नेतन्याहू का ‘मिशन सत्ता परिवर्तन’: हमले के 24 घंटे बाद ईरान सरकार गिराने का आह्वान; इज़राइली खुफिया एजेंसी ने दावों की खोली पोल— बताया ‘चुनावी दांव’

ईरान पर हमले के 24 घंटे के भीतर नेतन्याहू का बड़ा बयान— "ईरानी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे"। इज़राइली खुफिया रिपोर्ट ने दावों को नकारा। क्या यह महज़ चुनावी स्टंट है?

आदिल अहमद

PNN24 News: ईरान पर भीषण सैन्य कार्रवाई शुरू होने के अभी 24 घंटे भी नहीं बीते हैं कि इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बेहद ‘अति महत्वाकांक्षी’ बयान जारी कर दिया है। नेतन्याहू ने खुले तौर पर ईरान में सत्ता परिवर्तन और वहाँ की सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया है। हालांकि, इज़राइल की अपनी ही खुफिया एजेंसियों के आकलन नेतन्याहू के इन दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

हिब्रू में भाषण, निशाना इज़राइली वोट बैंक दिलचस्प बात यह है कि नेतन्याहू जब ईरानी जनता को संबोधित कर रहे थे, तो वे हिब्रू भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। जानकारों का मानना है कि उनका यह संदेश ईरानियों के लिए कम और इज़राइल की अपनी जनता के लिए ज्यादा था।

  • वर्चस्व की नुमाइश: नेतन्याहू अपनी जनता को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि इज़राइल इतना शक्तिशाली है कि वह अपने सबसे बड़े और ‘कट्टर शत्रु’ ईरान को जड़ से मिटा सकता है।
  • अमेरिका का साथ: वे बार-बार इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि इस महायुद्ध में उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका (ट्रंप प्रशासन) का पूरा समर्थन प्राप्त है।

खुफिया रिपोर्ट ने दावों को बताया ‘असंभव’ नेतन्याहू भले ही सत्ता परिवर्तन का सपना दिखा रहे हों, लेकिन इज़राइली खुफिया विभाग (Mossad/Aman) का आकलन इसके विपरीत है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार:

  1. ईरान में फिलहाल किसी बड़े ‘जन विद्रोह’ की संभावना न के बराबर है।
  2. सैन्य हमलों के बावजूद ईरानी सरकार की पकड़ मजबूत है और उसे उखाड़ फेंकना ‘बेहद कठिन’ है।

चुनावों की आहट और युद्ध की राजनीति इज़राइल में कुछ ही महीनों में आम चुनाव होने वाले हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों और घरेलू विरोध झेल रहे नेतन्याहू के लिए यह युद्ध ‘संजीवनी’ जैसा है। उन्हें इस युद्ध और अमेरिका के साथ बने गठबंधन को इस तरह पेश करना है जिससे वे खुद को इज़राइल के एकमात्र ‘रक्षक’ के रूप में स्थापित कर सकें और चुनाव जीत सकें।

इतिहास गवाह है कि बाहरी हमलों से अक्सर देशों की जनता अपनी सरकार के पीछे और मजबूती से खड़ी हो जाती है। नेतन्याहू का ‘सत्ता परिवर्तन’ का आह्वान ज़मीनी हकीकत से ज्यादा ‘चुनावी जुमला’ नज़र आता है। क्या वोट की खातिर पूरे मिडिल ईस्ट को ‘अराजकता’ में झोंकना इज़राइल के लिए महंगा पड़ेगा? यह आने वाला वक्त बताएगा।

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