‘अमेरिका तय करेगा हम किससे तेल खरीदें?’: राहुल गांधी का पीएम मोदी पर बड़ा हमला; बोले— “यह नीति नहीं, एक समझौता कर चुके व्यक्ति का शोषण है”

"अमेरिका हमें बताएगा किससे तेल खरीदें?"— अमेरिकी 'छूट' पर भड़के राहुल गांधी। पीएम मोदी को बताया 'समझौता कर चुका व्यक्ति'। विदेश नीति को लेकर संसद से सोशल मीडिया तक कांग्रेस का तीखा हमला।

आदिल अहमद 

नई दिल्ली (PNN24 News): रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका द्वारा दी गई ’30 दिनों की रियायत’ पर देश की सियासत पूरी तरह गर्मा गई है। अरविंद केजरीवाल के बाद अब कांग्रेस सांसद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला है। राहुल ने भारत की संप्रभुता का सवाल उठाते हुए कहा कि आज की विदेश नीति किसी सिद्धांत पर नहीं, बल्कि एक ‘मजबूर नेतृत्व’ के शोषण पर टिकी है।

1. “इतिहास और मूल्यों से तय हो नीति”

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट द्वारा भारतीय रिफाइनरियों को रूस से तेल खरीदने के लिए दी गई 30 दिन की ‘छूट’ पर प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा:

“हमारी विदेश नीति हमारे इतिहास, हमारी भौगोलिक स्थिति और हमारे मूल्यों के आधार पर तय होनी चाहिए। यह सत्य और अहिंसा पर आधारित होनी चाहिए।”

2. ‘समझौता कर चुका व्यक्ति’ और शोषण

राहुल गांधी ने वर्तमान स्थिति को भारत के लिए अपमानजनक बताते हुए प्रधानमंत्री पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने लिखा:

“आज जो हम देख रहे हैं, वह कोई नीति नहीं है। यह एक समझौता कर चुके व्यक्ति के शोषण का परिणाम है।”

राहुल का इशारा इस ओर था कि पीएम मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन के सामने भारत के हितों की रक्षा करने में विफल रहे हैं।

3. 11 फरवरी का भाषण: “पीएम तय नहीं करेंगे”

अपनी बात को मज़बूती देने के लिए राहुल गांधी ने लोकसभा में 11 फरवरी को दिए अपने उस भाषण का वीडियो भी साझा किया, जिसमें उन्होंने भविष्य की इस स्थिति की भविष्यवाणी की थी। उस समय राहुल ने कहा था:

“अमेरिका हमें बताएगा कि हम किससे तेल खरीदें और किससे नहीं। रूस से खरीदें या ईरान से, यह अमेरिका तय करेगा। लेकिन हमारे पीएम तय नहीं करेंगे।”

4. कूटनीति या दबाव?

कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) खो रहा है। जहाँ एक समय भारत बिना किसी दबाव के अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करता था, वहीं अब उसे वॉशिंगटन से ‘समय सीमा’ (30 दिन की छूट) लेनी पड़ रही है। विपक्ष इसे ‘इंसल्ट’ और ‘घुटने टेकने वाली कूटनीति’ करार दे रहा है।

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