासन द्वारा अधिसूचित ‘ईसाई कब्रिस्तान’ में ही अंतिम संस्कार होना चाहिए, चाहे वह गाँव से दूर ही क्यों न हो।

विवाद की जड़: संविधान बनाम परंपरा यह मामला दर्शाता है कि भारत में अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और स्थानीय सामाजिक व्यवस्था (Social Order) के बीच टकराव गहराता जा रहा है। पादरी सुभाष बघेल का शव 21 दिनों तक न्याय की प्रतीक्षा में पड़ा रहा, जो सभ्य समाज के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ गया है।

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