‘तेल के बाद अब पानी पर जंग’; मध्य-पूर्व में डिसैलिनेशन प्लांट्स बने नए ‘सॉफ्ट टारगेट’, क्या प्यास बुझाने वाले संयंत्र बनेंगे विनाश का कारण?

"तेल से भी कीमती हुआ पानी": मध्य-पूर्व में जारी महायुद्ध अब 'वॉटर इन्फ्रास्ट्रक्चर' की ओर मुड़ा। खाड़ी देशों के डिसैलिनेशन प्लांट्स पर ईरानी ड्रोन हमलों की खबरें, अमेरिका और ईरान के बीच 'जल-संकट' को रणनीतिक हथियार बनाने की होड़। PNN24 का विशेष विश्लेषण।

शफी उस्मानी

PNN24 News: मध्य-पूर्व में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने अब एक नया और खौफनाक मोड़ ले लिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह जंग अब केवल तेल और गैस की पाइपलाइनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि ‘पानी’—जो इस शुष्क क्षेत्र की जीवनरेखा है—अब युद्ध का नया हथियार बन गया है।

1. डिसैलिनेशन प्लांट्स: खाड़ी की सबसे बड़ी कमज़ोरी

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश अपनी पीने योग्य पानी की ज़रूरतों के लिए दुनिया में सबसे अधिक समुद्री पानी को मीठा बनाने (Desalination) की प्रक्रिया पर निर्भर हैं।

  • आंकड़े: कुवैत का 90%, ओमान का 86% और सऊदी अरब का 70% पीने योग्य पानी इन्हीं संयंत्रों से आता है।
  • रणनीतिक खतरा: 2021 तक ये संयंत्र प्रतिदिन 2 करोड़ क्यूबिक मीटर से अधिक पानी का उत्पादन कर रहे थे। विशेषज्ञों का कहना है कि इन केंद्रित (Centralized) संयंत्रों पर एक भी बड़ा हमला लाखों लोगों के लिए तत्काल मानवीय संकट पैदा कर सकता है।

2. ‘हॉरिज़ोन्टल एस्केलेशन’ और ईरान की रणनीति

ईरान सीधे तौर पर अमेरिका से टकराने के बजाय संघर्ष का दायरा उन क्षेत्रों में फैला रहा है जहाँ उसके प्रतिद्वंद्वी कमज़ोर हैं। विश्लेषक इसे ‘हॉरिज़ोन्टल एस्केलेशन’ कह रहे हैं।

  • बहरीन पर हमला: बहरीन ने आरोप लगाया है कि एक ईरानी ड्रोन ने उनके एक प्रमुख डिसैलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया, जिससे भारी भौतिक क्षति हुई है।
  • ईरान का दावा: इसके जवाब में ईरान ने कहा कि अमेरिका ने पहले होर्मुज़ जलडमरूमध्य में क़ेश्म द्वीप (Qeshm Island) पर स्थित एक वॉटर प्लांट को नष्ट किया, जिससे 30 गांवों की जलापूर्ति बाधित हुई।

3. जेबेल अली और फुजैरा: खतरे की ज़द में बड़े ठिकाने

दुबई का जेबेल अली बंदरगाह, जहाँ दुनिया के सबसे बड़े डिसैलिनेशन प्लांट्स में से एक है, हालिया ईरानी हमलों के बेहद करीब रहा है। यूएई के फुजैरा एफ़1 प्लांट के पास भी आग लगने की खबरें आई हैं। ये घटनाएं संकेत देती हैं कि ईरान ने रणनीतिक रूप से इन ‘सॉफ्ट टारगेट्स’ को अपनी जद में ले रखा है ताकि अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव बनाया जा सके।

4. जिनेवा कन्वेंशन और मानवीय कानून

यूनिवर्सिटी इंस्टिट्यूट फॉर वॉटर के प्रोफ़ेसर कावेह मदानी के अनुसार, नागरिक बुनियादी ढांचों (Civilian Infrastructure) पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।

  • अनुच्छेद 45 (जिनेवा कन्वेंशन): यह कानून युद्ध के दौरान नागरिकों के अस्तित्व के लिए अनिवार्य संसाधनों (जैसे पानी) को नष्ट करने से रोकता है। यही कारण है कि ईरान इन हमलों को “जायज़ जवाबी कार्रवाई” के रूप में पेश कर रहा है ताकि वह कानूनी कटघरे से बच सके।

5. ईरान का अपना जल-संकट

हालाँकि ईरान की जल आपूर्ति खाड़ी देशों की तुलना में अधिक विविध है, लेकिन वह खुद भी एक गंभीर जल-संकट से जूझ रहा है।

  • सूखते जलस्त्रोत: ज़ायंदेह रूद नदी और उर्मिया झील लगभग सूख चुके हैं।
  • घरेलू अशांति: तेहरान में पानी की कटौती की संभावना है, और पानी की कमी ने देश के भीतर पहले ही राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों को हवा दी है।

📊 खाड़ी देशों की पानी पर निर्भरता (डिसैलिनेशन)

देश निर्भरता (%) स्थिति
कुवैत 90% अति-संवेदनशील
ओमान 86% उच्च जोखिम
सऊदी अरब 70% रणनीतिक चिंता
यूएई 42% वैकल्पिक स्त्रोतों पर काम जारी

📌 भविष्य में इस क्षेत्र के संघर्ष केवल तेल के दाम तय नहीं करेंगे, बल्कि यह तय करेंगे कि आधुनिक रेगिस्तानी शहर अस्तित्व में रह पाएंगे या नहीं। ‘वॉटर इन्फ्रास्ट्रक्चर’ पर हमला किसी भी राष्ट्र को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाला सबसे घातक हथियार साबित हो सकता है।

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