असम में ‘अतिक्रमण हटाओ’ अभियान के बाद मानवीय त्रासदी: जलजली नदी के किनारे कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर सैकड़ों परिवार

असम: कड़कड़ाती ठंड, नदी का किनारा और प्लास्टिक की छत! ग्वालपाड़ा में 588 परिवारों की बेदखली के बाद मानवीय त्रासदी। नाज़मीना ख़ातून का छलका दर्द— "हम मुसलमान हैं इसलिए मदद नहीं मिल रही?" पढ़ें PNN24 की ग्राउंड रिपोर्ट।

शफी उस्मानी

डेस्क: विकास और वनांचल सुरक्षा के नाम पर चलाए गए प्रशासनिक बुलडोजर ने ग्वालपाड़ा ज़िले के सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया है। 9 नवंबर को दहिकाटा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट की ज़मीन से बेदखल किए गए 588 परिवार अब जलजली नदी के रेतीले किनारों पर नीले-पीले प्लास्टिक और टीन की अस्थायी झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं। कड़ाके की ठंड और धूल भरी तेज़ हवाओं ने इन बेघर लोगों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों की ज़िंदगी को नरक बना दिया है।

नाज़मीना का सवाल: “क्या हमारी पहचान ही रुकावट है?” 38 साल की नाज़मीना ख़ातून की आँखों में नाराज़गी और बेबसी साफ दिखती है। वह कहती हैं, “ठंड के कारण मेरा बच्चा एक महीने बीमार रहा, बोलने पर उसकी सांस अटक रही थी। हम यहाँ बिना पानी, शौचालय और सम्मान के रह रहे हैं। महिलाओं को वहां नहाना पड़ता है जहाँ पुरुष नहाते हैं।” नाज़मीना ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि 21 हिंदू परिवारों को मुआवज़ा और ज़मीन दी गई, लेकिन मुस्लिम परिवारों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया।

मुख्यमंत्री का कड़ा रुख: मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में 2021 से अब तक 1.60 लाख बीघा ज़मीन अतिक्रमण मुक्त कराई जा चुकी है। मुख्यमंत्री का कहना है कि अभी 12 लाख बीघा ज़मीन और खाली करवानी है। इन अभियानों से प्रभावित 50 हज़ार से ज़्यादा परिवारों में अधिकतर बंगाली मूल के मुसलमान हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘मियां’ कहा जाता है।

बुजुर्गों और बीमारों पर दोहरी मार:

  • हज़रत अली (77 वर्ष): नदी किनारे प्लास्टिक तंबू में रह रहे हज़रत अली के पैरों में भारी सूजन है। वह कहते हैं, “शायद मैं अब ज़्यादा दिन ज़िंदा न रहूँ, इस ठंड ने बीमार कर दिया है।”
  • अबुल कलाम (39 वर्ष): ऑपरेशन के बाद अबुल अब काम करने लायक नहीं रहे। वह कहते हैं कि 2011 में भू-कटाव के कारण ज़मीन गंवाने के बाद वे यहाँ आए थे, उन्हें नहीं पता था कि यह रिज़र्व फ़ॉरेस्ट की ज़मीन है।
  • जमुद्दीन निशा (49 वर्ष): विकलांग और विधवा जमुद्दीन का घर टूटने के बाद उनकी ‘अरुणदोई’ योजना (सरकारी सहायता) भी बंद कर दी गई है। वह अब दाने-दाने को मोहताज हैं।

एक अनिश्चित भविष्य: अभी नदी का जलस्तर कम है, इसलिए ये लोग रेतीले किनारों पर टिके हैं। लेकिन मानसून की पहली बारिश इन अस्थायी झुग्गियों को बहा ले जाएगी। प्रशासन का दावा है कि कानूनन रिज़र्व फ़ॉरेस्ट में किसी को रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन यहाँ रह रहे लोगों का सवाल है कि “बिना किसी विकल्प के उन्हें मौत के मुंह में क्यों धकेला गया?”

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