‘कैमरे पर पहरा और सच बोलने पर जेल’: इज़राइल में विदेशी पत्रकारों के लिए नरक बना युद्ध का मैदान; मौत और गिरफ्तारी के बीच झूलती रिपोर्टिंग
युद्ध के मैदान में 'सच' पर पहरा! इज़राइल में तैनात विदेशी पत्रकारों की आपबीती। मिसाइल हमलों के बीच जेल जाने का डर और सैन्य सेंसरशिप की बेड़ियाँ। जाने क्या बता रहा है हालात पर अन्तराष्ट्रीय मीडिया

शफी उस्मानी
PNN24 News: जब आसमान से मिसाइलें बरस रही हों, तो पत्रकार का काम दुनिया को ‘सच्चाई’ दिखाना होता है। लेकिन वर्तमान में इज़राइल में मौजूद सैकड़ों विदेशी पत्रकारों के लिए ‘सच’ बोलना अपराध बनता जा रहा है। सैन्य सेंसरशिप और इंटेलिजेंस एजेंसियों के बढ़ते दबाव ने प्रेस की आज़ादी को पूरी तरह से कुचल दिया है।
1. ‘डार्क जोन’ में तब्दील हुआ इज़राइल
पिछले 48 घंटों में इज़राइल में मीडिया पर जो पाबंदियाँ लगी हैं, वैसी आधुनिक इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गईं।
- अदृश्य मिसाइलें: रिपोर्टर्स को यह दिखाने की मनाही है कि ईरानी मिसाइलें कहाँ गिरीं। अगर कैमरा गलती से भी किसी क्षतिग्रस्त इमारत की ओर मुड़ जाए, तो सेना तुरंत प्रसारण बंद करवा देती है।
- लाइव कवरेज पर बैन: कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस के पत्रकारों को लाइव फीड के दौरान ही हिरासत में लिया गया है। आरोप है कि वे ‘दुश्मन’ (ईरान/हिज़्बुल्लाह) को लोकेशन की जानकारी दे रहे हैं।
2. होटल बने ‘कैदखाने’
तेल अवीव के जिन होटलों में विदेशी पत्रकार ठहरे हुए हैं, वहां सादे लिबास में खुफिया अधिकारी तैनात हैं।
- डिवाइस की जांच: पत्रकारों के लैपटॉप और मोबाइल फोन की रैंडम चेकिंग की जा रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई ‘सेंसिटिव’ फुटेज बाहर न जाए।
- डर का माहौल: एक यूरोपीय पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमें नहीं पता कि कल हम न्यूज़ रूम में होंगे या जेल में। यहाँ मौत से ज़्यादा डर प्रशासन की कार्रवाई का है।”
3. बेन गुरियन एयरपोर्ट की घटना और मीडिया दमन
हाल ही में हवाई अड्डे के पास हुए हमले में दो लोगों की मौत के बाद, जब कुछ पत्रकारों ने क्लस्टर बमों (Cluster Bombs) के अवशेष दिखाने की कोशिश की, तो उनके उपकरण जब्त कर लिए गए। पुलिस का तर्क है कि ऐसी सूचनाएं ‘पब्लिक पैनिक’ (जनता में भगदड़) फैलाती हैं।
4. क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय संगठन?
‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) और अन्य संस्थाओं ने इज़राइल में पत्रकारों की सुरक्षा और उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
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सुरक्षा कवच की कमी: मिसाइल हमलों के दौरान पत्रकारों के पास न तो पर्याप्त ‘प्रेस’ चिह्नित बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं और न ही सुरक्षित ठिकाने।
5. युद्ध का ‘एकतरफा’ नैरेटिव
सेंसरशिप का सबसे बुरा असर यह है कि दुनिया तक केवल वही जानकारी पहुँच रही है जिसे इज़राइली सेना (IDF) पास कर रही है। अल जज़ीरा और अन्य स्वतंत्र मीडिया कर्मियों के लिए अब ग्राउंड रिपोर्टिंग करना लगभग असंभव हो गया है।










