आयतुल्लाह अली रज़ा आराफ़ी के चर्चित बोल— जो भविष्य के ‘आक्रामक ईरान’ का संकेत हैं
ईरान की अंतरिम लीडरशिप काउंसिल में आयतुल्लाह अली रज़ा आराफ़ी का शामिल होना महज़ एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं है। उनके पिछले भाषणों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि वे ख़ामेनेई की 'कठोर और समझौताविहीन' नीति के सबसे बड़े पैरोकार हैं।

तारिक आज़मी
ईरान की अंतरिम लीडरशिप काउंसिल में आयतुल्लाह अली रज़ा आराफ़ी का शामिल होना महज़ एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं है। उनके पिछले भाषणों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि वे ख़ामेनेई की ‘कठोर और समझौताविहीन’ नीति के सबसे बड़े पैरोकार हैं।

1. अमेरिका और मानवाधिकार: “पाखंड का केंद्र”
“अमेरिका खुद को मानवाधिकारों का मसीहा कहता है, जबकि हकीकत में वह दुनिया में मानवाधिकार उल्लंघन का सबसे बड़ा केंद्र है।” (जुलाई 2017, क़ुम की जुमे की नमाज़)
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विश्लेषण: आराफ़ी का यह रुख साफ़ करता है कि उनके नेतृत्व में ईरान और अमेरिका के बीच किसी भी प्रकार के कूटनीतिक ‘सॉफ्टनिंग’ की गुंजाइश कम है। वे अमेरिका को केवल एक राजनीतिक दुश्मन नहीं, बल्कि एक नैतिक अपराधी मानते हैं।
2. पश्चिमी सभ्यता बनाम ‘क्रांतिकारी सोच’
“हमें ऐसी सोच (Ideology) की ज़रूरत है जो न केवल पश्चिमी उदारवाद का मुकाबला कर सके, बल्कि जिसमें बातचीत, जिहाद और क्रांति के सिद्धांत समाहित हों।” (2016, मदरसों के संबोधन में)
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विश्लेषण: आराफ़ी केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक युद्ध में विश्वास रखते हैं। वे ईरान के युवाओं को पश्चिमी जीवनशैली से दूर रखकर ‘क्रांतिकारी इस्लामी पहचान’ के साथ जोड़ना चाहते हैं।
3. मिसाइल प्रोग्राम: “हमारी रक्षा, हमारी संप्रभुता”
“ईरान का डिफेंस और मिसाइल प्रोग्राम बातचीत का विषय नहीं है। यह हमारी गरिमा और स्वतंत्रता की गारंटी है।”
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विश्लेषण: इज़राइल और अमेरिका के हमलों के बाद, आराफ़ी का यह पुराना स्टैंड अब और भी मज़बूत होगा। वे सैन्य बजट और बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास को अपनी प्राथमिकता बनाए रखेंगे।
4. क्षेत्रीय प्रभाव: “प्रतिरोध की धुरी का नेतृत्व”
“ईरान की सीमाएं केवल जियोग्राफिकल नहीं हैं, जहाँ-जहाँ ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठेगी, ईरान वहां मौजूद रहेगा।”
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विश्लेषण: यह बयान हिज़्बुल्लाह, हुती और अन्य समूहों (Axis of Resistance) को उनके अटूट समर्थन का प्रमाण है। उनके नेतृत्व में ईरान का क्षेत्रीय हस्तक्षेप और बढ़ सकता है।
5. जनसंख्या और राष्ट्रीय शक्ति
“एक शक्तिशाली राष्ट्र के लिए हमें अपनी जनसंख्या वृद्धि की नीतियों पर फिर से विचार करना होगा। बड़ी आबादी ही पश्चिमी दबाव का सामना कर सकती है।”
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विश्लेषण: वे ईरान की आंतरिक ताकत को मज़बूत करने के लिए जनसांख्यिकीय बदलावों को भी सुरक्षा के नज़रिए से देखते हैं।
आराफ़ी के भाषणों से तीन बातें स्पष्ट हैं:
- कोई समझौता नहीं: वे अमेरिका और इज़राइल के प्रति ख़ामेनेई से भी अधिक कठोर रुख अपना सकते हैं।
- आइडियोलॉजिकल रिजीडिटी: वे ईरान के मदरसों और विश्वविद्यालयों को पूरी तरह ‘इस्लामीकरण’ की दिशा में ले जाने के पक्षधर हैं।
- सैन्य वर्चस्व: वे परमाणु और मिसाइल तकनीक को ईरान के अस्तित्व के लिए अनिवार्य मानते हैं।











