‘हरीश राणा की मौत या व्यवस्था की हार?’; 11 साल बाद थमीं सांसें, पर पीछे छोड़ गए बदहाल स्वास्थ्य तंत्र पर सुलगते सवाल— क्या इलाज के अभाव में ‘इच्छा मृत्यु’ ही एकमात्र विकल्प है?
विशेष रिपोर्ट: देश में 'इच्छा मृत्यु' (Passive Euthanasia) पाने वाले पहले शख्स हरीश राणा का एम्स में निधन। 11 साल का कोमा, बिक गया घर और जेवर; अंत में पिता ने मांगी मौत। क्या हमारा हेल्थ सिस्टम गरीबों के लिए 'डेथ वारंट' बन चुका है? PNN24 का तीखा विश्लेषण।

तारिक आज़मी
PNN24 News: भारत में ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ (Passive Euthanasia) की अनुमति पाने वाले पहले व्यक्ति हरीश राणा का मंगलवार को दिल्ली के एम्स (AIIMS) में निधन हो गया। 31 वर्षीय हरीश पिछले 11 सालों से कोमा में थे। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ‘भरे मन’ से उनके पिता की उस याचिका को स्वीकार किया था, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के लिए सम्मानजनक मौत की मांग की थी। लेकिन हरीश की यह विदाई सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि भारत के मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की उस लाचारी की दास्तां है, जहाँ इलाज की लागत जिंदगी से बड़ी हो जाती है।
1. चौथी मंजिल से कोमा तक: एक मेधावी छात्र का अंत
पंजाब यूनिवर्सिटी के बीटेक छात्र रहे हरीश राणा की जिंदगी 2013 में तब बदल गई जब वह चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गए। सिर में गंभीर चोट के कारण वह कोमा में चले गए। तब से वे कृत्रिम पोषण (Artificial Nutrition) और कभी-कभी ऑक्सीजन सपोर्ट पर जीवित थे।
2. इलाज की कीमत: बिक गया मकान और जेवर
हरीश के इलाज का खर्च लगभग 70 हजार रुपये प्रति महीना था। इस बोझ को उठाने के लिए उनके पिता को अपना मकान बेचना पड़ा, घर के जेवर बिक गए और स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि परिवार एक छोटे से खोमचे (ठेले) तक सिमट गया। जब उम्मीद की सारी किरणें बुझ गईं और आर्थिक तंगी ने गले तक जकड़ लिया, तब पिता ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया।
3. पूर्वांचल से लेकर दिल्ली तक: कहाँ है वेंटिलेटर?
हरीश का मामला हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलता है। सरकारों द्वारा करोड़ों के स्वास्थ्य बजट का एलान किया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि:
- पूर्वांचल का हाल: पूर्वांचल के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में आज भी खुद का वेंटिलेटर या न्यूरोसर्जरी जैसी बुनियादी सुविधाएं न के बराबर हैं।
- लाचारी: यदि किसी गरीब को कोई जटिल बीमारी हो जाए, तो वह इलाज के अभाव में दम तोड़ने को मजबूर है या फिर हरीश के परिवार की तरह सड़क पर आने को।
4. सामाजिक संगठनों की सीमा और सरकारी विफलता
समाज में कई एनजीओ और संगठन सक्रिय हैं, लेकिन हर जरूरतमंद तक उनकी पहुँच संभव नहीं है। सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारें और संसाधनों की कमी किसी से छिपी नहीं है। सवाल यह है कि क्या एक कल्याणकारी राज्य में नागरिक को मुफ्त और बेहतर इलाज का अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा?
📊 केस स्टडी: हरीश राणा का संघर्ष (Case Timeline)
| वर्ष | घटनाक्रम | स्थिति |
| 2013 | बालकनी से गिरे (बीटेक छात्र) | कोमा की शुरुआत |
| 2013-2024 | निरंतर इलाज और संघर्ष | घर, जेवर और संपत्ति बिकी |
| 11 मार्च 2026 | सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला | निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति |
| 14 मार्च 2026 | एम्स (AIIMS) शिफ्ट | पेलिएटिव केयर यूनिट |
| 24 मार्च 2026 | अंतिम सांस | 11 साल बाद संघर्ष विराम |
📌 PNN24 का बेबाक नज़रिया:
हरीश राणा को मिली ‘इच्छा मृत्यु’ कानून की जीत हो सकती है, लेकिन यह हमारे समाज और स्वास्थ्य तंत्र की हार है। देश को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जहाँ किसी पिता को अपने बेटे के लिए मौत न मांगनी पड़े। जब तक ‘यूनिवर्सल हेल्थ केयर’ और हर जिले में न्यूरोसर्जरी जैसे उच्च-स्तरीय केंद्र नहीं होंगे, तब तक मध्यमवर्ग ऐसे ही कर्ज के जाल में फंसकर खत्म होता रहेगा।











