‘मिशन ईरान’: क्या ट्रंप करेंगे 1953 जैसा तख्तापलट? रूस-चीन का रुख और अरब देशों का डर; समझें ईरान संकट के हर पहलू को

आफताब फारुकी 

डेस्क: ईरान में जारी आंतरिक विद्रोह और अमेरिका की सैन्य धमकियों ने दुनिया को एक बार फिर तीसरे विश्व युद्ध जैसी आशंकाओं में डाल दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे ईरान के प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए “सैन्य विकल्प” का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि अमेरिका हमला करता है, तो ईरान के साथ कौन खड़ा होगा और इस युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

इतिहास की कड़वाहट: 1953 से 2026 तक ईरान और अमेरिका के बीच की दुश्मनी नई नहीं है। 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने लोकतांत्रिक रूप से चुने गए पीएम मोहम्मद मोसादेग का तख्तापलट किया था, क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था। 1979 की इस्लामिक क्रांति उसी हस्तक्षेप का परिणाम थी, जिसने अमेरिका समर्थक शाह को उखाड़ फेंका। आज 47 साल बाद इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है।

रूस और चीन: मित्र या महज दर्शक? ईरान के दो सबसे बड़े साझेदार रूस और चीन हैं, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया अब तक केवल ‘जुबानी’ रही है।

  • रूस: यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ईरान पर ड्रोन और हथियारों के लिए निर्भर है। रूसी प्रवक्ता मारिया ज़ाखारोवा ने ‘कलर रिवॉल्यूशन’ की निंदा की है, लेकिन जून 2025 में हुए हमलों की तरह रूस इस बार भी अमेरिका से सीधे टकराने का जोखिम शायद ही ले।
  • चीन: चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, लेकिन अमेरिका उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। चीन “व्यापक रणनीतिक साझेदारी” की बात तो करता है, लेकिन वह इजराइल की तरह अपने सहयोगियों के लिए युद्ध के मैदान में नहीं उतरता।

अरब देशों का डर और तेल की सियासत सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे खाड़ी देश एक तरफ ईरान के कट्टर प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें डर है कि युद्ध शुरू हुआ तो उनकी अपनी अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): दुनिया के 20% तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। ईरान ने धमकी दी है कि हमला हुआ तो वह इस रास्ते को बंद कर देगा, जिससे वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मच जाएगा।

  • सऊदी का रुख: रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब ने अमेरिका को अपना हवाई क्षेत्र इस्तेमाल करने देने से मना कर दिया है ताकि वह इस संघर्ष से खुद को अलग रख सके।

इजराइल और प्रॉक्सी नेटवर्क का पतन पिछले दो वर्षों में इजराइल ने ईरान के सुरक्षा कवच यानी हिज्बुल्लाह (लेबनान) और सीरिया में बशर अल असद की पकड़ को काफी कमजोर कर दिया है। ईरान अब अपने इतिहास के सबसे कमजोर दौर में है, जहाँ घरेलू विद्रोह और विदेशी हमले उसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गए हैं।

जी-7 की चेतावनी: कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे जी-7 देशों ने ईरान सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों के दमन की कड़ी निंदा की है और अतिरिक्त प्रतिबंधों की चेतावनी दी है।

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