शंकराचार्य विवाद पर उमा भारती ने प्रशासन को घेरा; बोलीं— “पदवी का सबूत मांगना अधिकारों का उल्लंघन, यह अधिकार सिर्फ विद्वत परिषद को”

आदिल अहमद
प्रयागराज/वाराणसी: माघ मेले में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच जारी गतिरोध में अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की फायरब्रांड नेता उमा भारती की एंट्री हो गई है। उमा भारती ने शंकराचार्य की उपाधि पर सवाल उठाने और उनसे ‘सबूत’ मांगने को लेकर प्रशासन को कड़ी नसीहत दी है।

“यह तय करने का अधिकार कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं, केवल अन्य शंकराचार्यों और विद्वत परिषद का है। प्रशासन को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”
हालांकि, उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच जल्द ही कोई सकारात्मक समाधान निकल आएगा।
क्या है पूरा मामला? विवाद की शुरुआत मौनी अमावस्या के दिन हुई थी, जब अविमुक्तेश्वरानंद अपने समर्थकों के साथ पालकी में संगम स्नान के लिए जा रहे थे। आरोप है कि पुलिस ने उन्हें रोक दिया, जिसके विरोध में वे अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए।
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी कर यह पूछ लिया कि वे ‘ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य’ की उपाधि का इस्तेमाल किस आधार पर कर रहे हैं? प्रशासन ने उनके शंकराचार्य होने के प्रमाण मांगे थे, जिस पर अब संत समाज और राजनीतिक गलियारों में रोष है।
माफी की मांग पर अड़े शंकराचार्य: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अभी भी अपने शिविर के बाहर धरने पर हैं। उनकी मांग है कि मेला प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अपनी इस ‘अमर्यादित’ कार्रवाई के लिए माफी मांगें। उमा भारती के इस बयान ने अब प्रशासन पर दबाव बढ़ा दिया है, क्योंकि बीजेपी के भीतर से ही संतों के सम्मान को लेकर स्वर मुखर होने लगे हैं।











