आसमान में ‘उड़ती’ मानवता की कहानी: जंग के मैदान से हवाई जहाज के आविष्कार तक, जानें पतंग का 2000 साल पुराना रोमांचक इतिहास

तारिक आज़मी 

डेस्क: मकर संक्रांति और उत्तरायण का पर्व आते ही भारत का आसमान सतरंगी पतंगों से भर जाता है। आज भले ही हम इसे एक मनोरंजन या प्रतियोगिता के तौर पर देखते हों, लेकिन पतंग का इतिहास गवाह है कि इसने दुनिया के सबसे बड़े आविष्कारों और युद्धों की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई है। 10 से 14 जनवरी तक अहमदाबाद में चल रहे इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल-2026 में 50 देशों के 135 पतंगबाज़ों की मौजूदगी इस वैश्विक जुनून को साबित करती है।

चीन से शुरू हुआ सफर: पतंग की शुरुआत लगभग 2000 साल पहले चीन में हुई थी। 200 ईसा पूर्व में हान राजवंश के सेनापति हान शिन ने एक शहर की दीवार की दूरी नापने के लिए पतंग उड़ाई थी ताकि सुरंग खोदी जा सके। वहीं, कुछ विद्वान मानते हैं कि मलेशिया और इंडोनेशिया के लोग सदियों पहले पत्तों से पतंग बनाकर मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल करते थे।

भारत में मुग़ल काल और ‘प्रेम संदेश’: भारत में पतंगबाज़ी का इतिहास 1500 ईस्वी के आसपास मुग़ल काल से मिलता है। पुरानी पेंटिंग्स के अनुसार, प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं तक संदेश पहुँचाने के लिए पतंग का सहारा लेते थे। गुजरात में पतंग की संस्कृति हिंदू और मुस्लिम परंपराओं के मिलन का प्रतीक बन गई, जहाँ उत्तरायण जैसे धार्मिक पर्वों पर ईश्वर तक अपनी प्रार्थना पहुँचाने के लिए पतंग उड़ाई जाने लगी।

जब पतंग बनी ‘हथियार’ और ‘जासूस’: विश्व युद्धों के दौरान पतंग मनोरंजन नहीं, बल्कि सामरिक हथियार थी।

  • प्रथम विश्व युद्ध: ब्रिटिश और रूसी सेनाओं ने दुश्मन पर नज़र रखने के लिए ‘काइट यूनिट्स’ बनाई थीं।
  • द्वितीय विश्व युद्ध: अमेरिकी नौसेना ‘बराज काइट’ का इस्तेमाल करती थी। इन पतंगों के तारों से टकराकर दुश्मन के हवाई जहाजों के एल्युमीनियम पंख कट जाते थे। सैनिकों को मशीनगन चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए भी पतंगों पर बने हवाई जहाज के चित्रों को निशाना बनाया जाता था।

हवाई जहाज का ‘पूर्वज’ है पतंग: दुनिया को हवाई जहाज देने वाले राइट ब्रदर्स पतंग उड़ाने के माहिर खिलाड़ी थे। उन्होंने गौर किया कि पतंग के कोनों को मोड़कर हवा के रुख को नियंत्रित किया जा सकता है। अगस्त 1899 में उन्होंने एक ‘बाइप्लेन काइट’ बनाई, जिसने बाद में आधुनिक विमान के नियंत्रण (Wing Warping) का आधार रखा। टेलीफोन के आविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने भी 1901 में ‘टेट्राहेड्रल काइट’ बनाई थी, जिसने 130 किलो तक वजन उठाकर इंसान के उड़ने के सपने को सच करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया।

अहमदाबाद में ग्लोबल मेला: इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल-2026 में रूस, यूक्रेन, इजराइल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की भागीदारी दिखाती है कि पतंग सरहदों को जोड़ने का काम करती है। सबसे अधिक उत्साह चिली और दक्षिण कोरिया के प्रतिभागियों में देखा जा रहा है।

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