पलिया का ‘चीनी का कटोरा’ या आंसुओं का समंदर? सफेदपोशों का चुनावी पाखंड और बजाज मिल की तानाशाही के बीच पिसता अन्नदाता

पलिया: 'चीनी का कटोरा' या आंसुओं का समंदर? बजाज मिल की तानाशाही और चुनावी पाखंड के बीच पिसता किसान। फारुख हुसैन का विशेष लेख, जो बेनकाब करता है सत्ता और सिस्टम की विफलता को।

फारुख हुसैन (वरिष्ठ पत्रकार)

पलिया कलां (खीरी): उत्तर प्रदेश की राजनीति में लखीमपुर खीरी की ‘पलिया विधानसभा’ हमेशा से सत्ता के गलियारों में चर्चा का केंद्र रही है। इसे ‘चीनी का कटोरा’ होने का गौरव प्राप्त है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य इस गौरव को कलंकित कर रहा है। आज इस कटोरे में गन्ने की मिठास नहीं, बल्कि अन्नदाता के खून-पसीने के खारे आंसू भरे हुए हैं।

चुनावी ‘मसीहा’ और राजनीतिक पाखंड जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो रही है, उन नेताओं की सक्रियता भी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई है जो पिछले चार वर्षों से राजनीतिक वनवास पर थे। चुनावी मौसम में ‘मसीहा’ बनकर उभरे इन चेहरों के पीछे का पाखंड अब पलिया के किसानों के सामने बेनकाब हो चुका है। जो नेता बाढ़ के समय और भुगतान के संघर्ष के दौरान वातानुकूलित कमरों में दुबके थे, वे अब पलिया की धूल भरी पगडंडियों पर किसानों के दुख-दर्द का ‘साझा’ करने का नाटक कर रहे हैं।

बजाज चीनी मिल: तानाशाही की पराकाष्ठा पलिया का किसान आज दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ बजाज चीनी मिल की अंतहीन हठधर्मिता है, तो दूसरी तरफ शारदा और सुहेली नदियों का तांडव। बजाज चीनी मिल पर बकाया करोड़ों रुपयों का भुगतान न होना महज एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि किसानों के मौलिक अधिकारों का हनन है। जब भुगतान के अभाव में एक किसान अपनी बेटी की शादी के लिए ज़मीन गिरवी रखता है, तो वह केवल एक परिवार की हार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पराजय होती है।

बाढ़ और भ्रष्टाचार: कागजी घोड़े और धरातल की हकीकत तराई के इस अंचल में बाढ़ और कटान नियति बन चुके हैं। शारदा नदी पर हुए ‘चैनेलाइजेशन’ के कार्यों को लेकर जिस तरह का प्रचार तंत्र सोशल मीडिया पर सक्रिय था, धरातल पर उसकी पोल खुल चुकी है। भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े ये आधे-अधूरे कार्य बाढ़ की विभीषिका के सामने ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। बचाव के नाम पर हर साल ‘पत्थरों और बोरियों’ का जो खेल खेला जाता है, वह अब जनता की समझ में आने लगा है।

2027 का जनादेश: स्वाभिमान की लड़ाई ‘सबका साथ-सबका विकास’ जैसे नारे यहाँ के किसानों के लिए तब तक बेमानी हैं, जब तक उन्हें उनकी फसल का वाजिब दाम और आवारा पशुओं के आतंक से मुक्ति नहीं मिल जाती। 2027 का जनादेश अब किसी झूठे आश्वासनों की चाशनी से तय नहीं होगा। पलिया का किसान अब ‘न्याय’ की भाषा समझता है। सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि किसान का धैर्य अब टूट चुका है। चुनावी शोर के बीच दबी यह सिसकी आने वाले समय में एक ऐसी राजनीतिक सुनामी में बदल सकती है, जो सत्ता के अहंकार को उखाड़ फेंकने का दम रखती है।

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